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शनिवार, 28 अप्रैल, 2007 को 18:35 GMT तक के समाचार
 
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ज़ैतून की डाल से क्या इशारा...
 

 
 
ज़ैतून की डाल
ज़ैतून की डाल का इशारा...
अंग्रेज़ी में ऑलिव ब्रांच दिखाने का मतलब होता है किसी तरह की रियायत देना या सुलह-समझौता करना. जगरनाथपुर, मधुबनी बिहार से लाल बाबू सिंह पूछते हैं कि ऑलिव ब्रांच या ज़ैतून की शाखा को शांति का प्रतीक क्यों माना जाता है.

ज़ैतून की शाखा को शांति का प्रतीक कब से और क्यों माना जाने लगा यह कहना मुश्किल है लेकिन लगता ये है कि इसका प्रचलन प्राचीन यूनान में शुरू हुआ. यूनानी मिथक के अनुसार, एक नगर पर ऐथीना और पोसीडॉन दोनों ही देवताओं की नज़र थी. ज़िउस ने फ़ैसला किया कि जो भी देवता नगरवासियों को सबसे उपयोगी भेंट देगा नगर उसी के नाम कर दिया जाएगा. पोसीडॉन ने एक चट्टान पर अपना त्रिशूल मारा तो वहाँ से पानी का झरना फूट पडा लेकिन पानी खारा निकला. फिर ऐथीना ने अपने भाले से धरती पर चोट की तो वहां ज़ैतून का पेड़ खड़ा हो गया. नगरवासी बड़े ख़ुश हुए और ज़िउस ने नगर ऐथीना के नाम कर दिया और ऐथीना देवी के नाम पर ही शायद नगर का नाम एथेंस पड़ा. ज़ैतून के पेड़ को इसलिए भी शांति से जोड़ा जाता है क्योंकि यह लम्बे समय के बाद फल देता है. मतलब ये कि इसकी देखभाल तभी हो सकती है जब शांति रहे. शायद आप जानते हों कि जब ओलम्पिक खेल होते थे तो राज्यों के बीच लड़ाई थम जाती थी और विभिन्न विजेताओं को ज़ैतून की टहनियों का मुकुट पहनाया जाता था.

विश्व इतिहास में पहली मई का, क्या महत्व है और किस कारण इसे मज़दूर दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह सवाल लिख भेजा है देवघर झारखंड से पिंकु ने.

मई दिवस, अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर आंदोलन की सामाजिक और आर्थिक उपलब्धियों के लिए मनाया जाता है. अमरीका के मज़दूर संगठनों ने 1884 में यह मांग की, कि एक दिन में केवल आठ घंटे काम कराया जाए. सन 1886 में इसके समर्थन में अमरीका के शिकागो शहर में आम हड़ताल हुई और दंगे भड़क उठे. लेकिन इसका परिणाम ये हुआ कि मज़दूर संगठनों की मांग स्वीकार कर ली गई. बीसवीं शताब्दी में यह समाजवादियों के लिए पारम्परिक छुट्टी का दिन बन गया. आज भी साम्यवादी देशों में मई दिवस की छुट्टी रहती है और दुनिया भर के मज़दूर संगठन मई दिवस की रैलियां निकालते हैं.

जयपुर राजस्थान से नवीन कुमार वर्मा ने सवाल भेजा है कि जयपुर को पिंक सिटी या गुलाबी नगर क्यों कहा जाता है.

जयपुर में हवामहल
जयपुर में ज़्यादातर ऐतिहासिक इमारतें गुलाबी रंग में बनी हुई हैं

जयपुर की स्थापना ऐसे दौर में हुई जब भारत में नगर नियोजन एक नया विषय रहा होगा. इसकी स्थापना में ज्यामित्य सूत्र और गणित की कसौटी का ध्यान रखा गया था. लेकिन इसे गुलाबी रंग मिला राजा रामसिंह द्वितीय के शासन काल में. उन्होने 1835 से 1880 तक शासन किया. कहते हैं कि एकबार उन्होने एक खिले हुए गुलाब की पंखुड़ियों को देखा और आदेश दिया कि शहर का रंग गुलाबी होना चाहिए. इस परम्परा का प्राचीन जयपुर में अब भी निर्वहन किया जा रहा है. परकोटे के शहर में जो इमारतें हैं जैसे हवा महल, पुरानी विधान सभा, जौहरी बाज़ार, अजमेरी गेट, चौड़ा रास्ता, त्रिपौलिया सब पर आज भी गुलाबी रंग चस्पा है. यहां के नागरिक और नगर प्रशासन अब भी कोशिश करता है कि यह परम्परा जारी रहे और जयपुर के साथ गुलाबी रंग जुड़ा रहे.

