पाक: विदेश नीति और चरमपंथ

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Image caption पाकिस्तान में बढ़ता चरमपंथ पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है.

पिछले कुछ दिनों में अमरीका ने हक़्क़ानी नेटवर्क के ख़िलाफ़ निर्णायक कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव डाला है.

अमरीका का मानना है कि हक़्क़ानी नेटवर्क अफ़ग़ानिस्तान में पश्चिमी सैनिकों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है.

पाकिस्तान ने अमरीका के इस दबाव पर गहरी नाराज़गी जताते हुए कहा है कि अमरीका हक़्क़ानी नेटवर्क के पाकिस्तानी धरती पर सक्रिय होने के सबूत दें.

पाकिस्तान ने चेतावनी तक दे डाली कि अगर पश्चिमी देश इसी तरह से पाकिस्तान पर चरमपंथियों के समर्थन का आरोप लगाते रहे तो वे अपना एक प्रमुख सहयोगी खो सकते हैं.

हालांकि इसमें कुछ भी नया नहीं है लेकिन दोनों सहयोगियों (अमरीका और पाकिस्तान) के बीच ताज़ा कहा-सुनी अमरीका की बेचैनी को दिखाता है जो शायद पहले कभी नहीं देखा गया था.

ज़ाहिर तौर पर अमरीका का पाकिस्तान पर दबाव सिर्फ़ हक़्क़ानी नेटवर्क के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए भले हो लेकिन ये पाकिस्तान की दशकों पुरानी नीति से दुनिया के देशों की नाराज़गी को भी दर्शाता है.

पाकिस्तान की ये पुरानी नीति रही है कि वो अपनी विदेश नीति का निर्धारण चरमपंथी संगठनों से संबंधो के आधार पर करता है.

अमरीकी सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी एडमिरल माइक मलेन ने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले अमरीकी संसद के सामने पेश होकर कहा था कि हक़्क़ानी नेटवर्क पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के एक प्रमुख अंग की तरह काम करते हैं.

लेकिन ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र पर देश की विदेश नीति का लक्ष्य हासिल करने के लिए चरमपंथी संगठनों को इस्तेमाल करने के आरोप लगे हैं.

चाहे वो दोस्त हो या दुश्मन पिछले कुछ वर्षों में भारत, चीन, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान समेत पाकिस्तान के हर पड़ोसी देश ने पाकिस्तान पर इस तरह के आरोप लगाए हैं.

ऐसा क्यों होता है इसे समझने के लिए पाकिस्तान में सक्रिय चरमपंथी संगठनों पर एक नज़र डालनी होगी.

चरमपंथ में इज़ाफ़ा

बीबीसी के एक शोध के मुताबिक़ पिछले 40 वर्षों में पाकिस्तान में 25 से भी ज़्यादा चरमपंथी संगठन पैदा हुए हैं.

उनमें से हर एक का एक पूर्व निर्धारित राजनीतिक एजेंडा रहा है और ज़्यादातर मामलों में उनका एजेंडा उस समय पाकिस्तान सरकार की विदेश नीति से पूरी तरह मेल खाता है.

निजी लड़ाके गुट गठित करना और उग्र राजनीतिक संगठनों को सैन्य क्षमता हासिल करने में मदद करना पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र पुरानी आदत रही है.

कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान का भारत के साथ जब से विवाद रहा है, तभी से पाकिस्तान इस तरह की नीति अपना रहा है.

पाकिस्तान की ये नीति पहले धर्मनिर्पेक्षता और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर आधारित थी लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया अब ये नीति सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाम के नाम पर आधारित है.

1965 से 1971 के बीच जितने भी चरमपंथी संगठन बने थे उनका मक़सद कश्मीर में भारत के प्रशासन का विरोध करना था और वे सारे गुट अपनी विचारधारा में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी थे.

लेकिन 1971 में बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने के बाद पाकिस्तानी प्रशासन ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए धार्मिक गुटों का सहारा लेना शुरु कर दिया.

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Image caption 80 के दशक में जलालुद्दीन हक़्कानी ने हक़्क़ानी नेटवर्क का गठन किया था

अल-बद्र और अल-शम्स ऐसे चरमपंथी गुट थे जिन पर आज भी बांग्लादेश आरोप लगाता है कि उन गुटों के सदस्यों ने बांग्लादेश की आज़ादी का समर्थन करने वाले कई बुद्घीजीवियों की हत्या की थी.

