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शनिवार, 19 जनवरी, 2008 को 14:49 GMT तक के समाचार
 
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कृत्रिम बारिश का फॉर्मूला...
 

 
 
नक़ली बारिश के एक फ़ॉर्मूला होता है
दिल्ली से बालकृष्ण पूछते हैं कि कृत्रिम वर्षा की तकनीक कैसे काम करती है और यह कितनी व्यवहारिक है.

कृत्रिम वर्षा तकनीक के तीन चरण हैं. पहले में रसायनों का इस्तेमाल करके उस इलाक़े के ऊपर वायु के द्रव्यमान को ऊपर की तरफ़ भेजा जाता है जिससे वे वर्षा के बादल बना सकें. इस प्रक्रिया में कैल्शियम क्लोराइड, कैल्शियम कार्बाइड, कैल्शियम ऑक्साइड, नमक और यूरिया के यौगिक, और यूरिया और अमोनियम नाइट्रेट के यौगिक का प्रयोग किया जाता है. ये यौगिक हवा से जल वाष्प को सोख लेते हैं और संघनन की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं. दूसरे चरण में बादलों के द्रव्यमान को नमक, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, सूखी बर्फ़ और कैल्शियम क्लोराइड का प्रयोग करके बढ़ाया जाता है और तीसरे चरण में सिल्वर आयोडाइड और सूखी बर्फ़ जैसे ठंठा करने वाले रसायनों की बादलों में बम्बारी की जाती है जिससे बारिश होने लगे. इस तकनीक को 1945 में विकसित किया गया था और आज कोई 40 देशों में इसका प्रयोग हो रहा है. अमरीका में एक टन वर्षा का पानी बनाने में 1.3 सैंट का ख़र्च आता है जबकि ऑस्ट्रेलिया में यह मात्र दशमलव तीन सैंट है जो काफ़ी सस्ता हुआ. लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि इस तकनीक में प्रयोग होने वाले रसायन पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर सकते हैं.

दलजीत सिंह पूछते हैं कि धर्म की परिभाषा क्या है.

धर्म भारतीय संस्कृति का एक ऐसा शब्द है जिसे पारिभाषित कर पाना या सटीक अर्थ बता पाना बहुत कठिन रहा है. क्योंकि इसके दायरे में इतने व्यापक विचार और अर्थ आते हैं कि किसी एक भाव को ही सही मान लेना भूल होगी. धर्म संस्कृत की धृ धातु से बना है जिसके विभिन्न अर्थों में आचार, व्यवहार, नियम, क़ानून, गुण, न्याय, नैतिकता आदि शामिल हैं. ऋग्वेद में धर्म शब्द का प्रयोग कोई 150 बार हुआ है जहां इसका प्रयोग नियामक धारक या संभरण के रूप में हुआ है. धर्म को अगर हम सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक तीन पहलुओं से देखें तो किसी भी व्यक्ति के लिए उसका आचार-व्यवहार, पूजा अर्चना, कर्मकांड और चिन्तन ये तीन अर्थ अहम हो जाते हैं. उपनिषदों में धर्म को सदाचार और सत्य के रूप में महत्व दिए जाने के कारण इसका गूढ़ अर्थ दार्शनिक हो गया. महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में और महर्षि व्यास ने महाभारत और गीता में धर्म की विस्तृत चर्चा की है. रामायण में बालि से वार्तालाप करते हुए राम धर्म के बारे में कहते हैं कि धर्म बड़ा ही सूक्ष्म, बड़ी मुश्किल में समझ में आने वाला, सत्य का पालन करने वालों का आधार और सभी प्राणियों की आत्मा में रहने वाला वो तत्व है जिसके आधार पर आत्मा शुभ और अशुभ दोनों को पहचान लेता है.

मच्छरों की आयु कितनी होती है और ये एक बार में कितने बच्चे पैदा करते हैं. यह सवाल किया है ग्राम डुमरी, जमुई बिहार के सेंटू कुमार सिंह ने.