मुज़फ़्फ़रपुर बिहार से प्रफुल्ल प्रकाश ने क्रिकेट से जुड़ा एक सवाल पूछा है. लिखते हैं कि अगर नॉन स्ट्राइकर बैट्समैन, गेंदबाज़ के बॉल फेंकने से पहले क्रीज़ से बाहर निकल जाता है तो क्या उसे आउट कर दिया जाता है.

जो बल्लेबाज़, गेंदबाज़ के सामने खड़ा होता है उसे स्ट्राइकर कहते हैं जबकि दूसरी तरफ़ खड़े बल्लेबाज़ को नॉन-स्ट्राइकर कहा जाता है. नॉन-स्ट्राइकर को ये निर्देश होते हैं कि जब तक गेंद बोलर के हाथ से बल्लेबाज़ की तरफ़ चली न जाए वह क्रीज़ न छोड़े. लेकिन कभी कभी रन लेने की जल्दी में वो आगे बढ़ जाता है. नियम यह है कि इस स्थिति में गेंदबाज़ अपनी तरफ़ के विकिटों पर रखी गिल्ली उड़ाकर रन आउट की अपील कर सकता है और अम्पायर बल्लेबाज़ को आउट भी दे सकता है. लेकिन आमतौर पर गेंदबाज़, नॉन-स्ट्राइकर को चेतावनी देते हैं.

रांची से नौशाद और गुड़गांव हरियाणा के जीवन सिंह बिश्त यह जानना चाहते हैं कि नोट छापने की क्या सीमा होती है और यह कौन तय करता है कि कितने नोट छापे जाएँ.

भारतीय मुद्रा - रुपया

जी हां नोट छापने की सीमा होती है लेकिन इसे तय करने का तरीक़ा थोड़ा जटिल है. सबसे पहले किसी भी वित्तीय वर्ष की शुरुआत में यानि अप्रैल में आर्थिक वृद्धि की दर तय की जाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था किस दर से बढ़ेगी. इसके साथ साथ यह भी देखना होता है कि मुद्रास्फीति भी नियन्त्रण में रहे. क्योंकि अगर आर्थिक वृद्धि हुई और मुद्रास्फीति भी बढ़ी तो विकास का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुंच पाएगा. इन दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह तय किया जाता है कि कितने पैसे अर्थव्यवस्था में डालने की ज़रूरत है. यह भी देखना होता है कि कितने नोट बदलने हैं क्योंकि नोट इस्तेमाल होने से ख़राब भी होते हैं जिनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं. इसे मनी सप्लाई कहा जाता है. इसके बाद ही तय होता है कि किस मूल्य वर्ग के कितने नोट छापने हैं.

सिंगापुर की राजभाषा क्या है. सिरोही राजस्थान से ओमप्रकाश, तरुण, धवल, श्रवण और बुधाराम.

सिंगापुर की राजभाषा मलय है हालांकि वहां चीनी भाषा मैंडरिन, तमिल और अंग्रेज़ी भी बोली जाती है. सिंगापुर दक्षिण पूर्वी एशिया का सबसे छोटा देश है लेकिन इसकी गिनती विकसित देशों में की जाती है. यह मलय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित है और यहां चीनी, मलय, तमिल, बंगाली, पंजाबी, थाई, जापानी, यूरोपीय और अरब सभी मूल के लोग रहते हैं.

सिंगापुर से वीरेन्द्र कुमार ने पूछा है कि सिंगापुर का नाम कैसे पडा.

यह नाम मलय भाषा के सिंग और पुर शब्दों से बना है जिनका अर्थ है सिंह और नगर. यानि सिंह का नगर. किम्वदन्ती है कि यह नाम राजकुमार संग नील उतमा ने दिया था. उन्होने इस द्वीप पर सबसे पहले जो जीव देखा वह था सिंह इसलिए इसका नाम सिंहापुर पड़ गया.

संयुक्त अरब अमीरात से रियाज़ अंसारी ने पूछा है कि घाना का पुराना नाम क्या है.

घाना का पुराना नाम है गोल्ड कोस्ट या सुनहरा तट. यूरोप से यहां पहुंचने वालों में सबसे पहले पुर्तगाली थे. यह बात पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग की है. यूरोपीय जानते थे कि यहीं से सोना उत्तरी अफ़्रीका पहुंचता है. पुर्तगालियों ने व्यापार की दृष्टि से यहां एक क़िला बनाया जो आज भी खड़ा है. अगली तीन शताब्दियों में अन्य यूरोपीय देशों का, इसके अलग-अलग हिस्सों पर क़ब्ज़ा रहा. फिर 1821 में यह ब्रिटन के नियन्त्रण में आ गया. छ मार्च 1957 में जब ब्रिटन ने गोल्ड कोस्ट और अशांति, नॉर्दर्न टैरिटरीज़ प्रोटैक्ट्रेट और ब्रिटिश टोगोलैंड पर नियंत्रण छोड़ा तो एक स्वतन्त्र देश के रूप में घाना का जन्म हुआ.

 
 
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