पाकिस्तान में पसरा सन्नाटा

  • 31 मार्च 2011
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Image caption पाकिस्तानी टीम भारत से सेमीफाइनल में 29 रनों से हार गई.

पाकिस्तान का भारत के ख़िलाफ़ विश्व कप के सेमीफ़ाइनल में जीतने का सपना अधूरा रह गया और इस हार ने करोड़ों पाकिस्तानियों को निराश कर दिया है.

मैच ख़त्म होने के बाद जब मैं दफ़्तर से निकला तो सन्नाटा छाया हुआ था. सड़कों पर गाड़ियाँ न के बराबर थी और कुछ क्रिकेट प्रेमी ग्रीन शर्ट्स पहने पैदल जा रहे थे जिनके चेहरों पर निराशा साफ दिख रही थी.

शायद वह किसी बड़ी स्क्रीन पर मैच देखने के बाद लौट रहे थे और टीम की हार ने उनके मज़े को किरकिरा कर दिया था.

ऐसा लग रहा था कि मानो कोई दुखद घटना हो गई हो. जब पाकिस्तानी टीम ने अपनी पारी की शुरुआत की थी तो उस समय शहर का माहौल कुछ और था.

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Image caption पाकिस्तान में मैच देख रहे दर्शक भी बहुत दुखी हो गए.

युवा गाड़ियों पर बड़े बड़े राष्ट्रीय ध्वज लगा कर बूम बूम अफ़रीदी के नारे लगा रहे थे और यह जोश और जज़्बा पूरे शहर पर हावी था.

जब भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को हरा कर सेमीफ़ाइनल में पाकिस्तान के साथ खेलने को तैयार हुई तो दोनों देशों की सरकारों ने इस जोश में क्रिकेट कूटनीति का रंग भर दिया और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी पाकिस्तानी समकक्ष को सेमीफ़ाइनल मिलकर देखने का न्योता दिया.

स्थानीय मीडिया ने तो इस जोश को इतना बढ़ा दिया था कि उस ने भारत और पाकिस्तान के सेमीफ़ाईनल को युद्ध से जोड़ दिया था.

विभिन्न टीवी चैनलों पर कई प्रकार की चर्चाएँ हुई और उसमें साफ साफ कहा गया कि पाकिस्तानी शाहीन (मिसाइल) भारत पहुँच चुके हैं और भारतीय सूरमाओं से जंग करने के लिए तैयार हैं.

सेमीफ़ाइनल से पहले टीवी चैनलों पर प्रतिदिन दिखाया जा रहा था कि पाकिस्तानी टीम की जीत के लिए मस्जिदों में दुआएँ मांगी जा रही हैं और कहा जाने लगा कि मुसलमानों की दुआओं में बहुत ताक़त है.

कुछ लोगों ने मीडिया की इस भूमिका पर कड़ी आलोचना की थी कि पाकिस्तानी टीम भारत में केवल क्रिकेट खेलने जा रही है और खेल में एक टीम को तो ज़रुरी हार का सामना करना पड़ेगा.

मेरे एक दोस्त ने भी मीडिया की इस भूमिका का विरोध किया था और जब मैच ख़त्म हुआ और भारतीय टीम ने विजय प्राप्त कर ली तो उन्होंनें मुझे एक एसएमएस भेजा जिसमें उन्होंने लिखा, “जबकि यहाँ इस खेल को कुफ्र (काफिर) और इस्लाम के बीच युद्ध घोषित किया गया था तो मैं बड़ी विनम्रता से यह कहता हूँ कि ज़हीर ख़ान और मुनाफ़ पटेल की माताएँ उनसे ज़्यादा धर्मनिष्ठ हैं जिन्होंने पाकिस्तान के लिए दुआएँ मांगी थी.”

इस निराशा में कहीं न कहीं स्थानीय मीडिया का भी हाथ था.

मोहाली में दोनों देशों के खिलाड़ियों का मुक़ाबला तो एक खेल था और किसी एक टीम तो जीतना ही था.

जिस तरह करीब 18 करोड़ पाकिस्तानियों ने अपनी टीम की जीत केलिए दुआ की उसी तरह एक अरब से ज़्यादा भारतीयों ने अपने खिलाड़ियों के लिए प्रार्थना की. यह तो तय था कि एक तरफ़ निराशा होगी तो दूसरी ओर ख़ुशी. इस बार ऊपर वाले ने पाकिस्तानियों की झोली निराशा डाल दी है इसो को सच्चे मन से स्वीकार किया जाना बेहतर है.

मुझे लगता है कि इस बार ऊपर वाला एक अरब से ज़्यादा लोगों को निराश नहीं करना चहता था और दूसरा यह कि शायद पाकिस्तानी टीम को उस शहर में नहीं खिलवाना चाहता था जहाँ 2008 में कुछ पाकिस्तानी हमलावरों ने अंधाधुंध गोलियाँ चला कर कई निर्दोष लोगों की जानें ली थीं.

लेकिन इस बार पाकिस्तानी टीम ने मेहनत बहुत की है और जिस तरह पिछले मैच खेले वह प्रशंसा की पात्र है. मेरा मानना है कि पाकिस्ताना के लिए इस बार जीत ज़रुरी थी क्योंकि चरमपंथी गतिविधियों के कारण क्रिकेट बहुत प्रभावित हुआ था और श्रीलंका की टीम पर हमला भी हुआ था.

पिछले कई सालों से आत्मघाती हमलों, बम धमाकों, विवादास्पद क़ानून और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही पाकिस्तानी जनता को जीत की यह छोटी सी ख़ुशी मिलनी चाहिए थी लेकिन कोई बात नहीं. अगली बार खिलाड़ी जम कर खेलेंगे और शायद पाकिस्तान जीत जाए.

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