मच्छर

एक औसत मादा मच्छर की आयु तीन से सौ दिन तक हो सकती है जबकि नर मच्छर 10 से 20 दिन जीता है. मादा मच्छर एक बार में कोई 250 अंडे देती है और उन्हें मच्छर बनने में 10 से 20 दिन लगते हैं.

डेंगु का मच्छर क्या केवल दिन में काटता है. जनता बाज़ार, सारण बिहार से रीना कुमारी जानना चाहती हैं.

डेंगु बुख़ार फ़्लैवि वायरस के कारण फैलता है और यह वायरस हमारे शरीर में पहुंचाने का काम करते हैं एडैस ईजिप्टाई मच्छर. ये मच्छर इंसानो के आस पास रहते हैं और दिन में काटते हैं. ये मच्छर पीला बुख़ार और चिकिनगुनिया जैसे वायरस भी फैलाता है. ये मच्छर आकार में छोटा होता है और इसके शरीर पर सफ़ेद धब्बे से होते हैं. जैसा कि आप जानते हैं मादा मच्छर ही काटती है और वो भी इसलिए कि उसे अंडे तैयार करने के लिए ख़ून की ज़रूरत होती है. एडैस ईजिप्टाई मादा मच्छर चालाक होती है. वह न तो घुनघुन करके अपने शिकार को सचेत करती है और आमतौर पर पीछे या पैरों में काटती है. और बड़ी तेज़ी से उड़ जाती है. और क्योंकि वायरस उसकी लाला ग्रन्थि में होता है इसलिए काटते समय शिकार के शरीर में प्रवेश कर जाता है.

पश्चिमी चंपारण बेतिया बिहार से राकेश पासवान ने पूछा है कि केरल को छोड़कर वह कौन सा राज्य है जहां महिलाओं की साक्षरता दर अधिक है.

सन 2001 की जनगणना के हिसाब से भारत में पुरुषों की साक्षरता दर 75.96 प्रतिशत और महिलाओं की 54.28 प्रतिशत है. केरल में 94.20 प्रतिशत पुरुष और 87.86 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं और दूसरे नंबर पर आता है मीज़ोराम जहां 90.69 प्रतिशत पुरुष साक्षर हैं और 86.13 प्रतिशत महिलाएं. और जानते हैं इस सूची में सबसे पीछे है बिहार जहां 60.32 प्रतिशत पुरुष साक्षर हैं और 33.57 प्रतिशत महिलाएं. लेकिन किसी भी राज्य में महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से अधिक नहीं है.

रात के समय पतंगे रोशनी के चारों ओर क्यों चक्कर लगाते रहते हैं. यह सवाल किया है ग्राम धुरिया कुशीनगर उत्तर प्रदेश से गौरव प्रकाश ने.

वैज्ञानिकों का मानना है कि लाखों करोड़ों सालों से पतंगे चंद्रमा की रोशनी के ज़रिए अपना रास्ता ढूंढते आए हैं. जानते हैं, ये एक रात में 300 मील तक का सफ़र कर लेते हैं. मान लीजिए इन्हे उत्तर दिशा में जाना है तो ये ऐसे उड़ते हैं जिससे उगता चंद्रमा इनकी दाईं तरफ़ रहे. चंद्रमा इतनी दूर है कि लम्बा सफ़र करने के बावजूद पतंगे और चंद्रमा का कोण न के बराबर बदलता है और वे सही दिशा में उड़ते चले जाते हैं. जहां तक मानव कृत रोशनी का सवाल है वह नज़दीक होती है इसलिए अधिक चमकदार दिखाई देती है. पतंगा दिशा निर्देश के लिए उसका उपयोग करता है लेकिन कुछ ही दूर जाने पर उसे पता चलता है कि रोशनी तो पीछे है. इसे ठीक करने के लिए वह रोशनी की तरफ़ जाता और इसतरह उसी के चक्कर लगाता रहता है.

