पाकिस्तान में पत्रकारों को राहत

  • 19 अक्तूबर 2011
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Image caption पाकिस्तान के पत्रकारों ने वेज बोर्ड अवॉर्ड के लिए काफ़ी संघर्ष किया है.

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अख़बारों में काम करने वाले कर्मचारियों और पत्रकारों के लिए बने सातवें वेतन बोर्ड अवॉर्ड को लागू करने के लिए समाचार पत्रों के मालिकों को आदेश दिया है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय खंडपीठ ने बुधवार की शाम समाचार पत्रों की संस्था ऑल पाकिस्तान न्यूज़ पेपर्स सोसाइटी की याचिका रद्द कर दी.

ऑल पाकिस्तान न्यूज़ पेपर्स सोसाइटी ने सिंध हाई कोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी जिसमें अदालत ने सातवें वेज बोर्ड अवॉर्ड को लागू करने का आदेश दिया था.

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान में पत्रकारों के वेतन में बढ़ोतरी के लिए बने सातवें वेतन बोर्ड अवार्ड की घोषणा वर्ष 2001 में की थी लेकिन उस समय वह लागू नहीं हो सकी क्योंकि अख़बारों के मालिकों ने अदालत में उसके ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी.

अख़बारी मालिकों के वकीलों ने अदालत को बताया कि इससे पहले जो वेतन बोर्ड अवॉर्ड की घोषणा की गई थी वह पाँच सालों तक की थी और अब इस सातवें वेतन बोर्ड अवॉर्ड को 10 सालों का समय होने को है इसलिए इस वेतन बोर्ड को लागू करने की कोई ज़रुरत नहीं है.

'फ़ैसले का स्वागत'

पत्रकारों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन पाकिस्तान फ़ेडरल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (पीएफ़यूजे) ने इस फ़ैसला का स्वागत किया है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद पत्रकारों और अख़बारों में काम करने वाले कर्मचारियों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई लेकिन किसी भी निजी टीवी चैनल ने इस ख़बर की कोई ख़ास कवरेज नहीं की.

अख़बारी मालिकों की ओर से भी इस फ़ैसले पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

भारत में मामला लंबित

साल 1955 में भारत में अख़बारों और पत्रिकाओं में काम करने वाले पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों के श्रमिक हितों की रक्षा के लिए भारत सरकार ने वर्किंग जर्नलिस्ट विधेयक पारित किया था.

इस विधेयक में प्रावधान दिया गया था कि पत्रकारों का वेतन निर्धारित करने के लिए समय समय पर वेतन बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए.

विधेयक पारित होने के बाद नियमित रूप से वेतन बोर्ड का गठन होता रहा जिसके तहत वेतन में संशोधन के अलावा पत्रकारों की दूसरी मांगों का ख्याल रखा गया. लेकिन 1994 के बाद एक लंबे अंतराल के बाद 2007 में जी आर मजीथिया की अध्यक्षता में वेतन बोर्ड का गठन किया गया.

बोर्ड ने 2010 में श्रम मंत्रालय को अपने सुझाव भेजे जिसमें पत्रकारों के वेतन में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी की मांग के अलावा रिटायरमेंट की उम्र को 65 साल निर्धारित करने की भी बात कही.

लेकिन कुछ अख़बारों के मालिकों ने इन सुझावों का कड़ा विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दायर कर कहा कि इन सुझावों को सरकार अधिसूचित न करे.

'आवाज़ दबाने की कोशिश'

वेतन बोर्ड के सुझावों को अधिसूचित किए जाने के लिए मांग कर रही इंडियन यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट के अध्यक्ष सुरेश अखौरी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि अख़बारों के मालिक पत्रकारों की आवाज़ दबाने की कोशिश कर रहे हैं.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अख़बारों की अर्ज़ी को ठुकराते हुए कहा कि केंद्रीय केबिनेट को ही इस मामले में फ़ैसला लेना चाहिए.

लेकिन पत्रकारों ने देश भर में विरोध प्रदर्शन कर अपनी आशंका व्यक्त की कि सरकार निजी अख़बारों के मालिकों के दबाव में आकर वेतन बोर्ड के सुझावों को अधिसूचित करने में देरी कर रही है.

पत्रकारों का कहना है कि अगर उनकी मांगों को जल्द ही सरकार की मान्यता नहीं मिलती है, तो वे अपना संघर्ष और तेज़ करेंगें और देशव्यापी हड़ताल का आह्वान करेंगें.

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