बांग्लादेश के अलग देश बन जाने के बाद उन गुटों को भंग कर दिया गया है.

सोवियत संघ के ख़िलाफ़ 1979 में जब अफ़ग़ान युद्घ की शुरुआत हुई तब एक दफ़ा फिर अल-बद्र गुट को सक्रिय करने की कोशिश की गई. 1989 में भारत प्रशासित कश्मीर में जब भारत विरोधी प्रदर्शन शुरु हुए तब भी अल-बद्र को सक्रिय करने की कोशिश की गई थी.

अफ़ग़ान संबंधी गुट

अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ इन चरमपंथी गुटों की सफलता ने पाकिस्तान को यक़ीन दिला दिया कि उनके पास ये जीत का फ़ार्मूला है.

80 के दशक में लगभग सात नए चरमपंथी गुट बने जिनकी मुख्य गतिविधि कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान पर केंद्रित थी.

उनमें से एक अंजुमन- सिपाहे- सहाबा का गठन 1979 में हुई ईरानी क्रांति के जवाब में हुआ था.

अंजुमन-सिपाहे-सहाबा का मुख्य उद्देश्य था पाकिस्तान में शिया नेताओं को निशाना बनाना और दक्षिणी पंजाब के झंग से शुरु होने वाला ये संगठन जल्द ही पाकिस्तान के कई इलाक़ो में फैल गया.

1989 में सोवियत संघ की सेना के अफ़ग़ानिस्तान से चले जाने और फिर उसके विघटन ने इन चरमपंथी गुटों को और उत्साहित किया.

नब्बे के दशक में छह और चरमपंथी संगठन बने जिन्होंने कश्मीर में विरोध प्रदर्शन को हिंसक विद्रोह में तब्दील करने में अहम रोल अदा किया.

इन विद्रोहों में हज़ारों नागरिक मारे गए.

इसी दौरान अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी के बाद अफ़ग़ान गुटों से संबंधित कई अरबी और मध्य-एशियाई चरमपंथी गुट बेकार हो गए. उनके पास करने के लिए कुछ नही था.

पेशावर पर नज़रें

उत्तरी पाकिस्तान के शहर पेशावर में सक्रिय ये चरमपंथी गुट ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगे.

ओसामा बिन लादेन ने अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा की बुनियाद मज़बूत करनी शुरु कर दी थी.

पाकिस्तान समर्थिक तालिबान के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान पर सत्ता क़ायम कर लिए जाने के बाद पाकिस्तानी चरमपंथी गुटों ने अफ़ग़ानिस्तान में अपना प्रशिक्षण जारी रखा जिसके कारण उनका अल-क़ायदा से भी संबंध बना रहा.

लेकिन पाकिस्तान में ये चरमपंथी गुट कमज़ोर पड़ने लगे थे क्योंकि अफ़ग़ान युद्घ समाप्त हो चुका था और कश्मीर के मामले में कोई ख़ास कामयाबी नही मिल पा रही थी.

बहुत से पाकिस्तानी समीक्षकों का मानना है कि इस दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने इन चरमपंथी गुटों पर अपना नियंत्रण खो दिया था लेकिन तब तक

हज़ारों लड़ाकों को प्रशिक्षण दिया जा चुका था.

पाकिस्तानी सरकार के उन चरमपंथी गुटों की तरफ़ सकारात्मक रवैये को इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उन चरमपंथी गुटों के नेता खुलेआम रैलियां करने लगे और अपने अभियान के लिए खुलेआम चंदा इकट्ठा करने लगे.

चेतावनी की अनदेखी

पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे बहुत से सुबूत मिल रहे थे कि ये चरमपंथी गुट उनके नियंत्रण से बाहर जा रहें हैं और उनका एजेंडा सुरक्षा एजेंसियों के ज़रिए तया किए गए एजेंडे से अलग होता जा रहा है लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसी तमाम चेतावनियों की अनदेखी की.

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Image caption माइक मलेन के बयान ने पाकिस्तान और अमरीका के रिश्तों में दरार पैदा कर दी है.

