'मैं क्यों बना आत्मघाती हमलावर'

उमर फ़िदाई इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption उमर फ़िदाई ने पाकिस्तान की एक दरगाह पर हमला करने की नाकाम कोशिश की

अप्रैल के शुरु में पाकिस्तान की एक दरगाह पर हुए एक आत्मघाती बम हमले में बहुत से लोग मारे गए थे. दोनों हमलावर स्कूल में पढ़ने वाले किशोर थे लेकिन उनमें से एक बच गया. बीबीसी के अलीम मक़बूल के साथ हुई एक बातचीत में उसने बताया कि उसने अपनी और दूसरों की जान लेने का क़दम क्यों उठाया.

उमर फ़िदाई जो मात्र 14 साल के हैं उन्होने बताया, "मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात थी कि मैं ऐसी जगह पर विस्फोट करूं जहां ज़्यादा से ज़्यादा लोग हों. जब मुझे लगा कि अब सही वक़्त है तो मुझे बेहद ख़ुशी महसूस हुई".

"मैंने सोचा कि मुझे कुछ तकलीफ़ ज़रूर होगी लेकिन फिर मैं जन्नत पहुंच जाऊंगा".

उमर को जन्नत नसीब नहीं हुई बल्कि वो जेल पहुंच गए.

धमाके में उनका बायां हाथ उड़ गया, दायां हाथ ज़ख़्मी है और धड़ पर पट्टियां ही पट्टियां बंधी हैं. लेकिन वो सजग, विनम्र और स्पष्टवादी हैं.

"योजना ये थी कि इस्माइल अपने आपको दरगाह के पास विस्फोटकों से उड़ाएगा. मैं ऐम्बुलैंस की गाड़ियों के आने का इंतेज़ार करूंगा और उनके पास जाकर ख़ुद को उड़ाऊंगा जिससे और लोग मारे जा सकें. मुझे किसी तरह का शकोशुबाह नहीं था".

लेकिन उमर फ़िदाई की आत्मघाती जैकेट फटी ही नहीं.

बस उसका अपना हाथ उड़ गया पेट फट गया और वो बेहोश होकर गिर पड़े. जब उन्हे होश आया तो उन्होने अपनी जेब में हथगोला ढूंढने की कोशिश की.

"हमें सिखाया गया था कि अगर किसी वजह से पेटी में विस्फोट न हो तो हमें हथगोले से आत्महत्या कर लेनी चाहिए. मेरे पास तीन पुलिसवाले खड़े थे सो मैंने सोचा कि अगर मैं इन्हे भी मार सका तो मुझे जन्नत ज़रूर मिल जाएगी".

जैसे ही उमर हथगोले की पिन तोड़ने के लिए उसे मुंह तक लाए एक पुलिसकर्मी ने उनके हाथ में गोली मार दी.

एक मोबाइल फ़ोन पर की गई रेकार्डिंग दिखाती है कि किस तरह उमर ज़मीन पर पड़े हुए हैं और पुलिस वाले उनकी आत्मघाती जैकेट को निष्क्रिय बनाने में लगे हैं.

चारों तरफ़ तालिबान

उमर फ़िदाई का ये सफ़र कोई पांच महीने पहले पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के पर्वतीय क़बाइली इलाक़े के उनके अपने ही नगर में शुरु हुआ था.

"मैं जहां स्कूल जाता था वहां चारों तरफ़ तालिबान ही तालिबान थे. एक दिन एक तालिब ने मुझे आत्मघाती बम हमलावर बनने के लिए अपने साथ आने को कहा. लेकिन मैंने उससे कहा कि अगर वो लोगों को मारना चाहता है तो ये काम ख़ुद करे बच्चों से क्यों करवाना चाहता है. लेकिन वो बराबर आता रहा".

"उसने कहा कि पढ़ने लिखने में कुछ नहीं रखा. उसने मुझे बताया कि जन्नत से बेहतर कोई जगह नहीं है और काफ़िरों को मारने से जन्नत मिलती है".

"तालिबान हर वक़्त नमाज़ अदा करते थे क़ुरान पढ़ते थे इसलिए मैंने सोचा कि वो अच्छे लोग हैं. मेरे दिल ने मुझसे कहा कि मैं उनके पास जाकर ट्रेनिंग लूं".

