बाढ़ में नन्ही सी जान

समीना

अल्ला रखी सड़क के पास एक पेड़ की छांव में ख़ामोशी के साथ बैठी थीं, उनकी गोद में उनकी नन्ही सी बच्ची थी जो सिर्फ़ पांच दिन पहले पैदा हुई थी. उसमें कोई हरकत नहीं थी और वह कमज़ोर नज़र आ रही थी.

अल्ला रखी को बाढ़ के कारण अपना गांव छोड़ना पड़ा. उन्होंने बताया कि उनका गांव सक्खर से क़रीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है जहां से वह पैदल चल कर आई हैं.

पांच दिन पहले उनकी बेटी पैदा हुई. बच्ची सड़क के पास पैदा हुई और ऐसे में अल्ला रखी की मदद के लिए न कोई डॉक्टर मौजूद था और न ही कोई दाई मौजूद थी.

मैं इस छोटी सी बच्ची को देखकर चौंक गई. इतनी छोटी सी चीज़, आंखें बंद, अचल, बिना किसी हरकत के---ज़िंदा थी भी या नहीं उसे देखकर पता न चलता था.

अल्ला रखी ने बताया बच्ची की पैदाइश में बहुत मुश्किल हुई, और पैदाइश के बाद उसकी अपनी हालत भी अभी नहीं संभली है.

उन्होंने कहा, "बच्ची दूध बिलकुल नहीं ले रही है. मैं इसे क्या दूं. मेरे पास तो सिर्फ़ चावल हैं और वो तो मैं इसे दे नहीं सकती. डॉक्टर मैं कहां ढूँढूं, मदद के लिए किसके पास जाऊं."

मुझे बच्ची की हालत गंभीर नज़र आ रही थी. और मुझे ये फ़िक्र होने लगी कि अगर उसको किसी डॉक्टर से जल्दी न दिखाया गया तो उसका बचना मुश्किल हो जाएगा.

कोशिश करने का आश्वासन

कुछ मिनट की दूरी पर मुझे एक छोटा सा मेडिकल कैंप दिखा. मैंने वहां मौजूद डॉक्टर फ़हीम से बात की और बच्ची के बारे में बताया और पूछा कि क्या वे उनकी मदद कर सकेंगे.

Image caption अल्ला रखी अपनी पांच दिन की बच्ची के साथ

डॉक्टर साहब बाढ़ पीड़ितों के लिए लगाए गए इस कैंप में लोगों की भीड़ से घिरे हुए थे. वे कहने लगे, "बहुत सारे मरीज़ हैं. हम सभी की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. बहुत मुश्किल है."

मैंने डॉक्टर साहब से आग्रह किया कि वह कभी भी थोड़ा सा वक़्त निकाल सकें तो उस बच्ची को ज़रूर देख आएं. डॉक्टर साहब ने वादा किया कि वह कोशिश करेंगे.

अगले दिन मैं दोबारा अल्ला रखी की ख़ैरियत पूछने गई.

बच्ची की माँ ने बताया कि उसने बच्ची का नाम समीना रखने का फ़ैसला किया है.

बच्ची काफ़ी बेहतर नज़र आई. कमज़ोर तो थी लेकिन पिछले रोज़ की तरह बेजान नहीं थी.

उन्होंने कहा कि रात को डॉक्टर साहब बच्ची को देखने आए थे और अब बच्ची ने मां का दूध भी लेना शुरू कर दिया है.

बेबी समीना की हालत देखर मुझे बेहद ख़ुशी हुई. बाढ़ पीड़ितों में न जाने ऐसे हज़ारों बच्चे होंगे जो शायद हमारी नज़र से न गुज़रें और जिनकी जान ख़तरा में हो.

इसका मुझे एहसास तो है लेकिन जब भी बेबी समीना मुझे याद आती है तो उस ज़िंदा बच जाने वाली जान के बारे में सोच कर मुझे बहुत ख़ुशी होती है.

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