तालिबान के समर्थन से अमरीका की मदद तक

  • 8 सितंबर 2011
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Image caption 2001 में जब अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर कार्रवाई की तो पाकिस्तानी सेना सतर्क हो गई.

अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में 11 सितंबर को हुए चरमपंथी हमलों को 10 साल हो रहे हैं. इस दौरान पाकिस्तान ने घरेलू और अतंरराष्ट्रीय स्तर पर कई उतार चढ़ाव का सामना किया है.

उन हमलों के विरोध में अमरीकी प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद चरमपंथियों को ख़त्म करने के लिए सैन्य अभियान का फ़ैसला किया, तो उसने पाकिस्तान से मांग की कि वह तालिबान और दूसरे चरमपंथियों का समर्थन बंद कर आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में उसका साथ दे.

उस अमरीकी मांग ने पाकिस्तानी सरकार को काफ़ी मुश्किल में डाल दिया क्योंकि यह वह समय था, जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार के साथ पाकिस्तान के अच्छे संबंध थे.

पाकिस्तान में उस वक़्त के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का साथ देने पर राज़ी हो गए और बिन किसी शर्त के अमरीकी की सभी माँगें मान लीं.

'अमरीका का था दबाव'

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने उस फ़ैसले के बारे में एक अमरीकी टीवी चैनल सीबीएस को दिए गए एक इंटरव्यू में बताया था कि अमरीका ने पाकिस्तान को धमकी दी थी कि अगर पाकिस्तान ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का साथ न दिया, तो अमरीका पाकिस्तान पर हमला कर सकता है.

उन्होंने कहा था, "अमरीकी ख़ुफ़िया विभाग के एक अधिकारी ने मुझे कहा था कि अमरीकी उप विदेश मंत्री रिचर्ड आर्मिटेज कह रहे हैं कि युद्ध में साथ न दिया तो हमले के लिए तैयार हो जाएँ."

उसके बाद रिचर्ड आर्मिटेज ने ख़ुद इस बात का खंडन किया था.

आतंकवाद के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय युद्ध में शामिल होने का फ़ैसला चाहे पाकिस्तान ने किसी दबाव में किया या अपनी मर्ज़ी से और इसी फ़ैसले ने पाकिस्तान की विदेश नीति में बड़ा परिवर्तन कर दिया.

जाने माने विश्लेषक डॉ. हसन असकरी का कहना है कि तालिबान का समर्थन बंद कर देने से पाकिस्तान की विदेश नीति का रूप ही बदल गया.

उन्होंने कहा, "2001 तक पाकिस्तान तालिबान का सबसे बड़ा समर्थक का था और सितंबर 2001 के बाद उसने एकदम तालिबान का साथ छोड़ कर अमरीकी नेतृत्व में आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में शामिल होने का फ़ैसला किया और उसका देश पर बड़ा प्रभाव पड़ा."

उनका यह भी कहना था कि अगर पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का साथ न देता, तो पाकिस्तान को गंभीर परिणाम का सामना करना पड़ता और अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे युद्ध का भी असर होता.

Image caption मुशर्रफ़ ने अमरीकी दबाव के बाद आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का साथ दिया.

डॉ. हसन असकरी के मुताबिक़ 11 सितंबर के हमले से पहले पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला हो गया था और एक नाकाम देश के तौर पर पेश किया जा रहा था.

आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में एक अहम सदस्य बनने से पाकिस्तान को यह फ़ायदा ज़रूर हुआ कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उसके सभी गुनाह माफ़ कर दिए और उसको ख़ूब सम्मान मिला.

'नकारात्मक परिणाम'

कुछ लोग इस विचार से सहमत नहीं हैं और उनका कहना है कि इस युद्ध में शामिल होने से पाकिस्तान को अतंरराष्ट्रीय स्तर पर तो सम्मान मिला, लेकिन घरेलू स्तर पर उसको कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

विश्लेषकों के विचार में अमरीका की माँगें पूरी करते-करते पाकिस्तान पिछले 10 सालों में एक ‘सिक्यूरिटी स्टेट’ बन चुका है और यह उसकी विदेश नीति का ही नतीजा है.

पिछले दस सालों में पाकिस्तानी सरकार ने जितना पैसा सुरक्षा कर ख़र्च किया है उतना स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च नहीं किया गया है. बहुत पैसा ख़र्च करने के बावजूद आज भी पाकिस्तान सुरक्षित नहीं है.

पाकिस्तान में इन्हीं दस सालों में क़बायली इलाक़ों में अमरीका ने मानवराहित विमानों से हमले किए जिसमें सैंकड़ों चरमपंथियों को मारा गया. मरने वालों में 2008 में हुए मुंबई हमलों के मुख्य साज़िशकर्ता इल्यास कश्मीरी भी शामिल हैं.

'ओसामा का मौत'

इसी दौरान पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने अमरीका की मदद से कई वरिष्ठ चरमपंथियों को गिरफ्तार कर अमरीका और दूसरे देशों के हवाले कर दिया.

पिछले एक दशक में सैन्य अभियानों में सैंकड़ों चरमपंथी मारे भी गए और इसी साल अमरीकी सैनिकों में पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर में गुप्त अभियान कर अल क़ायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मार दिया.

विश्लेषक प्रोफ़ीसर शमीम अख़्तर कहते हैं कि 2001 के बाद विदेश नीति में परिवर्तन से पाकिस्तान में आतंकवाद और चरमपंथ में बढ़ोत्तरी हुई है और आज भी देश उसका सामना कर रहा है जिसकी वजह से पाकिस्तान पिछले कई सालों से ‘सिक्यूरिटी स्टेट’ बना हुआ है.

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान हमेशा अमरीका का समर्थन करता रहा है, जिसकी वजह से देश आंतरिक स्तर पर काफ़ी कमज़ोर हो गया और पिछले दस सालों में स्थिति काफ़ी गंभीर हो गई है जिससे आम नागरिकों को काफ़ी नुक़सान हुआ है."

प्रोफ़ीसर शमीम के मुताबिक़, "2001 से पहले पाकिस्तान में स्थिति किसी हद तक सामान्य थी. न इतने बम धमाके हुए और न ही कोई बड़ी चरमपंथी कार्रवाई हुई लेकिन 2001 के बाद पाकिस्तान एक युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है."

'फ़ैसले का बचाव'

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ आज भी तालिबान के समर्थन ख़त्म करने के फ़ैसला का बचाव करते हैं.

कुछ महीने पहले उन्होंने फ़ेसबुक पर अपने एक संदेश में कहा था कि 11 सितंबर के हमलों के बाद पाकिस्तान ने अमरीका का साथ देना का बिल्कुल सही फ़ैसला किया था, क्योंकि सबको पता था कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करेगा.

उन्होंने कहा था, "उस वक़्त सवाल यह था कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान पर किस तरफ़ से हमला कर सकता है. वह रुस, मध्य एशिया और ईरान से तो हमला नहीं करता, तो एक ही रास्ता था कि वह पश्चिम और दक्षिण से हमला करेगा और उस स्थिति में हमारी संप्रभुत्ता का उल्लंघन होता."

उन्होंने आगे कहा था कि क्या यह पाकिस्तान के हित में होता कि अमरीका भारत की मदद के साथ पाकिस्तान के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करता. यह पाकिस्तान के हित में नहीं था.

जनरल मुशर्रफ़ के मुताबिक़ अमरीका का साथ देना का फ़ैसला पाकिस्तान के हित में था लेकिन पाकिस्तान इन्हीं दस सालों में बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है और पिछले दस सालों से पाकिस्तान लगातार आतंकवाद का सामना कर रहा है.

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