क्या कक्षा में स्थापित उपग्रह को पृथ्वी से देखना संभव है. ये सवाल किया है गोराडीह, भागलपुर बिहार से डॉक्टर हेमंत कुमार ने.

पृथ्वी की एक तस्वीर

किसी भी उपग्रह को ज़मीन से देखना तभी संभव है अगर उसपर प्रकाश हो या वो बहुत बड़ा हो अन्यथा उसे दूरबीन या किसी उपकरण की सहायता से ही देखा जा सकता है. जो उपग्रह पृथ्वी से भेजे जाते हैं उनका आकार बड़ा नहीं होता. वे आमतौर पर चार वर्गमीटर के होते हैं और उनपर सौर पैनल लगे होते हैं. अगर वो पृथ्वी के पास हों जैसे दो सौ या तीन सौ किलोमीटर दूर हों तो भी शायद उन्हें देखना संभव हो लेकिन अधिकांश उपग्रह कई हज़ार किलोमीटर दूर होते हैं. हां कौन सा उपग्रह कब कहां और किस जगह से दीखेगा वह बता पाना तो संभव है लेकिन उन्हे बिना किसी दूरबीन के देख पाना संभव नहीं है.

ग्राम मड़मो, हजारीबाग़ झारखंड से रामचन्द्र महतो ने पूछा है कि सबसे बड़ा अंडा किस पक्षी का होता है.

दुनिया के सबसे बड़े पक्षी ऑस्ट्रिच का अंडा ही सबसे बड़ा होता है. आमतौर पर एक नर ऑस्ट्रिच कई मादाओं के साथ रहता है और जब ये अंडे देती हैं तो एक साझा घोंसले में ही देती हैं. यह घोंसला ज़मीन में 30 से 60 सेन्टीमीटर गहरा होता है और इसमें एक बार में 15 से 60 अंडे तक हो सकते हैं. एक औसत अंडा छ इंच लम्बा, पाँच इंच चौड़ा और कोई डेढ़ किलो वज़न का होता है. ये अंडे चमकदार सफ़ेद रंग के होते हैं. इन अंडों को दिन में मादा ऑस्ट्रिच और रात में नर ऑस्ट्रिच सेते हैं. और 35 से 45 दिनों में इनमें से बच्चे निकल आते हैं.

जैन धर्म के अनुसार पृथ्वी चपटी है जबकि विज्ञान कहता है कि दुनिया गोल है. आख़िर सच क्या है. यह सवाल किया है पुणे महाराष्ट्र से अभिषेक जैन ने.

कई प्राचीन सभ्यताओं में पृथ्वी को चपटा माना गया है. प्राचीन ग्रीस में अरस्तू जैसे बड़े बड़े दार्शनिकों से लेकर मैसोपोटामिया और चीन के विद्वानों तक का यही कहना था कि पृथ्वी चपटी है. लेकिन जैसे जैसे वैज्ञानिक प्रगति हुई यह स्पष्ट हो गया कि पृथ्वी गोलाकार है. और अब तो पृथ्वी के सैटलाइट चित्र भी उपलब्ध हैं जिसमें हम और आप इस नील ग्रह को देख सकते हैं.

ढोली सकरा बिहार से दीपक कुमार दास ने बीबीसी सिंफ़नी ऑर्कैस्ट्रा के बारे में जानकारी मांगी है.

बीबीसी सिंफ़नी ऑर्कैस्ट्रा की स्थापना 1930 में हुई थी. इसके पहले मुख्य संचालक थे एड्रियन बोल्ट. लंदन के सुप्रसिद्ध रॉयल ऐल्बर्ट हॉल में होने वाले सालाना संगीत सम्मेलन में इस ऑर्कैस्ट्रा की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है सम्मेलन की शुरुआत और अंत इसी ऑर्कैस्ट्रा से होती है.

 
 

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