संदिग्ध आतंकवादियों के मामले में पाक अदालतें नाकाबिल: अमरीका

  • 31 अगस्त 2011
संदिग्ध चरमपंथी
Image caption अमरीका ने यह रिपोर्ट हाल ही में जारी की है

अमरीकी विदेश मंत्रालय की साल '2010 में आतंकवाद' रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी अदालतें 'संदिग्ध आतंकवादियों के खिलाफ़ मुक़दमे चलाने में लगभग नाकाबिल हैं.'

अपनी इस रिपोर्ट में अमरीका ने कहा है, "पड़ताल के बाद पता चला है कि कई ऐसे चर्चित आतंकवादी हमलों में जिनमें अमरीकी लोग शिकार बने थे, वो सभी अभियुक्त पाकिस्तानी न्यायिक प्रणाली द्वारा बरी कर दिए गए."

अमरीका का दावा है कि पाकिस्तान में संदिग्ध आतंकवादियों से संबंधित 75 फ़ीसदी मामलों में अभियुक्त बरी हो जाते हैं.

अमरीकी विदेश मंत्रालय की इस रिपोर्ट में ऐसी कई टिप्पणियाँ पाकिस्तान के बारे में की गईं हैं जिन्हें बहुत उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता है.

तीखी टिप्पणियाँ

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जो इलाके चरमपंथियों की लिए सुरक्षित पनाहगाह माने जाते हैं उन इलाकों में कार्रवाई के बाद पाकिस्तान यह सुनिश्चित नहीं कर पाया कि वहाँ सुरक्षा एजेंसियों का कब्ज़ा बना रहे.

"आतंकवादियों और उनके लिए सुरक्षित पनाहगाहों की मौजूदगी को ख़त्म करने में अक्षम पाकिस्तान ने एक अलग रणनीति का इस्तेमाल किया. उसने प्रभावित इलाकों में सीमित अभियान चला कर आतंकवादी गतिविधियों को “थामने” की कोशिश की है."

पाकिस्तान में सत्ता और शक्ति के केंद्रों में से एक माने जाने वाली पाकिस्तानी सेना के बारे में भी इस रिपोर्ट में टिपण्णी की गई है.

इसमें कहा गया है, "पाकिस्तानी सेना उन इलाकों में अभियान चला रही है जो आतंकवादी गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं पर वो सभी ज़रूरी इलाकों में अपने अभियानों का विस्तार नहीं कर रहे हैं."

‘कमज़ोर वित्तीय नियंत्रण’

चरमपंथियों की आर्थिक गतिविधियों को रोकने के लिए बने पाकिस्तान के कानून में कई सुराख़ हैं.

इस रिपोर्ट में यह कहा गया है,"पाकिस्तान सरकार विदेशी सरकारों और सहायता संगठनों पर हमले करने वालों की वित्तीय मदद को अपराध बना कर रोकने में असफल हुई है."

साथ ही ये भी कहा गया है, "संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन दूसरे नामों से काम करते रहते हैं और वित्तीय क़ायदे उन पर बेअसर रहते हैं. यह संगठन अपने पुराने ताल्लुकातों को छुपाने की कोई खास कोशिश भी नहीं करते."

पकिस्तान के सामने चुनौतियाँ

पाकिस्तान में चरमपंथ से जुड़े अन्य बिंदुओं पर बात करते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है, "पाकिस्तान में, खास तौर पर क़बायली इलाकों, जैसे फ़ाटा और खै़बर पख़्तूनख़्वाह जैसे इलाकों को आतंकवादी संगठन अपने ठिकानों की तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं."

इस रिपोर्ट में माना गया है कि पाकिस्तानी सेना ने इस इलाके में कई महत्वपूर्ण अभियान छेड़े हैं.

लेकिन इसी बात के आगे इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, "चरमपंथी संगठन पाकिस्तान में पैसा जमा करने, चरमपंथियों की भर्ती करने और उन्हें अफ़गानिस्तान सहित अन्य जगहों पर भेजने का काम करते हैं."

अत्यधिक बोझ

पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत में वकील अहमर बिलाल सूफ़ी इस रिपोर्ट से सहतमत हैं.

सूफ़ी इसके पीछे का करण बताते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान की अदालतें और जांच अधिकारी चरमपंथ के मामलों के तले दबे हुए हैं.

उनका कहना है, "ना जाँच अधिकारियों के पास इस तरह के मामलों की जांच करने के लिए पर्याप्त समय होता है ना ही संसाधन इसलिए अधिकाँश मामलों में मुक़दमे हाई कोर्ट तक पहुँचते पहुँचते बेमानी हो जाते हैं."

सूफ़ी यह भी कहते हैं कि चरमपंथ के मामलों में सज़ा का प्रतिशत बढ़ाने के लिए संसाधन बदहने के अलावा भी कई कदम उठाने होंगे.

सूफ़ी के अनुसार "कई यूरोपीय मुल्कों और अमरीका की तर्ज़ पर जजों की पहचान को गोपनीय रखना भी ज़रूरी है ताकि अपराधी के साथी जज पर दबाव ना डाल सकें."

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