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तितली की आँखें तो बड़ी मगर...
 

 
 
तितली
तितली की आँखें काफ़ी बड़ी होती हैं मगर...
ग्राम गड़ही, ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश से श्री भगवान सिंह ने बड़ा ही रोचक सवाल लिखकर भेजा है. वो पूछते हैं कि हम तो तितलियों को देख सकते हैं क्या तितलियाँ भी हमें देख पाती हैं.

तितलियों की आँखें होती हैं इसलिए वो देख तो सकती हैं लेकिन उनकी यह क्षमता सीमित होती है. आपने ग़ौर किया होगा कि इनकी आंखे बड़ी और गोलाकार होती हैं. इनमें हज़ारों सैंसर होते हैं जो अलग- अलग कोण में लगे रहते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि तितलियां ऊपर, नीचे, आगे, पीछे, दाएँ, बाँए सभी दिशाओं में एक साथ देख सकती हैं. लेकिन इसका यह नुक़सान भी होता है कि वे किसी चीज़ पर अपनी दृष्टि एकाग्र नहीं कर पातीं और उन्हे धुंधला सा दिखाई देता है. तितलियों की दृष्टि बड़ी सीमित होती है और वे केवल रोशनी, रंग और गति देख पाती हैं. इसका मतलब ये हुआ कि वे रात और दिन में अंतर कर पाती हैं, कुछ रंग पहचान पाती हैं और किसी भी प्रकार की गति को भांप जाती हैं. इसीलिए जब कोई उन्हें पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाता है तो उन्हें फ़ौरन पता चल जाता है और वे उड़ जाती हैं.

बांकी, बीजाटाला, मयूरभंज उड़ीसा से देबाशीष मोहंत यह जानना चाहते हैं कि क्या दमे का पूरी तरह इलाज संभव है.

दमा श्वास की बीमारी है जिसमें साँस लेने में कठिनाई होती है. दमे के मरीज़ की साँस की नली बहुत संवेदनशील होती है. उसके भीतर सूजन हो जाने से वह संकरी हो जाती है जिससे खाँसी उठती है, साँस फूलती है और छाती में जकड़न होती है. दमा कई कारणों से हो सकता है. एक तो आनुवांशिक कारण हैं, दूसरा पर्यावरण प्रदूषण, धूम्रपान, वायरस का संक्रमण आदि भी दमा पैदा कर सकते हैं. यूँ तो दमे का कोई इलाज नहीं है लेकिन दवाइयों से इसपर नियंत्रण रखा जा सकता है. इनमें सबसे आम हैं इन्हेलर जिन्हें मुंह में रख कर साँस खींची जाती है और दवा भीतर पहुँच कर साँस की नली को चौड़ा कर देती है. अगर दमे के लक्षण बढ़ने लगें तो मरीज़ को स्टैरॉएड की गोलियाँ दी जाती हैं. इसके अलावा नैबुलाइज़र का भी प्रयोग किया जाता है. जिस तरह ऑक्सीजन लगाई जाती है उसी तरह इसमें एक मशीन के ज़रिए दवा की भाप पैदा की जाती है और उसे मास्क के ज़रिए सीधे साँस द्वारा भीतर डाला जाता है.

जगरनाथपुर मधुबनी बिहार से लाल बाबू सिंह ने पूछा है कि टेलीविज़न पर रियलिटी शो क्या होता है, इसका आयोजन क्यों किया जाता है और इसमें भाग लेने वाले प्रतियोगियों का चयन कैसे किया जाता है.

शिल्पा शेट्टी
शिल्पा को बिग ब्रदर से काफ़ी लोकप्रियता मिली

जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है रियलिटी टीवी ऐसा प्रसारण है जिसका कोई आलेख नहीं होता, इसमें जो कुछ भी घटता है वह वास्तविक होता है और इसमें व्यावसायिक कलाकारों की जगह आम लोग हिस्सा लेते हैं. कभी-कभी मशहूर लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है जैसा कि ब्रिटेन के रियलिटी शो सैलिब्रेटी बिग ब्रदर में हुआ था जिसमें भारत की सिने कलाकार शिल्पा शैट्टी ने हिस्सा लिया था. रियलिटी शो कई तरह के हो सकते हैं, कभी कैमरा आम या ख़ास लोगों का पीछा करता है, कभी इसमें भाग लेने वाले लोगों को एक स्थान पर ले जाकर लंबे समय तक रखा जाता है और दर्शक देखते हैं कि वो किस तरह एक दूसरे के साथ रहते हैं, खाते-पीते हैं और व्यवहार करते हैं और फिर दर्शकों की वोटिंग के आधार पर इनमें से सबसे लोकप्रिय व्यक्ति का चयन किया जाता है. कभी ये गेम-शो की शक्ल में होते हैं कभी मेकओवर शो होते हैं जिसमें व्यक्ति की काया पलट की जाती है.

समाजवाद की उत्पत्ति कब और कैसे हुई. पूछते हैं अतरौली, मधुबनी बिहार से ललित ठाकुर.

समाजवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में पश्चिमी यूरोप में हुआ. यह विचार बहुत से सिद्धांतों और सामाजिक प्रयोगों से उपजा था. यूरोप में व्याप्त ग़रीबी और असमानता के विरोध में ब्रिटेन और फ़्रांस के विचारकों ने सुधारों की वकालत की जिसमें सम्पत्ति के समतावादी बंटवारे और समाज के पुनर्गठन का विचार शामिल था. उद्देश्य था एक आदर्श समाज की स्थापना. लेकिन यह समाज कैसे बने इसपर मतभेद ज़रूर थे. कुछ का मानना था कि यह बदलाव धीरे-धीरे लाया जाए जबकि कुछ सीधी राजनीतिक कार्रवाई की मांग करते थे. समाजवाद एक ऐसी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें धन-सम्पत्ति के वितरण पर सामाजिक नियंत्रण होता है. यह नियंत्रण सामूहिक रूप से एक मज़दूर परिषद या सरकार के ज़रिए किया जाता है. अगर राजनीतिक चिंतन के इतिहास पर नज़र डालें तो समाजवाद का उदय उन्नीसवीं शताब्दी के मज़दूर आंदोलन से बहुत पहले का है. प्राचीन ग्रीस के दार्शनिक प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिक में यह विचार मिलता है.

 
 
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