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गुरुवार, 20 दिसंबर, 2007 को 17:35 GMT तक के समाचार
 
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लैला-मजनूँ पर हिंदी फ़िल्में...
 

 
 
लैला-मजनूँ की दास्तान
ऋषि कपूर वाली लैला-मजनूँ काफ़ी लोकप्रिय हुई
दिलालपू, सालमारी, कटिहार बिहार से मास्टर सिबतैन पवानी ने पूछा है कि लैला मजनूँ की प्रेम कहानी पर आधारित फ़िल्म सबसे पहले किसने बनाई.

लैला मजनूँ की प्रेम कहानी पर हिंदी में पहली फ़िल्म इसी नाम से 1953 में ऑल इंडिया पिक्चर्स के बैनर तले बनी थी जिसके निर्देशक थे - अमरनाथ. उस फ़िल्म में बेगम पारा, नूतन, रतन कुमार, शम्मी कपूर आदि कलाकारों ने काम किया था. उसके बाद हरनाम सिंह रवैल ने रिशी कपूर और रंजीता को लेकर लैला मजनूँ फ़िल्म बनाई थी जो 1976 में प्रदर्शित हुई. उसमें गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और संगीत मदन मोहन का था. फ़िल्म बनाने के दौरान ही 1975 में मदन मोहन का देहांत हो गया और फिर संगीत पूरा करने की ज़िम्मेदारी जयदेव को सौंपी गई थी. यह फ़िल्म काफ़ी पसंद की गई थी और इसके गीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुए थे. लैला मजनूँ की प्रेम कहानी पर ही आधारित एक अन्य फ़िल्म के आसिफ़ ने लव एंड गॉड यानी मोहब्बत और ख़ुदा के नाम से 1970 के दशक में बनानी शुरू की थी. मुख्य भूमिका के लिए गुरूदत्त और निम्मी को चुना गया लेकिन 1964 में गुरूदत्त का देहांत हो गया और फ़िल्म अधर में लटक गई. फिर संजीव कुमार को चुना गया और फ़िल्म की शूटिंग चल ही रही थी कि मार्च 1971 में 47 वर्ष की अवस्था में ख़ुद के आसिफ़ का देहांत हो गया. फ़िल्म ठंडे बस्ते में चली गई. कई साल बाद 1986 में के आसिफ़ की पत्नी अख़्तर आसिफ़ ने उस फ़िल्म को पूरा करने का बीड़ा उठाया और फ़िल्म जैसे-तैसे प्रदर्शित की गई.

शेरपूर, वैशाली, बिहार से हमारे अनेक श्रोताओं ने एक सवाल लिख भेजा है कि पाकिस्तान के हालात के सिलसिले में हाल के दिनों में समाचारों में पीसीओ शब्द बहुत सुनने में आया है. यह सवाल पूछने वाले श्रोताओं के नाम हैं – कृष्णकांत ठाकुर, रामसागर सिंह, सुषमा कुमारी और कुमारी अनामिका.

जैसा कि हम सब जानते हैं - पाकिस्तान में गत तीन नवंबर 2007 को आपातकाल लगाया गया था. पीसीओ का मतलब है प्रोविज़नल कांस्टीट्यूशन ऑर्डर यानी अस्थाई संवैधानिक आदेश. जब सरकार संविधान के तहत अपना कामकाज ना चला पाए तो वह संविधान के दायरे से बाहर निकलकर काम करती है और ऐसा एक और संविधान के ज़रिए किया जाता है जिसे अंतरिम संविधान या अस्थाई संविधान का नाम दिया जाता है. सरकार अस्थाई संविधान के बारे में कहती है कि जब हालात सामान्य हो जाएंगे तो यह नहीं रहेगा. पाकिस्तान में जब भी आपातकाल लगाया जाता है तो यह नाम अक्सर सुनने में आता है. अस्थाई संवैधानिक आदेश लागू होने की स्थिति में लोगों को मानवाधिकार स्थगित हो जाते हैं और सरकार की विभिन्न एजेंसियों और विभागों को ऐसे अधिकार मिल जाते हैं जिनके तहत सरकारी कामकाज चलाने के लिए वे लगभग जो चाहें कर सकते हैं. यानी देश में सामान्य स्थिति में लोगों को जो अधिकार हासिल होते हैं वे अस्थाई संवैधानिक आदेश लागू होने की स्थिति में नहीं मिलते हैं.

