फ़ैसला पाकिस्तानियों को ही करना है...

  • 23 मई 2011
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अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का कहना है कि अगर उन्हें अल क़ायदा के किसी वरिष्ठ नेता की कहीं भी मौजूदगी की जानकारी मिली तो वे उन्हें मिटाने के लिए ऐबटाबाद जैसी एकतरफ़ा कार्रवाई करने से नहीं चूकेंगे.

इसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि वह पहले ही अमरीकी सांसद जॉन केरी से तय कर चुके हैं कि पाकिस्तान में अगर भविष्य में किसी कार्रवाई की ज़रुरत हुई तो वह साझा कार्रवाई करेंगे.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का देश की विदेश नीति से कितना संबंध है और वह उस पर कितना प्रभावशाली हो सकता है उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अमरीका के एक सांसद की बात को उस देश के राष्ट्रपति के बयान से ज़्यादा महत्व देता है. ख़ैर आगे बढ़ते हैं.

वैसे भी राष्ट्रपति ओबामा की एकतरफ़ा कार्रवाई की बात को दोहराने से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण बात पाकिस्तान और भारत के संबंधों के बारे में थी. उनका कहना था कि पाकिस्तान भारत को अपने लिए सबसे अहम ख़तरा समझता है और वह अपने क़बायली इलाक़ों और अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को भी उसी दिशा में देखता है. राष्ट्रपति ओबामा के ख़्याल में यह एक बड़ी ग़लती है.

लेकिन राष्ट्रपति ओबामा ने दुनिया को यह समझाने की कोशिश नहीं की है कि ऐसा क्यों है. शायद इसलिए कि ऐसा करने से वह ख़ुद ग़ैर-ज़रुरी कूटनीतिक समस्या में उलझता पाते या शायद इसलिए कि ऐसा करने के लिए उन को उस दरार का ज़िक्र करना पड़ता जो पाकिस्तान के पिछले तीन दशकों की विदेश नीति में उसके समाज और रियासती ढांचे में डाली है.

'पाकिस्तानी विदेश नीति'

उस हक़ीक़त का शायद ही कोई विरोध करता हो कि पाकिस्तानी की विदेश नीति को बनाने और लागू करने में विदेश मंत्रालय की भूमिका सोवियत संघ के ख़िलाफ़ हुए अफ़ग़ान युद्ध के दौरान की ख़त्म हो गई थी. यह वह दौर था जब राजनीति का शब्द पाकिस्तान में गाली बन गया था और सैन्य नेतृत्व ख़ुद को देश की संप्रभुत्ता और विकास का एक मात्र अधिकारी समझने लगा था.

जनरल ज़िया की मौत के बाद पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के उस शासकीय रवैये ने मजबूरी के तहत कुछ समय के लिए लोकतंत्र का नक़ाब ओढ़ लिया लेकिन बुनियादी तौर पर यह सोच न केवल बदली बल्कि समय के साथ साथ मज़बूत भी होती गई.

उसी सोच के लिए पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने संविधान के आठवें संशोधन जैसे हथकंडों की ज़रुरत पड़ी और जब स्पष्ट हो गया कि आठवें संशोधन का हथियार ख़त्म हो गया है कि जनरल मुशर्रफ़ के रुप में एक और सैन्य शासक एक फिर सीधे राजनीति में आ धमका.

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Image caption दो मई को अमरीकी कार्रवाई में ओसामा को मौत हो गई थी.

ऐसा नहीं है कि उस दौरान पाकिस्तान के राजनीति नेतृत्व ने उस सोच को बदलने की कोशिश नहीं की. बेनज़ीर भुट्टो ने अपने पहले कार्यकाल में भारत में चल रहे सिखों के आंदोलन के लिए पाकिस्तान का समर्थन ख़त्म कर दिया लेकिन उसके विरोध में सेना की ओर से उन पर देशद्रोही होने का आरोप लगा.

नवाज़ शरीफ़ ने अपने दूसरे दौर में भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और अपने भारतीय समकक्ष को वाघा के रास्ते पाकिस्तान आने का न्योता दिया. लेकिन जनरल मुशर्रफ़ और उस वक़्त के सैन्य नेतृत्व को यह बात अच्छी नहीं लगी और जनरल मुशर्रफ़ ने वाघा सीमा पर भारतीय प्रधानमंत्री का स्वागत करने से इनकार कर दिया. उस वक़्त जानकारों का कहना था कि मुशर्रफ़ सर्वजानिक रुप से भारतीय प्रधानमंत्री को सलाम करने के लिए तैयार नहीं थे.

'भारत से दोस्ती'

जैसे ही पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को यह महसूस हुआ कि देश के राजनीतिक नेतृत्व सभी दिक़्क़तों के बावजूद भी भारत से दोस्ती को हक़ीक़त बनाना चाहती है, उसने राजनीति नेतृत्व की उस कोशिश को कारगिल के पहाड़ों पर ले जाकर मारा.

उसे इतिहास को नज़र में रखा जाए तो यह सवाल उठता है कि वह कौन सा पाकिस्तान जिसकी राष्ट्रपति ओबामा बात करते हैं और जिसके बारे में वह कहते हैं कि वह भारत को अपनी दुश्मन मानता है. क्या यह पाकिस्तान जनता का पाकिस्तान है, राजनेताओं का पाकिस्तान है या सैन्य शासकों और फ़ौजी सोच का पाकिस्तान है.

यह एक मुश्किल सवाल है क्योंकि उसका जवाब तलाश करने के लिए शायद यह भी पूछना पड़ेगा कि देश का सैन्य नेतृत्व जब भी भारत को दुश्मन कह रहे होते हैं तो क्या वह उसे पाकिस्तान का दुश्मन कह रहे होते हैं या उससे दोस्ती की इच्छा को उस तंत्र का दुश्मन कह रहे होते हैं जिसमें पाकिस्तान के आधे से ज़्यादा साधन एक ऐसी जंग के इंतज़ार की नज़र हो जाते हैं जिसकी न तो किसी को इच्छा है और न ज़रुरत और न ही अतीत, हाल और भविष्य में उस युद्ध में किसी पाकिस्तानी को कभी विजय नहीं दिखी है.

यह सवाल इसलिए भी मुश्किल है कि यह सवाल पाकिस्तान से केवल पाकिस्तानी ही कर सकते हैं. केवल पाकिस्तानी ही यह फ़ैसला ले सकते हैं कि उन्हें यह फौजी सोच ज़्यादा प्रिय है जो ओसामा बिन लादेन जैसे ख़तरों को यमन, सूडान और अफ़ग़ानिस्तान के घसीट कर ऐबटाबाद ले आती है और तीन दशकों से पाकिस्तानी समाज और रियासत में दरारें डाले हुए हैं या उन्हें अपने देश और अपने युवा पीढ़ी का भाविष्य प्रिय है जो जन्म होने से ले कर अब तक केवल बाहरी और भीतर हिंसा के माहौल में पले बढ़े हैं.

अगर पाकिस्तानी यह ख़ुद सवाल नहीं करेंगे तो बाहर वाले तो केवल इतना ही कर सकते हैं कि जहाँ आपको एक सीमा से बढ़ता देखें तो, आपके साथ वही करें जो उन्होंने ओसामा बिन लादेन के साथ किया.

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