उदाहरण के तौर पर विभिन्न पंथों के बीच हिंसा, स्थानीय मस्जिद और धार्मिक स्थलों के नियंत्रण के लिए हिंसक संघर्ष, बढ़ता अमरीकी विरोध, ये सारे ऐसे प्रतीक थे जो बता रहे थे कि ये गुट सुरक्षा एजेंसियों के नियंत्रण से बाहर हो रहें है लेकिन इसको गंभीरता से नहीं लिया गया.

इसकी एक और मिसाल तब देखने को मिली जब दिसंबर 2000 में भारतीय विमान के अपहरण के बाद चरमपंथियों की शर्तों के तहत भारत के ज़रिए रिहा किए गए तीन प्रमुख चरमपंथियों को बड़े आराम से पाकिस्तान में दाख़िल होने और उन्हें अपना संगठन बनाने की इजाज़त दी गई.

9/11 हमलों के बाद एक दर्जन से ज़्यादा चरमपंथी गुट सामने आए जिनका एजेंडा पाकिस्तान और अमरीका के साझा एजेंडा के बिल्कुल विपरीत था.

उनमें से ज़्यादातर संगठनों का मुख्य उद्देश्य अल-क़ायदा के उद्देश्य से मेल खाता था जैसे अमरीकियों को जैसे भी संभव हो नुक़सान पहुंचाना.

सबसे अहम बात ये है कि इन चरमपंथी गुटों के ज़्यादातर लड़ाके उन्हीं गुटों के सदस्य थे जो पहले पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के इशारे पर काम करते थे.

आतंकवाद के ख़िलाफ़ कथित लड़ाई ने जैसे-जैसे पाकिस्तान मे अपना असर दिखाना शुरु किया, उदाहरण के तौर पर कराची में फ़्रांसीसी इंजीनियरों पर बम धमाके और वॉल स्ट्रीट के पत्रकार डैनियल पर्ल की हत्या ने पूरे अंतरराष्ट्रीय जगत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया और पाकिस्तान सुरक्षा एजेंसी ये सोचने पर मजबूर हो गए कि अब उन चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की ज़रूरत है.

अच्छे चरमपंथी-बुरे चरमपंथी?

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने 9/11 हमलों के बाद इन चरमपंथी गुटों के अध्ययन के लिए एक विशेष टीम का गठन किया.

Image caption परवेज़ मुशर्रफ़ कुछ चरमपंथियों को मुख्य धारा में लाना चाहते थे लेकिन ये हो न सका

टीम ने सुझाव दिया कि कुछ गुटों को ख़त्म किया जाना चाहिए और कुछ को समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

लेकिन इस समय तक ये तय कर पाना लगभग असंभव हो गया था कि कौन अच्छे चरमपंथी हैं और कौन बुरे चरमपंथी हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ती अराजकता, अल-क़ायदा का बढ़ता प्रभाव, इराक़ में जारी जंग, प्रशिक्षित चरमपंथियों का एक संगठन से दूसरे संगठन में जाना और भारत के ख़िलाफ़ चरमपंथी कार्रवाईयों में लिप्त चरमपंथी संगठन के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई ना करने के पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसी के फ़ैसले ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि ये नज़र रख पाना असंभव हो गया था कि कौन सा चरमपंथी संगठन किससे लड़ाई कर रहा है.

हक़्क़ानी नेटवर्क के प्रति पाकिस्तान सरकार का मौजूदा रवैया इस बात की ओर इशारा करता है कि पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसी ऐसे किसी भी सुझाव का विरोध करती है जिसमें ये कहा जाता है कि पाकिस्तानी सरकार अपनी विदेश नीति के लक्ष्यों को पाने के लिए चरमपंथी संगठनों की मदद नहीं ले सकती.

पाकिस्तानी सरकार पर मौजूदा दबाव हो सकता है कि केवल हक़्क़ानी नेटवर्क के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए हो लेकिन दरअसल इसका अर्थ ये है कि पूरी दुनिया पाकिस्तान की चरमपंथी गुटों पर निर्भरता के बारे में सावधान होती जा रही है.

इसलिए आने वाले वर्षो में पाकिस्तान का पूरी दुनिया से संबंध कैसा होगा ये हक़्क़ानी नेटवर्क के भविष्य पर निर्भर नहीं करेगा बल्कि वो इस बात पर तय होगा कि पाकिस्तान की जिस नीति ने इस क्षेत्र को दुनिया का एक सबसे अस्थिर और विस्फोटक क्षेत्र बना दिया है उस नीति का भविष्य क्या होगा?

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