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मंगलवार, 24 फ़रवरी, 2009 को 05:19 GMT तक के समाचार
 
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'टचवुड' में कोई लकड़ी है या फिर!
 

 
 
'टचवुड' में कोई लक़ड़ी है या फिर!
'टचवुड' मुहावरे की कहानी ख़ासी दिलचस्प है
पश्चिमी देशों में एक अंधविश्वास है जिसमें लोग लकड़ी छूकर कहते हैं टच वुड. गोलपहाड़ी जमशेदपुर से जंगबहादुर सिंह और उमा सिंह ने पूछा है कि यह अंधविश्वास कैसे उपजा.

जब जीवन में कुछ अच्छा हो रहा हो तो आपको यह डर रहता है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए. बस इसीलिए आप लकड़ी छूकर कहते हैं टच वुड. अब सवाल ये कि यह अंधविश्वास कैसे उपजा. तो इसकी कई व्याख्याएं हैं. प्राचीन धार्मिक विश्वास ये था कि कुछ पेड़ पवित्र आत्माओं वाले होते हैं जिन्हें छूकर या जिनपर दस्तक देकर आप अपनी अच्छी क़िस्मत के लिए आभार व्यक्त करते हैं. ग्रीस के लोग ये मानते थे कि अगर आप बांज के पेड़ को छुएं तो सीधे देवाधिदेव ज़ूस से सम्पर्क कर सकते हैं, जो आपको किसी भी मुसीबत से बचा लेंगे. ईसाइयों के लिए लकड़ी, सलीब का प्रतीक है और क्योंकि ईसा मसीह को सलीब पर लटकाया गया था इसलिए लोग उसे छूकर अच्छे भाग्य के लिए प्रार्थना करते थे. इसकी एक यहूदी व्याख्या भी है. यहूदियों के मंदिर जिन्हें सिनगॉग कहा जाता है वो सबसे सुरक्षित स्थान माने जाते थे. सन 1500 के आस पास यहूदी अपनी जान बचाने के लिए सिनगॉग में शरण ले रहे थे. भीतर मौजूद यहूदियों की सुरक्षा के लिए उन्होंने दस्तक देने का एक ख़ास तरीक़ा निकाला था. इससे बहुतों की जान बची इसलिए लकड़ी पर दस्तक देना शुभ माना जाने लगा.

शेयर बाज़ार में डिराइवेटिव्स किन्हें कहते हैं. बिहार से सुमंत ने.

डिराइवेटिव यानी कहीं से निकाला गया या लिया गया. किसी भी कंपनी के शेयर आंशिक स्वामित्व का प्रमाण पत्र होते हैं. लेकिन डिराइवेटिव्स में आप किसी उत्पाद, बॉंड, शेयर या मुद्रा में पैसा लगाते हैं. यह एक तरह का सट्टा होता है जिसमें बॉंड, शेयर या मुद्रा के मूल्य के बारे में आप कहते हैं कि एक निश्चित समय में यह इतना बढ़ेगा या घटेगा. इसका मुख्य उद्देश्य होता है भावों में कमी बेशी से होने वाले परिवर्तन से लाभ कमाना. बड़ी बड़ी वित्तीय संस्थाएं इसमें क्रियाशील होती हैं. जो कम समय में पैसा कमाकर बाज़ार से निकलना चाहती हैं. इसमें पैसा डूबता भी बहुत है इसलिए यह ख़तरनाक खेल है और छोटे निवेशकों को इससे दूर रहना चाहिए.

बाड़मेर राजस्थान से गणपत सिंह राजपुरोहित ने पूछा है कि भारत में डाक सेवा की स्थापना कब हुई.

इंडिया पोस्ट
भारत में डाक सेवा की स्थापना सन 1764 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी

भारत में डाक सेवा की स्थापना सन 1764 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी. कंपनी के काम काज में मदद के लिए मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता में डाक घर खोले गए. फिर 1773 में जब वॉरैन हेस्टिंग्स भारत के पहले गवर्नर जनरल बनकर आए तो उन्होने इस सेवा को आम लोगों के लिए उपलब्ध कराया. जानती हैं ममता जी 100 मील की दूरी तक एक चिट्ठी भेजने में 2 आने ख़र्च होते थे. और यह वसूली दो तरह से होती थी. या तो भेजने वाला दे या पाने वाला. डाक टिकटों का इस्तेमाल 1 जुलाई 1852 में सिंध ज़िले से शुरु हुआ और 1854 में पूरे देश में डाक टिकट प्रयोग होने लगे. भारतीय डाक, दुनिया की सबसे विस्तृत डाक सेवा है जिसके देश भर में कुल एक लाख 55 हज़ार 333 डाकघर हैं.

भोपाल से प्रदीप मालवीय ने महाभारत काल की गांधारी के बारे में पूछा है.

महाभारत महाकाव्य के अनुसार, गांधारी, गांधार के राजा सुबल की पुत्री थीं जिनका विवाह कुरु राजकुमार धृतराष्ट्र से हुआ. जब गांधारी को पता चला कि धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हैं तो उन्होने यह सोचकर अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली कि देखने का सुख अगर उनके पति को प्राप्त नहीं तो उन्हे क्यों हो. इस त्याग ने उन्हे गहरी आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की. गांधारी ने सौ पुत्रो को जन्म दिया जिन्हे कौरवों के रूप में जाना जाता है. महाभारत में कौरवों को खलनायक के रूप में दिखाया गया है लेकिन गांधारी का चित्रण बहुत अच्छा है. उन्होने बार बार अपने पुत्रों को धर्म का आचरण करने और पांडवों के साथ शांति बनाए रखने का आग्रह किया. लेकिन उनकी एक न चली और युद्ध हुआ जिसमें उनके सभी पुत्र मारे गए. अपनी व्यथा से आहत गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया. बाद में वो अपने पति धृतराष्ट्र और कुन्ती के साथ हिमालय पर चली गईं जहां जंगल में लगी आग में वो मारे गए.

