अख़बारों ने कराची हमले पर उठाए सवाल

पाक प्रेस
Image caption अख़बारों में सेना की भूमिका पर कई सवाल उठाए गए हैं.

पाकिस्तान के अधिकतर अख़बारों ने नौसेना के ठिकाने पर हुए हमले को लेकर सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका पर कई सवाल उठाए हैं और कड़ी आलोचना की है.

अंग्रेज़ी के अख़बार ‘डेली डॉन’ ने लिखा है कि कराची में 16 घंटों की लगातार मुठभेड़ के बाद सुरक्षाबलों ने नौसेना के ठिकाने पर नियंत्रण स्थापित कर दिया और उसी कार्रवाई में 10 सुरक्षाकर्मी और चार चरमपंथी मारे गए जबकि दो चरमपंथी फ़रार होने में कामयाब रहे.

अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा है कि 2009 में रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय पर हुए हमले के बाद पहली बार चरमपंथियों ने दुस्साहस और कुशल योजना बना कर कराची में नौसेना के ठिकाने पर हमला कर दिया.

डेली डॉन ने लिखा है कि अगर गृहमंत्री रहमान मलिक सही हैं कि चार चरमपंथियों ने 16 घंटों पर सुरक्षाबलों का मुक़ाबला किया तो क्या पाकिस्तानी जनता अपनी सेना पर विश्वास करेगी जिसके सुरक्षा करने वाले ख़ुद आतंकवाद का निशाना बन रहे हैं.

अख़बार ने अपने संपादकीय में एक गंभीर सवाल की ओर इशारा किया है कि क्या तालिबान चरमपंथियों के समर्थक नौसेना के ठिकाने में मौजूद थे? इस संभावना को रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि पिछले हमलों में भी सैन्य अधिकारियों के लिप्त होने की बात सिद्ध हो चुकी है.

'सेना के भीतर से मदद'

डेली डॉन के मुताबिक कराची हमले में ख़ुफ़िया एजेंसियों की नाकामी इस हमले का सबसे बड़ा सच है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि चमरपंथियों के सुरक्षित ठिकाने न केवल क़बायली इलाक़ों में हैं बल्कि कराची में भी मौजूद हैं. शहर में तालिबान के मज़बूत तंत्र के बग़ैर यह हमला संभव ही नहीं है.

अंग्रेज़ी के एक और अख़बार ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ ने अपने संपादकीय का शीर्षक दिया है कि ख़तरा सीमा के पार नहीं बल्कि भीतर है.

इस अख़बार ने भी वही सवाल उठाए हैं जो डेली डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है. द एक्सप्रेस ट्रिब्यून लिखता है कि चरमपंथियों ने जिस दुस्साहस और योजना के साथ हमला किया है उससे कई सवाल जन्म ले रहे हैं कि क्या इस हमले के लिए नौसेना ठिकाने के भीतर से मदद हुई, क्या यह संभव है कि चरमपंथियों ने ठिकाने के भीतर से ही अभियान की पूरी जानकारी प्राप्त की हो?

अख़बार के मुताबिक नौसेना के ठिकाने में मौजूद कुछ तत्वों की सहानुभूति के बिना यह हमला संभव नहीं था.

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून लिखता है कि कुछ ऐसे लोग हैं जो दुनिया की नज़र में इस हमले के लिए भारत या अमरिका पर आरोप लगाएँगे और पाकिस्तान अब एक ऐसा देश बन गया है कि जो सामरिक संपत्ति को बचाने में सक्षम नहीं है.

कौन है ज़िम्मेदार?

अख़बार लिखता है कि इसका ज़िम्मेदार कौन है? जनता जानती है कि जिस सेना पर उसके बजट का बड़ा हिस्सा ख़र्च किया जाता है वह उसकी सुरक्षा करने में असफल रही है. सेना अपने उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे जो चरमपंथियों की मदद कर रहे हैं और इस प्रकार के अभियान की जानकारी चरमपंथियों को देते हैं.

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Image caption रविवार की रात कुछ चरमपंथियों ने नौसेना के बस पर हमला किया था.

डेली टाईम्स ने ‘पाकिस्तान के लिए युद्ध’ के नाम से संपादकीय लिखा है. अख़बार लिखता है कि चरमपंथियों ने जिस प्रकार से अभियान किया उससे लग रहा है कि उन्होंने कई महीनों तक उसकी योजना बनाई होगी.

अख़बार के अनुसार चरमपंथियों को विमानों और नौसेना की ठिकाने की पूरी जानकारी थी और इस प्रकार की जानकारी केवल नौसेना के भीतर से ही आ सकती है.

डेली टाईम्स लिखता है कि जब 2009 में सेना मुख्यालय पर हमला हुआ था तो सेना के कुछ अधिकारियों ने संदेनशील जानकारी हमलावरों को दी थी. अगर इस बार भी यही हुआ है कि सेना को अपने भीतर उन तत्वों की निशानदही करनी चाहिए और व्यापक स्तर पर जाँच करना चाहिए.

अख़बार के मुताबिक पाकिस्तानी सेना के पास अपने दुश्मनों से लड़ने के लिए आधुनिक हथियार हैं लेकिन चरमपंथियों के पास सेना से लड़ने के लिए इच्छाशक्ति और धैर्य है. अब ज़रुरत इस बात की है कि सेना चरमपंथियों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दे और अपना दोहरा खेल छोड़ दे.

अंग्रेज़ी अख़बार नेशन लिखता है कि किसी दूसरे देश की मदद के बिना कराची में नौसेना पर हुआ हमला मुमकिन ही नहीं है. अख़बार के मुताबिक दो ऐसे देश हैं जो पाकिस्तान और उसकी सेमा को नुक़सान पहुँचाना चाहते हैं और वह हैं भारत और अमरीका.

अख़बार लिखता है कि हमलावरों ने नौसेना के जिन विमानों के तबाह किया है भारत उससे पसंद नहीं करता था और भारत नहीं चाहता था कि पाकिस्तान के पास ऐसे विमान हों.

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