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पटरियों से ऊपर चलने वाली ट्रेन
 

 
 
मैगलेव ट्रेन
मैगलेव ट्रेन पटरियों से ऊपर उठकर चलती है
मैग्लेव ट्रेन पटरियों से कुछ इंच ऊपर हवा में कैसे चलती है. पूछते हैं सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश से इंतेख़ाब जीलानी.

मैग्लेव या मैग्नैटिक लैविटेशन ट्रेन इलैक्ट्रोमैग्नैटिक शक्ति के बल पर कोई 10 मिलीमीटर ऊपर हवा में चलती है. यह प्रणाली अब तक की प्रणालियों की तुलना में सबसे तीव्र गति की है और 500 से 580 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार तक पहुंच सकती है जो जैट विमान की गति होती है. दुनिया की सबसे पहली मैग्लेव ट्रेन चीन के शंघाई शहर में शुरु हुई जो यात्रियों को 250 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत रफ़्तार से शंघाई हवाई अड्डे पहुंचाती है. तीस किलोमीटर का ये सफ़र 7 मिनट 20 सैकेंड में पूरा हो जाता है. मैग्लेव तकनोलॉजी में ट्रेन को ऊपर उठाने के लिए रेल की पटरी के नीचे शक्तिशाली चुम्बक लगाया जाता है. इस तकनोलॉजी का लाभ ये है कि इसमें बहुत गति से सफ़र तय होता है और क्योंकि ट्रेन पटरियों पर नहीं चलती इसलिए पहिए या पटरियां घिसती नहीं. लेकिन यह बहुत मंहगी तकनोलॉजी है और इसके लिए सारी रेल पटरियां बदलनी पड़ेंगी.

स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन या सेज़ की बड़ी चर्चा है. भारतीय वायुसेना के प्रेम प्रकाश प्रियदर्शी ने पुणे से हमें पत्र लिखकर पूछा है कि यह क्या है?

वर्ष 1991 में भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के साथ साथ ऐसे विशेष ज़ोन बनाने की माँग शुरू हुई जहाँ सभी तरह की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों और वहाँ स्थापित होने वाली कारोबार इकाइयों को करों में छूट मिले. इसी को ध्यान में रखते हुए लगभग एक दशक बाद एक अप्रैल वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने एसईज़ेड नीति लागू की. इसका मूल मक़सद निर्यात को बढावा देने के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएँ और मुक्त वातावरण मुहैया कराना था. इसके लिए एक तरफ़ बड़े पैमाने पर ज़मीनें देने का प्रावधान किया गया साथ ही श्रम क़ानूनों को लचीला बनाने और सरकारी नियम क़ायदों को आसान बनाने का प्रावधान किया गया. ये क्षेत्र विभिन्न निजी उद्योग समूहों द्वारा विकसित किए जा रहे हैं और कोई 300 ऐसे क्षेत्र तय किए गए हैं जिनमें से 67 को स्वीकृति मिल गई है. लेकिन इनका विरोध भी हो रहा है क्योंकि इसके लिए जिस ज़मीन का अधिग्रहण हो रहा है उसपर किसान अपना जीवन बसर करते हैं. उन्हें डर है कि ज़मीन जाएगी तो उनकी आजीविका का क्या होगा. मुआवज़ा मिल रहा है लेकिन पर्याप्त नहीं है. इसलिए अब ये बात उठाई जा रही है कि केवल बंजर ज़मीन का अधिग्रहण होना चाहिए. और 1884 का भू अधिग्रहण क़ानून जिसमें 1984 में संशोधन किया गया उस पर पुनर्विचार की बात शुरू हो गई है.

अहमदाबाद से अमित अमरीका की अंतरिक्षयात्री सुनीता विलियम्स के बारे में जानना चाहते हैं.

सुनीता विलियम्स

सुनीता विलियम्स का जन्म 19 सितम्बर 1965 को अमरीका के ओहायो राज्य के यूक्लिड नगर में हुआ. उनके पिता डॉ दीपक पांड्या एक जाने-माने तंत्रिका विज्ञानी हैं जिनका संबंध गुजरात से है. मां बॉनी पांड्या स्लोवेनिया की हैं. सुनीता ने 1987 में संयुक्त राष्ट्र की नौसैनिक अकादमी से स्नातक उपाधि ग्रहण की. 1995 में उन्होंने फ़्लोरिडा इंस्टिट्यूट ऑफ़ टैक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग में एम ए की डिग्री हासिल की. जून 1998 में उनका अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा में चयन हुआ और प्रशिक्षण शुरू हुआ. इस समय वे अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र में काम कर रही हैं. सुनीता भारतीय मूल की दूसरी महिला हैं जो अमरीका के अंतरिक्ष मिशन पर गई हैं. सुनीता विलियम्स ने सितंबर/अक्तूबर 2007 में भारत का दौरा भी किया.

स्पेन से विकी पूछते हैं कि एक विकसित देश बनने के लिए प्रति व्यक्ति औसत आय कितनी होनी चाहिए. जैसे स्पेन की 25 हज़ार डॉलर सालाना है.

विकी जी, किसी देश को विकसित केवल इस आधार पर नहीं माना जा सकता कि उसकी प्रति व्यक्ति औसत आय कितनी है. यह कई बातों पर निर्भर करता है. अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत है, औद्योगीकरण कितना है, मानव विकास तालिका में वह देश कहाँ है, यानी औसत आयु, साक्षरता, शिक्षा और जीवन स्तर कैसा है, लोगों का स्वास्थ्य कैसा है बच्चों की स्थिति कैसी है आदि.

सिंधू नदी कहाँ से निकलती है और सिंधी समाज से इसका क्या संबंध है. यह सवाल किया है संयुक्त अरब अमीरात से विक्रम शर्मा ने.

सिंधू नदी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे लंबी नदी है. यह तिब्बत के पठार से निकलती है और लद्दाख, बल्तिस्तान, गिलगित, जम्मू कश्मीर, पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत से होती हुई अरब सागर में जा समाती है. इसमें बीस नदियों का पानी आकर मिलता है जिनमें चेनाब, रावी, सतलज, झेलम, ब्यास प्रमुख हैं. सिंधी समाज का इस नदी से गहरा रिश्ता है क्योंकि मौजूदा पाकिस्तान के सिंध इलाके और इसमें रहने वालों का नाम इसी नदी पर पड़ा है.

 
 
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