उमर ने बताया कि जब भी उसे ट्रेनिंग कम्पाउंड ले जाया जाता तो उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती और कभी कभी हथकड़ियां भी पहनाई जातीं जिससे वो उस जगह का पता न बता सके.

उसने बताया कि उसे तीन और लड़कों के साथ हथियार और विस्फोटक चलाने की ट्रेनिंग दी गई.

पिछले तीन सालों में हुए चरमपंथी हमलों में हज़ारों पाकिस्तानी नागरिक मारे जा चुके हैं.

ये माना जाता है कि अधिकतर आत्मघाती बम हमले उमर फ़िदाई जैसे बच्चों के हाथों कराए जा रहे हैं.

वैसे तो अलग अलग जगहों को निशाना बनाया गया है लेकिन हाल में सूफ़ी संतों की दरगाहों पर हमले अधिक हुए हैं.

क्योंकि इस्लामिक कट्टरपंथी इन दरगाहों को ग़ैर इस्लामी मानते हैं.

उमर फ़िदाई का कहना है, "तालिबान ने हमें हमेशा यही बताया कि हमें काफ़िरों को मारने अफ़ग़ानिस्तान भेजा जाएगा. हम मान गए क्योंकि इसका मतलब ये था कि हमें जन्नत मिलती".

"लेकिन जब हम बस में बैठकर इस दरगाह तक आए तो हमने देखा कि ये तो पाकिस्तान में ही है. हमने उनसे पूछा तो उन्होने कहा कि जो लोग मरे हुए लोगों की इबादत करते हैं वो और भी बड़े काफ़िर हैं. मुझे उनकी बात ठीक लगी".

"जब हम दरगाह पहुंचे तो मैं और इस्माइल पहाड़ी पर चढ़ गए जिससे कोई हमें देख न पाए. हमने अपने थैलों में से आत्मघाती जैकेट निकालीं और उन्हे पहन लिया".

"फिर हमने एक दूसरे से अलविदा कहा और एक दूसरे के लिए दुआ करने का वचन दिया. लेकिन हम उदास नहीं थे क्योंकि हम जन्नत जाने वाले थे".

उमर ने बताया कि जब पुलिस वालों ने उनकी आत्मघाती जैकेट के विस्फोटक निष्क्रिय करने की कोशिश की और डॉक्टर उनकी देखभाल में जुट गए तब उन्हे एहसास हुआ कि उनकी सोच ग़लत थी.

"मैं बेहद शुक्रगुज़ार हूं क्योंकि मैं जहन्नुम जाने से बच गया. मैं बहुत तकलीफ़ में हूं लेकिन मैं जानता हूं कि अस्पताल में और भी बहुत से लोग हैं जो मुझसे भी ज़्यादा ज़ख़्मी हैं और मुझे अपने किए पर और इस्माइल के किए पर बेहद अफ़सोस है".

"हमने बच्चों बूढ़ों और महिलाओं को मार कर बहुत बुरा किया. अब मेरी समझ में आया है कि आत्मघाती हमला ग़ैर इस्लामिक है. मुझे उम्मीद है कि लोग मुझे माफ़ कर देंगे".

उमर का कहना है कि हमले के बाद से उसके परिवार का कोई भी व्यक्ति उससे मिलने नहीं आया है.

"मुझे मालूम है कि मेरी मां और मेरी छोटी बहनें जो उत्तरी वज़ीरिस्तान में रहती हैं जानती होंगी कि क्या हुआ है और वो बेहद परेशान होंगी.

"बस मैं अपनी मां से माफ़ी मांगना चाहता हूं. लेकिन जिस समय मैंने विस्फोटक उड़ाए थे उस समय मुझे अपने परिवार वालों का ख़याल नहीं आया. मैं सिर्फ़ तालिबान की सीख के बारे में सोच रहा था".

उमर गंभीर रूप से घायल हैं और तालिबान से भी डरे हुए हैं क्योंकि वो अपने मिशन में कामयाब नहीं हो पाए.

संबंधित समाचार