पाकिस्तान ने कहा रिपोर्ट 'बकवास'

तालिबान
Image caption रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के तालिबान से संबंध अनुमान से अधिक गहरे हैं

पाकिस्तानी अधिकारियों ने ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के तालिबान से सीधे संबंध होने के बारे में आई एक रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज कर दिया है.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आईएसआई अफ़ग़ान विद्रोहियों को धन, प्रशिक्षण और शरण दे रही है.

ये रिपोर्ट तालिबान के नौ कमांडरों से बात करने के बाद तैयार की गई है जिन्होंने बताया कि आईएसआई के एजेंटों ने तालिबान की शीर्ष संस्था की बैठकों में भी हिस्सा लिया है.

पाकिस्तान ने इस रिपोर्ट पर गहरी नाराज़गी प्रकट करते हुए इसे ‘बकवास’ और पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार बताया है.

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि पूर्व में भी इस तरह के आरोप लगाए गए हैं लेकिन उनके पक्ष में कभी भी कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं दिया गया.

रिपोर्ट

रिपोर्ट के लेखक, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में विश्लेषक मैट वॉल्डमैन का कहना है कि तालिबान और आईएसआई के बीच संबंध के बारे में संदेह काफ़ी पहले से प्रकट किए जाते रहे हैं लेकिन इस बार पहली बार दोनों के संबंध होने के पुख़्ता प्रमाण मिले हैं.

मैट वॉल्डमैन ने कहा,"बात सीमित मदद देने या कभी-कभार मदद देने से कहीं बड़ी है. आईएसआई बहुत बड़े स्तर पर मदद दे रही है."

रिपोर्ट के अनुसार जिन नौ तालिबान कमांडरों से बात की गई उन्होंने बताया कि आईएसआई के एजेंटों ने तालिबान की सर्वोच्च संस्था – क्वेटा शूरा – की बैठकों में हिस्सा लिया.

उन्होंने ये भी दावा किया कि आईएसआई ने ये मदद अफ़ग़ानिस्तान में भारत का प्रभाव कम करने के इरादे से दी.

Image caption रिपोर्ट तालिबान के नौ कमांडरों से बात करने के बाद तैयार की गई

मैट वॉल्डमैन ने कहा,"तालिबान के पूर्व मंत्रियों, एक पश्चिमी विश्लेषक और काबुल स्थित संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन कथनों की पुष्टि की है जिन्होंने बताया कि तालिबान मुख्य रूप से आईएसआई और खाड़ी के देशों की आर्थिक मदद पर निर्भर रहता है."

पाकिस्तान पर पहले भी अपनी विदेश नीति के हितों के लिए तालिबान से साँठ-गाँठ रखने का आरोप लगता रहा है और सबसे पहले 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ की चढ़ाई के बाद आईएसआई ने अफ़ग़ान विद्रोहियों को मदद देनी शुरू की.

लेकिन पाकिस्तान 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद से अमरीका का अभिन्न सहयोगी बन गया और अल क़ायदा के ख़िलाफ़ लड़ाई में मदद के बदले में उसे अरबों डॉलर की मदद मिली है.

रिपोर्ट कहती है,"ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पाकिस्तान चौंका देनेवाले स्तर पर दोहरी चाल चल रहा है."

खंडन

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल अतहर अब्बास ने बीबीसी के साथ बात करते हुए रिपोर्ट में लगाए गए सभी आरोपों को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया.

उन्होंने कहा,"ये बिल्कुल बेबुनियाद बात है, पहले भी हम ऐसे आरोपों का खंडन करते रहे हैं. जो रियासतें, या समूह या ख़ुफ़िया एजेंसियाँ हमारी दोस्त नहीं हैं, वे अतीत में भी इस तरह की शोशेबाज़ी करती रही हैं.

"अगर किसी को शक है तो वो हमसे संपर्क करे, हमें बताए कि उसे कहाँ से ये बातें पता चलीं, लेकिन बिना नाम बताए, स्रोत बताए, प्रमाण दिए अगर कोई ऐसी रिपोर्टें बनाता है तो उन रिपोर्टों का कोई मतलब नहीं रह जाता है."

प्रमाण

जानकारों का कहना है कि आईएसआई और तालिबान के संबंधों की बात पहले भी उठाई जाती रही है और आगे भी उठाई जाती रहेगी.

तालिबान मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्ला यूसुफ़ज़ई का कहना है कि स्वयं पाकिस्तान ने इस बात का प्रमाण दिया हुआ है कि तालिबान के साथ उनके क़रीबी रिश्ते हैं.

उन्होंने कहा,"पाकिस्तान ने ख़ुद अमरीका और दूसरे देशों के सामने ये प्रस्ताव रखा था कि अगर वे चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के संकट का कोई सियासी हल निकले और तालिबान से बात की जाए तो पाकिस्तान उसमें मदद कर सकता है."

हालाँकि रहीमुल्ला कहते हैं कि इस बात का प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है कि आईएसआई एजेंट तालिबान की बैठकों में हिस्सा लेते रहे हैं.

वे कहते हैं,"इस बारे में पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है, ये संभव है, अगर वाक़ई अफ़ग़ान तालिबान की शूरा पाकिस्तान में है तो ज़ाहिर है पाकिस्तानी अधिकारियों को इसकी जानकारी होगी, लेकिन यदि ये शूरा अफ़ग़ानिस्तान में है तो ये बात संभव नहीं है."

मगर रहीमुल्ला यूसुफ़ज़ई के अनुसार अभी भी ऐसी जानकारियाँ मिलती हैं कि तालिबान के काफ़ी नेता और कमांडर पाकिस्तान आते हैं या वहाँ छिपे हुए हैं इसलिए तालिबान के पाकिस्तान के लोगों से संपर्क हैं इसे लेकर कोई संदेह नहीं होना चाहिए.

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