'घर वापस चले गए तो पूछेगा कौन'

  • 29 अगस्त 2010
पाकिस्तान बाढ़

पाकिस्तान के इतिहास के सबसे बुरे सैलाब को एक महीना होने वाला है और जहाँ बाढ़ का पानी अभी तक सिंध के निचले इलाक़ों में तबाही मचा रहा है वहीं पंजाब के दक्षिणी इलाक़ों में बाढ़ पीड़ितों ने पानी उतरने के बाद अपने घरों को जाना शुरू कर दिया है.

बलूचिस्तान की राजधानी क्वैटा में स्थित शिविरों से भी बाढ़ प्रभावितों की एक बड़ी संख्या ने ढाडर और डेरा अल्लाहयार की तरफ़ वापसी शुरू कर दी है.

फिर भी बाढ़ पीड़ितों की एक बड़ी संख्या का ये भी कहना है कि उनके घर-बार दरिया के पानी में ख़त्म हो चुके हैं और जब-तक उनक मकान नहीं बनाए जाते वे अपने घरों को वापस नहीं जाएंगे.

इन वापस जाने वालों की सबसे बड़ी समस्या है उनकी रिहाइश, खाना, और स्वास्थ्य की सहूलियतें हैं. इसके अलावा उन बेघर लोगों के सामने अपने बचे हुए मवेशियों के लिए चारा तलाश करने की समस्या भी है.

दक्षिणी पंजाब में अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ प्रभावित चारों ज़िलों में बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब प्रभावितों की वापसी का काम जारी है.

राजनपुर के ज़िला संपर्क अधिकारी कैप्टेन रिटायर्ड मुहम्मद उस्मान ने बीबीसी को बताया कि उनके ज़िले में जामपुर समेत कई तहसीलों सें बाढ़ का पानी उतरना शुरू हो गया है और यहां के लोग अपने अपने इलाक़ों में वापस जाने लगे हैं.

Image caption इससे पता चलता है कि खाने चीज़े हासिल करना कितना मुश्किल है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ज़िला प्रशासन की जानकारी के मुताबिक़ अब तक 250 परिवार अपने घरों को वापस जा चुके हैं और ज़िला प्रशासन अपने घर वापस जाने वालों को टेंट और राशन भी दे रहा है.

जामपुर का हाल

ज़िला प्रशासन के दावों के विपरीत राजनपुर की तहसील जामपुर के निवासियों का कहना है सिंधु नदीं के पास के इलाक़ों में अब भी चार से पांच फ़ीट पानी खड़ा है और ऐसी स्थिति में वे अपने घरों को कैसे वापस जाएं क्योंकि वापस जाकर भी वे अपने घरों का पुनर्निर्माण नहीं कर सकते.

राजनपुर का एक और इलाक़ा कोट दीवान भी अभी तक बाढ़ के पानी में डूबा हुआ है और इसके अलावा मेहरेवाला गांव और उससे सटी आबादी का भी ज़मीनी मार्ग दूसरे इलाक़ों से टूटा हुआ है.

डेराग़ाज़ी ख़ान के ज़िला संपर्क अधिकारी इफ़्तिख़ार सहू का कहना है कि ज़िले की तहसील तोसा शरीफ़ में बाढ़ से प्रभावित 700 परिवार अपने घरों को वापस जा चुके हैं और ज़िला प्रबंधन ने उन लोगों को न सिर्फ़ रहने के लिए टेंट दिए हैं बल्कि उन्हें खाना भी दिया है.

अधिकारियों का कहना है कि डेरा ग़ाज़ी ख़ान में बाढ़ पीड़ितों के लिए 127 शिविर बनाए गए थे लेकिन अब वहां शिविर कैंप बचे हैं.

इफ़्तिख़ार सहू का कहना है कि ग़ाज़ी घाट में बाढ़ का पानी बहुत हद तक उतर चुका है और वहां के निवासी भी अपने-अपने घरों को वापस जाने लगे हैं और जो लोग अपने घरों को वापस जा रहे हैं उनके रजिस्ट्रेशन का काम भी शुरू हो गया है.

फिर भी वहां की निवासी आमना बीबी का कहना है कि उन इलाक़ों में ज़िला प्रशासन ज़बर्दस्ती लोगों को भेज रहा है और इसके लिए पुलिस वालों की मदद भी ली जा रही और वे उनसे टेंट छीन रहे हैं और कह रहे हैं कि अब वे अपने घरों को लौट जाएं क्योंकि अब उनके यहां पानी उतर चुका है.

दबाव है

Image caption अभी भी कहीं आना जना काफ़ी मुश्किल है.

एक अन्य बाढ़ पीड़ित महिला मक़सूदा बीबी का कहना था कि नदी के किनारे सैंकड़ों कच्चे मकान थे जो नदी में बह गए हैं उसके बावजूद पुलिस-प्रशासन के कर्मचारी उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वे अपने घरों को वापस चले जाएं.

उन्होंने कहा कि मुल्तान रोड पर स्थित हावे पुलिस पेट्रोलिंग की इमारत अभी तक पांच से छह फ़ीट पानी में डूबी हुई है, उनका इलाक़ा तो उसके पास ही है फिर वहां से पानी कैसे उतर सकता है.

बाढ़ से प्रभावित एक और व्यक्ति दोसू का कहना है कि वह अपने बूढ़े माता-पिता समेत 12 लोगों के परिवार को बड़ी मुश्किल से अपने इलाक़े शेरू से निकाल कर लाए थे और वे एक स्कूल की इमारत में स्थापित राहत शिविर में हैं.

उन्होंने कहा कि प्रशासन और पुलिस के अधिकारी उनपर दबाव डाल रहे हैं कि चूंकि अब उनके इलाक़ों में पानी उतरना शुरू हो गया है इसलिए वे अपने घरों को वापस जाने की तैयारी शुरू करें.

उन्होंने कहा,'' इन कैंपों में तो फिर भी देखभाल हो रही है और खाना और दवाई किसी हद तक मिल जाती लेकिन इन हालात में अपने घरों को वापस चले गए तो हमें कौन पूछेगा जबकि मकान भी सैलाब में तबाह हो गया है.''

बहरहाल, डेराग़ाज़ी ख़ान के ज़िला संपर्क अधिकारी का कहना है कि बाढ़ के कारण ज़िले में हुए नुक़सान का अंदाज़ा लगाने के लिए जल्द ही सर्वे शुरू किया जाएगा.

याद रहे कि बाढ़ के कारण डेराग़ाज़ी ख़ान का देश के दूसरे इलाक़ों से ज़मीनी संपर्क टूट गया था और तोंसा शरीफ़ से लेकर राजनपुर तक का कच्चा इलाक़ा अभी तक बाढ़ के पानी में डूबा हुआ है.

यही कारण है कि डेरा ग़ाज़ी ख़ान और राजनपुर के बाढ़ पीड़ितों को उम्मीद से कम राहत सामान मिला है और वहां हज़ारों लोग अभी तक खाद्य पदार्थ, दवाइयां और टेंट मिलने की आस लिए अपने परिजनों के साथ सड़कों पर बैठे हैं.

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