'पाकिस्तानी सेना बनी मज़ाक़'

पाकिस्तान प्रदर्शन
Image caption ओसामा मामले में की गई अमरीकी कार्रवाई के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के कई शहरों में प्रदर्शन हुए.

पाकिस्तान में इन दिनों मोबाइल फ़ोनों पर एक एसएमएस की धूम है.

एसएमएस कहता है, "बिक्री पर है पाकिस्तानी सेना का नाकारा राडार: ये रडार देश में घुसने वाले अमरीकी हेलीकॉप्टर का पता नहीं लगा सकता है लेकिन स्टार प्लस चैनेल पकड़ता है. क़ीमत सिर्फ़ 999 रूपए."

भारत का टीवी चैनेल स्टार प्लस पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय है.

एक दूसरा एसएमएस है, "ये कैसा देश है! यहाँ ओसामा भी महफ़ूज़ नहीं हैं."

ये सारे एसएमएस ऐबटाबाद में हुई कार्रवाई और उसके लिए अमरीकी सेना के क़दमों को लेकर पाकिस्तानियों के बीच फैली निराशा को दर्शाते हैं.

पाकिस्तानियों में इस बात को लेकर ग़ुस्सा है कि अमरीकी सेना ने बिना पाकिस्तान को बताए, उसकी सीमा मे घुसकर कार्रवाई की और पाकिस्तानी फ़ौज को इसकी हवा तक न लग पाई.

हाल के इतिहास में ये पहली बार है जब पाकिस्तानी सेना अपनी नाकामयाबी का ठीकरा किसी और के सर नहीं फ़ोड़ पा रही है.

वो इसके लिए पाकिस्तान में मौजूद सरकार को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते.

नाराज़गी

सेना के ऊपर सिर्फ़ ओसामा बिन लादेन को आश्रय देने का संदेह नहीं है, बल्कि लोगों में इस बात की नाराज़गी है कि उन्हें इस हमले का पता तक नहीं था.

हालांकि वहाँ सत्ता में मौजूद ज़रदारी हुकूमत के प्रति लोगों में बहुत सहानभूति नहीं है लेकिन सभी को पता है कि इस मामले में हुई चूक का जवाब हुकुमत को नहीं बल्कि सेना को देना है.

सेना की ओर से इस मामले पर पहली प्रतिक्रिया तीन दिनों के बाद दी गई.

सेना ने कहा कि उसे इस हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

मगर लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं कि वो ओसामा के ऐबटाबाद में उपस्थिति से अनभिज्ञ थे.

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Image caption ऐबटाबाद स्थित ओसामा का घर पाकिस्तानी सेना के एक ठिकाने से कुछ ही दूरी पर है.

इस हमले और उस पर सेना के जवाब ने सवालों के जबाव देने की बजाय कई नए सवालों को जन्म दिया है.

स्वात के एक शहरी मोहम्मद रूम ने कहा, "हम सेना पर 6 अरब डालर की बड़ी रक़म सालाना ख़र्च करते हैं और वो अपना काम भी ठीक तरह से करने में सक्षम नहीं है."

मीडिया

सरकार की मुखर आलोचक रही पाकिस्तानी मीडिया परंपरागत तौर पर देश की सेना से संबधित विवादों पर बहस करने से बचती रही है.

कई लोग तो इस मामले को सेना की नागरिक सरकार को बदनाम करने की साज़िश के तौर पर देख रहे हैं.

सेना की कारगुज़ारियों पर रेमंड डेविस की रिहाई के बाद भी सवाल उठाए गए थे.

अमरीका की ख़ुफ़िया ऐजेंसी सीआईए के कार्यकर्ता पर दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या का आरोप था और पुलिस ने उन्हें ग़िरफ़्तार भी किया गया था लेकिन बाद में लाहौर की एक अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया था.

समझा जाता है कि पुलिस ने डेविस को सेना के कहने पर ही ग़िरफ़्तार किया था, लेकिन बाद में उसकी रिहाई को पाकिस्तानी सेना की कमज़ोरी के तौर पर देखा गया.

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