वर्जित मुद्दों को उठाती पाकिस्तानी फ़िल्म

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पाकिस्तानी समाज के कई ऐसे पहलू हैं जिन पर बात करना वर्जित माना जाता है या ठीक नहीं समझा जाता.

हैरानी की बात नहीं कि फ़िल्मकार शोएब मंसूर की नई फ़िल्म बोल विवादों के घेरे में है क्योंकि इस फ़िल्म में उन्होंने पाकिस्तान में हिजड़ों की दशा, महिलाओं के अधिकार, पुलिस में भ्रष्टाचार और पुरुष प्रधान समाज जैसे मु्द्दों को उठाया है.

पुराने लाहौर शहर में आधारित फ़िल्म बोल एक मध्य वर्गीय परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है. पिता एक हकीम है जो जड़ी बूटियों से लोगों का इलाज करता है. उसकी छह बेटियाँ हैं, घर की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है फिर भी उसे एक और बच्चे....बेटे की तमन्ना है.

इससे पहले शोएब मंसूर ने फॉर द लव ऑफ़ गॉड नाम की फ़िल्म बनाई थी जिसमें उन्होंने चरमपंथ के मुद्दे को दिखाया था. इसे दर्शकों ने काफ़ी सराहा था.

लॉलीवुड के नाम से मशहूर पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग की हालत पिछले कुछ वर्षों में अच्छी नहीं रही है.

70 और 80 के दशक में एक साल में करीब 100 फ़िल्में बनाई जाती थीं लेकिन अब दर्जन भर फ़िल्में ही साल भर में रिलीज़ हो पाती हैं. इसका एक कारण फ़िल्मों की घटती गुणवत्ता भी है.

पाकिस्तानी फ़िल्मकार शोएब मंसूर की पहली फ़िल्म फॉर द लव ऑफ़ गॉड इसलिए सराही गई थी क्योंकि इसने अपनी कहानी और निहित संदेश के ज़रिए फ़िल्म उद्योग में नई स्फ़ूर्ति पैदा कर दी थी. उनकी दूसरी फ़िल्म बोल को भी इसीलिए पसंद किया जा रहा है.

कड़ी प्रतिक्रिया

पाकिस्तान के टीवी चैनल जियो के कार्यकारी निदेशक आग़ा नासिर के मुताबिक फ़िल्म बोल पाकिस्तानी दर्शकों के हिसाब से बोल्ड है और दर्शकों को पसंद आनी चाहिए.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार ज़ाहिद हुसैन कहते हैं, “ये फ़िल्म हमारे समाज में दोगलेपन को दर्शाती है. पाकिस्तान में ऐसी फ़िल्में कम ही देखने को मिलती हैं.”

लेकिन कट्टरपंथी धार्मिक विचारधारा वाले लोगों के बीच ये फ़िल्म असर दिखा पाएगी? आग़ा नासिर और ज़ाहिद हुसैन दोनों मानते हैं कि ऐसा हो सकता है.

हालांकि ज़ाहिद हुसैन को आशंका है कि फ़िल्म को लेकर बड़ै पैमाने पर प्रतिक्रियाएँ सामने आ सकती है. वे कहते हैं, “ये देखना होगा कि समाज के रुढ़िवादी और उदारवादी लोग इसे कैसे लेते हैं, ये एक बोल्ड फ़िल्म है.”

सवाल उठाती फ़िल्म

फ़िल्मकार शोएब मंसूर मानते हैं कि अपनी पहली फ़िल्म को लेकर उन्हें रुढ़िवादी लोगों से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी और ऐसे लोग उनसे काफ़ी नाराज़ थे.शायद यही कारण है कि अब वे मीडिया की सुर्ख़ियों से दूर रहते हैं. वे नई फ़िल्म के बारे में टेप पर बोलने के लिए तैयार नहीं है.

कुछ लोगों ने इस रवैये के लिए शोएब की आलोचना की है. एक दर्शक का कहना है कि फ़िल्मकार दूसरों को आवाज़ उठाने के लिए कह रहे हैं लेकिन ख़ुद चुप्प हैं.

वहीं मंसूर का कहना है कि उनकी फ़िल्म का मुख्य मकसद पाकिस्तानी समाज में महिलाओं के प्रति ख़राब व्यवाहर को दर्शाना है.

वे कहते हैं, “पाकिस्तान जैसे समाज में औरत या हिजड़ा बनकर पैदा होना...इस विचार से ही मुझे डर लगता है...ये त्रासदी है कि धर्म का अर्थ और इसके मायने महिलाओं से शुरु होकर महिलाओं पर ही ख़त्म हो जाते हैं. अगर शहरों की पढ़ी-लिखी अमीर वर्ग की पाँच फ़ीसदी महिलाओं को छोड़ दें तो समाज के लिए बाकी 95 फ़ीसदी महिलाएँ किसी जंग के मैदान की तरह हैं जहाँ हम धर्म की पुरानी मान्यताओं को आगे बढ़ाने का काम करते हैं.”

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