दुनिया की सबसे तीव्र गति से चलने वाली ट्रेन का क्या नाम है, जानना चाहते हैं वैशाली बिहार से शंभुनाथ पुरी.

फ़्रांस की टीजीवी सबसे तेज़ गति से चलने वाली ट्रेन है जो 3 अप्रैल 2007 को 574.8 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार तक पहुंच गई थी.

अरुणाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और राज्यपाल कौन थे. ये सवाल किया है चिरगांव, झांसी उत्तर प्रदेश से आरती निरंजन ने.

अरुणाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे गेगॉंग अपांग और पहले राज्यपाल भीष्म नारायण सिंह बने.

हिमालय में स्थित मानसरोवर किस देश के अधिकार में है और इससे कितनी नदियां निकलती हैं. अंबेदकर नगर उत्तर प्रदेश से राजेश कुमार पांडेय.

मानसरोवर तिब्बत में है जिसे चीन का स्वायत्त क्षेत्र शिन्जांग कहा जाता है. यह दुनिया की सबसे ऊंची मीठे पानी की झील है. सतलज, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और घाघरा नदियों के स्रोत इसी के आस पास माने जाते हैं.

नई दिल्ली से मनोज कुमार ने पूछा है कि सांसद और विधायक में क्या अंतर है.

जैसा कि नाम से स्पष्ट है भारतीय संसद के सदस्यों को सांसद कहते हैं और विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं के सदस्यों को विधायक कहते हैं.

कुरहेला बहादुर गंज किशनगंज बिहार से एक अनाम पोस्टकार्ड आया है जिसमें पूछा गया है कि शेक्सपीयर के माता पिता का क्या नाम था.

अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध कवि और नाटककार विलियम शेक्सपीयर के पिता का नाम था जॉन शेक्सपीयर और मां थीं मैरी आर्डन.

नरकटियागंज पश्चिमी चम्पारण बिहार से विनय कुमार, मनीष कुमार और विकास कुमार ने पूछा है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर और रवीन्द्रनाथ टैगोर क्या एक ही थे.

बंगला भाषा में उनके नाम का उच्चारण होता है रॉबीन्द्रनाथ ठाकूर. अंग्रेज़ी में ठ ध्वनि है नहीं इसलिए बिगड़कर टैगोर हो गया.

हरेवा, सहरसा बिहार से मोहम्मद रज़ा आबदी यह पूछते हैं कि अंटार्कटिक महाद्वीप पहुंचने वाला पहला व्यक्ति कौन था और कब पहुंचा.

अंटार्कटिक, पृथ्वी का धुर दक्षिणी महाद्वीप है और सबसे पहले नौरवे के अन्वेषक रोआल्ड ऐमंडसन वहां पहुंचे थे. उनका जन्म सन 1872 में, समृद्ध जहाज़ मालिकों और कप्तानों के परिवार में हुआ था. उन्होने नौसेना के अधिकारी और वैज्ञानिक के रूप में प्रशिक्षण लिया. सन 1909 में ऐमंडसन ने आर्कटिक पर विजय पाने की योजना बनाई, लेकिन जब अमरीका के रॉबर्ट ई पियरे ने वहां अपना झंडा गाढ़ दिया तो ऐमंडसन ने अंटार्कटिक जाने की योजना बनाई. चार साथियों, 52 कुत्तों और 4 स्लैजिस लेकर वो 19 अक्टूबर 1911 को निकल पड़े और प्राकृतिक विपदाएं झेलते हुए 14 दिसम्बर 1911 को दक्षिणी ध्रुव पहुंच गए.

अब डॉक्टर से पूछिए....

कुवैत से सैय्यद मोहम्मद ने गुर्दे में होने वाली पथरी के बारे में पूछा है कि यह कैसे बनती है और इसे कैसे निकाला जा सकता है.

गुर्दे की पथरियां तब बनती हैं जब पेशाब में मौजूद लवण और खनिज, गुर्दे के भीतर ठोस कणों का रूप ले लेते हैं. आमतौर पर ये पेशाब के साथ बाहर निकल जाते हैं लेकिन कई बार ये बढ़ने लगते हैं. कभी कभी ये गुर्दे से निकलकर पेशाब की थैली को जोड़ने वाली नली जिसे यूरेटर कहते हैं उसमें अटक जाते हैं. इनसे कमर में भयंकर पीड़ा होती है, पेशाब में ख़ून आने लगता है, घुम्मी आने लगती है, बुख़ार और जाड़ा चढ़ता है. गुर्दे की पथरियां होती क्यों हैं इसके कई कारण हैं. कम पानी पीने से, वंशानुगत कारणों से, थायरॉएड की दवाओं के प्रयोग से, अधिक प्रोटीन युक्त भोजन से, ख़ून में यूरिक ऐसिड के बढ़ने से. इनका इलाज संभव है. आम तरीक़ा ये है कि गुर्दे की पथरी का पता लगाकर फिर लिथोट्रिप्टोर नामकी मशीन से तरंगे भेजकर इन्हे तोड़ा जाता है जिससे ये पेशाब के ज़रिए निकल सकें. बड़ी पथरी को शल्य चिकित्सा द्वारा निकाला जाता है.

 
 
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