मौत तैरती हुई नज़र आती थी

  • 31 अगस्त 2010
हाजी
Image caption 90 वर्षीय हाजी के लिए रुके थे महबूब

महबूब ख़ान जांगवानी परेशान हैं कि उनका परिवार उनसे बिछड़ गया मगर ये बात उन्हें संतोष देती है कि उन्होंने अपना फ़र्ज़ निभाया.

पैंतीस वर्षीय महबूब जांगवानी शिकारपुर के इलाक़े जोंगल के रहने वाले हैं जो पूरी तरह से पानी में डूब चुका था और वहीं महबूब अपने बूढ़े चचा हाजी और जन्मजात विकलांग भाई ग़ाज़ी के साथ आठ दिन तक पानी में फंसे रहे.

सक्खर में पाकिस्तानी वायुसेना के कैंप में मौजूद महबूब ने बताया कि पानी आने के साथ ही उन्होंने अपनी पत्नी और अन्य परिजनों को गांव से बाहर निकाल दिया था मगर वे ख़ुद गांव में रह गए.

वह अपने विकलांग चचेरे भाई और अक्षम बूढ़े चचा की ओर इशारा करके कहते हैं, "इन्हें छोड़ कर कैसे जाता."

महबूब ने बताया कि गांव में पानी आने के बाद पहले तो वह अपनी जगह बदलते रहे मगर जब जलस्तर ऊंचा होता गया तो वे एक बड़े टीले पर चढ़ गए जिसके चारों ओर पानी ही पानी था.

"दो दिन के बाद एक फ़ौजी हेलीकॉप्टर ने खाने पीने का सामान फेंका, उसी पर गुज़ारा करते थे, मगर पानी के तेज़ रेले में अक्सर सामान बह जाता था और मोबिल तेल के डब्बों की मदद से पानी में उतर कर कुछ सामान हासिल करने में कामयाब हो जाते."

महबूब के मुताबिक़ वह पीने के लिए बाढ़ के पानी का ही इस्तेमाल करते रहे. कहते हैं, "पेट में तकलीफ़ तो होती थी मगर क्या करते मजबूरी थी."

शव पर कुत्ते

महबूब ने एक दर्दनाक हादसे के बारे में बताया कि उनके दूर के रिश्तेदार एक 20 वर्षीय महिला मुसम्मात रोतू को घर में ही छोड़ गए क्योंकि उसे बुख़ार था.

जब वह पानी से बचने के लिए उनके घर के सामने से गुज़रे तो देखा कि उसकी लाश पड़ी है और कुत्ते उसे नोच-नोच कर खा रहे हैं.

शरीर पर सिर्फ़ हड्डियां और उंग्लियां रह गई थीं. बाद में जब पानी का एक बड़ा रेला आया तो बचा ढांचा बहा ले गया.

महबूब ने कहा कि अगर वो अपने मजबूर रिश्तेदारों को छोड़ जाते तो उनका हाल भी मुसम्मात रोतू जैसा होता या पानी में बह जाते और बाद में लोग उन्हें ताना देते कि अपने विकलांग रिश्तेदारों को मौत के मुंह में छोड़ दिया.

उन्होंने कहा, "इसी लिए मैंने आख़िरी वक़्त तक उनके साथ रहने का फ़ैसला किया."

महबूब के चाचा 90 वर्षीय हाजी का कहना है कि झोली में क़ुरान होता था और ख़ुदा पर भरोसा था, "आसरा ही नहीं था कि ऊपर से ऐसे मदद पहुंचेगी और हमें बचा लिया जाएगा."

ग़ाज़ी ख़ान दोनों पैरों से जन्म से विकलांग हैं. एक बच्चे की मासूमियत के साथ उन्होंने कहा, "पानी में मगरमच्छ तैरते हुए नज़र आते और कभी-कभी क़रीब आते थे मैं देख कर डर जाता था और डर से रोता रहता था."

महबूब और ग़ाज़ी और ग़ाज़ी आठ दिन तक पानी के बीच रहे. पानी या अजगर

ग़ाज़ी उन दिनों को याद करके कहते है, "पानी किसी अजगर की तरह बल खाता हुआ आगे बढ़ता था."

महबूब का कहना है कि वह पूरी तरह मायूस हो चुके थे, "ये लग रहा था कि किसी भी वक़्त पानी का कोई बड़ा रेला आ जाएगा और इसीलिए हमारी आंखों से नींद उड़ चुकी थी और पानी में मौत तैरती नज़र आती थी."

उन्होंने बताया, "आख़िरकार आठवें दिन एक हेलिकॉप्टर एक घंटा चक्कर लगाते रहने के बाद आया, उसमें से फ़ौजी उतरे और हमें उठा कर हेलीकॉप्टर में डाल जोंगल से सक्खर लाया गया."

महबूब को अपने परिजनों के बारे में अभी कुछ मालूम नहीं है. उनके ख़ानदान के 40 लोग पहले निकल चुके थे. लेकिन वे आश्वस्त हैं कि उनकी अपने परिजनों से मुलाक़ात होगी.

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