पाकिस्तान में बाढ़ की भिन्न तस्वीर

यूरोप के ‘जल उपग्रह’ पाकिस्तान के बाढ़ की एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं.

स्मोस अंतरिक्ष यान में लगे उपकरण दिखाते हैं कि किस तरह पृथ्वी मानसून बारिश के दौरान संतृप्त हो जाती है.

पाकिस्तान के इलाक़ों में पिछले दो हफ्ते में हुई बारिश इतिहास की सबसे भयंकर बारिश मानी जा रही है.

इस आपदा से दो करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं. पाकिस्तान का क़रीब एक लाख 60 हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाक़ा बाढ़ प्रभावित हुआ है.

मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आने वाले दिनों में जब आकड़ों का विश्लेषण अच्छी तरह हो जाएगा तब असली स्थिति का पता चलेगा. स्मोस ऑप्टिकल या रडार सेंसर की तुलना में कमज़ोर है लेकिन यह दो दिन में दुनिया के किसी कोने में किसी भी मौसम में देखने में सक्षम है

यान केर, स्मोस टीम के प्रमुख

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के नए स्मोस उपग्रह ने जो आकड़े उपलब्ध कराए हैं कि उससे मानचित्रों की शृंखला तैयार की गई है.

इन मानचित्रों में साफ़ दिखता है कि कैसे ज़मीन धीरे धीरे गीली होती जा रही है. इन मानचित्रों में दिखता है कि कैसे सिंधु नदी जब अरब सागर में मिलती है तो उसके आसपास की धरती गीली होती है और ऐसा ही गीलापन मानसून के समय अन्य इलाक़ों में देखा गया.

इससे स्पष्ट है कि कितनी ज़बर्दस्त बारिश हुई है.

स्मोस एक वैज्ञानिक उपग्रह है जो पृथ्वी के बारे में नई जानकारियां जुटा रहा है.

इस उपग्रह में आठ मीटर चौड़ा एक रेडियोमीटर लगा हुआ है जो पृथ्वी के धरातल से उठने वाले माइक्रोवेब्स को पकड़ता है. अगर धरातल गीला तो हो माइक्रोवेब्स के सिग्नल बदलते भी हैं.

किसी भी आपदा में राहत कार्यों के लिए सेटेलाइट आकड़ों की मदद ली जाती है और पाकिस्तान के बाढ़ के मामले में दो अगस्त को ही सेटेलाइट से आकड़े जुटाने की कवायद शुरु कर दी गई थी.

आकड़ों की मदद से ये जानकारी जुटाई जाती है कि किस क्षेत्र में कितना पानी है. ज्यादा आकड़ें जुट जाएं तो आने वाले दिनों में बाढ़ की चेतावनी भी दी जा सकती है.

डॉ क्लेयर ग्रुहियर स्मोस में रिसर्चर हैं और फ्रांस में रहती हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि फिलहाल जो आकड़े है वो प्राथमिक हैं. वो कहती हैं, ‘‘ हमने बाढ़ प्रभावित इलाक़ा नहीं देखा बल्कि मिट्टी में जल की मौजूदगी को परखा है.ये दोनों अलग अलग जानकारियां हैं. लेकिन हमने जो जानकारी जुटाई है वो बहुत सटीक बन पड़ी है.’’

स्मोस के प्रमुख जांचकर्ता डॉ यान केर कहते हैं, ‘‘मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आने वाले दिनों में जब आकड़ों का विश्लेषण अच्छी तरह हो जाएगा तब असली स्थिति का पता चलेगा. स्मोस ऑप्टिकल या रडार सेंसर की तुलना में कमज़ोर है लेकिन यह दो दिन में दुनिया के किसी कोने में किसी भी मौसम में देखने में सक्षम है.’’

केर कहते हैं कि स्मोस की टीम इस बात से बेहद खुश है कि उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों से भी अच्छे आकड़े मिल पाए हैं.

यह उपग्रह न केवल ज़मीन में पानी की मौजूदगी को पकड़ता है बल्कि समुद्री जल में नमक के बदलते स्तर को भी भांप सकता है.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.