'राजनेता बनने में अभी वक़्त लगेगा'

जनरल मुशर्रफ़

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को मैंने उनके राष्ट्रपति पद छोड़ने के एलान के बाद दोबारा उस वक़्त देखा जब वह अमरीका के मैरीलैंड राज्य के शहर बाल्टिमोर में लेक्चर देने आए हुए थे.

राष्ट्रपति भवन से उनके निकलने के बाद ये अटकलें लगाई जाने लगीं थीं कि उनका अगला पड़ाव राजनीति का मैदान होगा.

पता नहीं ऐसी अटकलें लगाने वाले ये क्यों भूल गए थे कि आख़िर नौ-दस वर्षों से वह राजनीति के दांव पेंच नहीं खेल रहे थे तो आख़िर क्या कर रहे थे?

आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का साथ देने के कारण जनरल मुशर्रफ़ अमरीका में बहुत लोकप्रिय हैं और यही कारण है कि उनका लेक्चर हॉल खचाखच भरा हुआ था.

लेकिन जब लेक्चर के बीच में जब एक बलूच कार्यकर्ता ने "क़ातिल-क़ातिल.... डिक्टेटर-डिक्टेटर" का नारा लगाना शुरू कर दिया तो सैन्य अनुशासन के क़ायल जनरल यह अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं कर सके और अपना लेक्चर बीच ही में छोड़कर उस बलूच के साथ तू-तू मैं-मैं करने लगे जिसने उनकी बात में ख़लल डाला था.

धमकी

लेकिन मेरे समेत हॉल में बैठे हुए अधिकतर लोगों के की भँवें उस वक़्त तन गईं जब जनरल मुशर्रफ़ ने उस बलूच को संबोधित करते हुए कहा, "मैंने बलूचिस्तान में बहुतों की सीधा कर दिया था और तुम वहां होते तो तुम्हें भी सीधा कर देता."

ये बात एक फ़ौजी ही कह सकता था.

"राजनेता बनने में उन्हें अभी बहुत समय लगेगा", अचानक ये ख़्याल मेरे ज़हन में गूंजा.

जनरल मुशर्रफ़ के राज करने के तरीक़े और उनकी राजनीति से मतभेद हो सकता है लेकिन उनके बारे में एक बात यक़ीन के साथ कही जा सकती है और वह यह है कि उनके दिल में जो आता है वह कह देते हैं. (चाहे कहने से पहले उन्होंने इसके बारे में सोचा हो या न सोचा हो.)

हालिया दिनों में जनरल मुशर्रफ़ ने अपनी राजनीतिक पार्टी 'ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग' की औपचारिक तौर पर घोषणा की और बीबीसी को इंटरव्यू देने के लिए तैयार हो गए.

मैं जब उनसे इंटरव्यू लेने जा रहा था तो एक सवाल मेरे ज़ेहन में था, "जनरल मुशर्रफ़ सत्ता से बाहर रहने और राजनीतिक पार्टी के ऐलान के बाद राजनेता बनने के कितना क़रीब हुए होंगे?"

जनरल मुशर्रफ़ ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा, "फ़ौज तो सत्ता में ख़ुद से नहीं आती, ये राजनीतिज्ञ ही हैं जो उनके पीछे पड़ते हैं कि राजनीति में आएं. मेरे पास भी बड़े सियासतदान आते थे."

खरी-खरी

Image caption जनरल मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ का तख़्ता पलट कर राष्ट्रपति का पद संभाला था

मेरी अपेक्षा के बिलकुल उलट लंदन के एक मध्यमवर्गीय इलाक़े के एल-फ़्लैट में जनरल मुशर्रफ़ रह रहे हैं. एक रसोईया ज़रूर है उनके पास लेकिन पाकिस्तान के बड़े राजनेताओं के मुक़ाबले उनका आवास मामूली है. ड्राइंग रूम में सोफ़े हैं, कुछ पेंटिंग्स हैं, 40 इंच का एचडी टीवी है और दर्जनों पुराने गीतों और फ़िल्मों की सीडीज़ और डीवीडीज़ हैं.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "नवाज़ शरीफ़ के पेट में दाढ़ी है, मैं उसे क्लोज़ेट (छिपा हुआ) तालिबान कहता हूं."

मैंने कहा, "नवाज़ शरीफ़ कहते हैं कि आपने दो बार संविधान तोड़ा, इसलिए आपके ख़िलाफ़ अनुच्छेद- छह के तहत ग़द्दारी का मुक़दमा चलना चाहिए?"

"आर्टिकल-छह... किस चक्कर में भाई?" जनरल मुशर्रफ़ ने कहा, "मैंने जो कुछ भी किया है उसकी सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की है, उसकी पार्लियामेंट ने भी पुष्टि की है तो फिर मुक़दमा कैसा?"

जनरल मुशर्रफ़ ने शासकों, राजनेताओं, मुल्लाओं, अदालतों, अपने पूर्व घटक दलों सबको खरी-खरी सुनाई. बस उन्हें भरोसा है तो उन सूट बूट वाले मध्यमवर्ग के लोगों पर जो उनके विचार से पाकिस्तान की सियासत का नक़्शा बदल कर रख देंगे.

मैंने उनके फ़्लैट से जैसे ही बाहर क़दम रखा तो वही ख़्याल अचानक मेरे ज़हन में गूंजा, "उन्हें राजनेता बनने में अभी बहुत वक़्त लगेगा."

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