आनंद वर्द्धन शर्मा ने ग्राम छोटी बलिया ज़िला बेगूसराय, बिहार से अब तक के संयुक्त राष्ट्र महासचिवों के नाम पूछे हैं और यह भी पूछा है कि वे किस देश के नागरिक थे.

आपके सवाल का जवाब ये है कि 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से अब तक सात महासचिव रह चुके हैं और मौजूदा महासचिव बान की मून आठवें महासचिव हैं. यहाँ बताते चलें कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव का कार्यकाल आमतौर पर पाँच साल का होता है. पहले महासचिव ट्रिग्वेली नॉर्वे के रहने वाले थे जो 1946 से 1952 तक इस पद पर रहे. स्वीडन के राजनयिक डाग हैमरशल्ड 1953 से लेकर 1961 तक, म्यामाँर के राजनयिक यू थांट 1961 से 1971 तक ऑस्ट्रिया के राजनयिक कुर्त वाल्दहीम 1972 से 1981 तक, पेरू के राजनयिक पेरेज़ डी कुइयार 1982 से 1991 तक इस पद पर रहे. इन सभी ने दो-दो कार्यकाल पूरे किए. मिस्र के राजनयिक बुतरस बुतरस ग़ाली 1992 में महासचिव बने और सिर्फ़ एक ही कार्यकाल के लिए इस पद पर रहे. 1996 में घाना के राजनयिक कोफ़ी अन्नान भी दो कार्यकाल तक इस पद पर रहे. मौजूदा महासचिव बान की मून ने जनवरी 2007 में इस पद की ज़िम्मेदारी संभाली है और उनका संबंध दक्षिण कोरिया से है.

ईमेल के ज़रिए डॉक्टर ईश्वर गहलौत ने बनासकाँठा, गुजरात से सवाल भेजा है कि लोकसभा और राज्य सभा में क्या अंतर है और उनके कार्य क्या हैं.

ईश्वर गहलौत जी, ये तो हम सब जानते ही हैं कि भारत में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली की सरकार है जिसके तीन अहम हिस्से होते हैं – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. विधायिका क़ानून बनाने का काम करती है और भारतीय विधायिका संसद है जिसके दो सदन हैं – राज्य सभा और लोक सभा. राज्य सभा को उच्च सदन और लोक सभा को निम्न सदन भी कहा जाता है. लोकसभा का चुनाव सीधे तौर पर हर पाँच साल में होना चाहिए जिसमें आम लोग मतदान करते हैं. राज्य सभा का चुनाव राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य करते हैं यानी इसके गठन में आम लोग सीधे तौर पर हिस्सा नहीं लेते हैं. राज्य सभा एक स्थाई सदन है और यह कभी भंग नहीं होता मगर इसके सदस्यों का कार्यकाल छह साल होता है. इन दोनों सदनों का मुख्य कार्य क़ानून बनाना और अहम मुद्दों पर चर्चा करना है. कोई भी विधेयक जब दोनों सदनों में पारित हो जाता है तो उसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा जाता है और राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद वह विधेयक क़ानून बन जाता है. आमतौर पर लोकसभा जिस विधेयक को पारित कर देती है वह राज्य सभा में चर्चा के लिए जाता है और वह चाहे तो किसी विधेयक को फिर से विचार के लिए लोक सभा को लौटा सकती है लेकिन वित्त मामलों में लोक सभा को विशेषाधिकार हासिल हैं. राज्य सभा लोक सभा से पारित हो चुके किसी वित्त विधेयक को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकती यानी उसे मंज़ूरी देनी ही होगी.

 
 

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