क्या है मुख़्तारां माई बलात्कार मामला?

  • 21 अप्रैल 2011
मुख़्तारां माई
Image caption मुख़्तारां माई का 2002 में सामूहिक बलात्कार किया गया था.

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिण पंजाब की स्थानीय पंचायत के फ़ैसले पर मुख़्तारां माई के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में पांच अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए मुख़्तारां माई के मुक़दमे में छह में से पांच अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया है.

इससे पहले स्थानीय अदालत ने मुख़्तारां माई के साथ सामूहिक बलात्कार करने के आरोप में अब्दुल ख़ालिक़, अल्लाह दित्ता, फ़याज़ और ग़ुलाम फ़रीद सहित छह अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई थी.

दक्षिण पंजाब के ज़िले मुज़फ़्फ़रगढ़ के इलाक़े मीरवाला में 22 जून 2002 को स्थानीय पंचायत के फ़ैसले के बाद मुख़्तारां माई का सामूहिक बलात्कार किया था.

भाई की वजह से मिली सज़ा

Image caption पाकिस्तान में औरतों पर हिंसा की कई घटनाएँ होती हैं.

पंचायत ने आरोप लगाया था मुख़्तारां माई के भाई शकूर के मस्तोई क़बीले की एक महीला से संबंध हैं और उस वजह से मुख़्तारां माई को यह सज़ा दी गई थी.

घटना के क़रीब छह दिनों बाद मीरवाला की एक मस्जिद के इमाम ने जुमे की नमाज़ से पहले लोगों से कहा था कि वह इस सामूहिक बलात्कार का कड़ा विरोध करें और पुलिस को बताएँ.

उसके बाद यह मामला तुरंत मीडिया में आ गया था और 30 जून 2002 को स्थानीय पुलिस ने 14 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कर लिया था.

स्थानीय अदालत ने 31 अगस्त 2002 को छह लोगों को मौत की सज़ा सुनाई थी और आठ लोगों को बरी करने के आदेश दिए थे.

तीन मार्च 2005 को यह मामला लाहौर हाई कोर्ट के मुल्तान बेंच पहुँचा और अदालत ने पर्याप्त सबूतों की कमी की बुनियाद पर इस मुक़दमे में पांच लोगों को बरी कर दिया और मुख्य अभियुक्त अब्दुल ख़ालिक़ की सज़ाए मौत को आजीवन कारावास में बदल दिया था.

अदालतों में मतभेद

पाकिस्तान की सर्वोच्च इस्लामी अदालत शरिया कोर्ट ने लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले पर विरोध किया और कहा कि इस्लामी नियमों के अधीन हाई कोर्ट इस मामले में किसी भी अपील को सुनने का अधिकार नहीं रखती.

14 मार्च 2005 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और कहा कि वह ख़ुद इस मामले को सुनेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की सुनवाई शुरू की और लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रख दिया और पांच अभियुक्तों को रिहा करने के आदेश दिए.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 15 मार्च 2005 को चार अभियुक्तों को रिहा किया गया और एक अभियु्क्त को भी बाद में रिहा किया गया.

मुख़्तारां माई ने 17 मार्च 2005 को तत्कालिन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से पाँच अभियुक्तों को गिरफ़्तार करने की अपील की.

पंजाब सरकार के आदेश पर 18 मार्च 2005 को पाँच अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया गया और 16 मार्च को मुख़्तारां माई ने सुप्रीम कोर्ट में पांच अभियुक्तों को बरी करने के फ़ैसले के ख़िलाफ याचिका दायर कर दी.

सुप्रीम कोर्ट ने 27 जून 2005 को इस मुक़दमे की सुनवाई की और 28 जून को पाँच अभियुक्तों की रिहाई पर रोक लगा दी.

इस बीच मुख़्तारां माई काफ़ी चर्चा में रहीं और यह मामला मीडिया में छाया रहा.

मुख़्तारां पर प्रितबंध

Image caption मुख़्तारां ने अपने इलाक़े में बाढ़ पीड़ितों को कई दिनों पर खाना खिलाया.

सरकार ने 11 जून 2005 को मुख़्तारां माई पर विदेश जाने पर प्रतिबंध लगा दिया और कहा कि उनकी ज़िंदगी को ख़तरा है.

अतंरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार के इस फ़ैसले का कड़ा विरोध किया गया और मुख़्तारां माई को विदेश जाने की सलाह दी गई.

कई देशों में मुख़्तारां माई के लिए सहानुभूति बढ़ गई और न्याय के लिए संघर्ष करने पर उन्हें कई पुस्कार भी मिले.

मुख़्तारां माई ने बलात्कार और महिलाओं के साथ हो रही हिंसक घटानओं के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाने का फ़ैसला लिया और वे आजकल अपने गाँव में स्कूल चला रही हैं.

मुख़्तारां माई ने 15 मार्च 2009 को एक पुलिसकर्मी नसीर अब्बास से शादी कर ली जिसकी मीडिया में काफ़ी चर्चा हुई और प्रशंसा की गई.

कुछ सालों बाद फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मुक़दमे की सुनवाई शुरु कर दी और 27 जनवरी 2011 को मुख़्तारा माई के मुक़दमे का फ़ैसला सुरक्षित कर लिया.

गुरुवार 21 अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया जिस में पाँच अभियुक्तों को बरी करने का आदेश दिया.

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