'मेमो' सेना के ख़िलाफ़ साज़िश: कियानी

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Image caption कथित मेमो में पाकिस्तानी सेना के प्रभाव को कम करने के लिए अमरीकी सरकार ने मदद माँगी गई थी.

पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल अशफ़ाक़ परवेज़ कियानी ने अमरीकी अधिकारियों को भेजे गए कथित मेमो या गुप्त संदेश यानि को राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़िलाफ़ साज़िश क़रार दिया है.

जनरल अशफ़ाक़ परवेज़ कियानी ने अपना यह बयान अटर्नी जनरल के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया है, जहाँ अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक़्क़ानी की ओर से अमरीकी सैन्य अधिकारियों को भेजे गए कथित गुप्त ज्ञापन के ख़िलाफ़ दायर याचिका पर सुनवाई हो रही है.

कयानी ने अपने बयान में लिखा है, “उन तथ्यों और परिस्थितियों की जाँच होनी ज़रुरी है जिसके तहत यह विचार प्रकट हुआ और मेमो जारी किया गया क्योंकि यह मेमो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए साज़िश और सेना का मनोबल कम करने की कोशिश है.”

सेना की ताक़त

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तानी मूल के अमरीकी नागरिक मंसूर ऐजाज़ ने 10 अक्तूबर 2011 को एक समाचार पत्र में लिखा था कि अमरीका में पाकिस्तान के तत्कालीन राजदूत हुसैन हक़्क़ानी ने अमरीकी सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मलेन को कथित तौर पर एक संदेश भेजा था, जिसमें पाकिस्तानी सेना की ताक़त को कम करने के लिए अमरीका से कहा गया था.

यह मामला सामने आने के बाद प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने अमरीका में अपने राजदूत हुसैन हक़्क़ानी को इस्लामाबाद बुलाया था, उसके बाद हक़्क़ानी ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

कथित मेमो विवाद के बाद यूसुफ़ रज़ा गिलानी की सरकार संकट में आ गई थी और विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग नवाज़ शरीफ़ ने इस मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए सरकार से माँग की थी.

सरकार ने यह मामला जांच के लिए संसद की सुरक्षा समिति को सौंप दिया था, साथ ही विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग नवाज़ के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ कथित मेमो के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

सुप्रीम कोर्ट की 17 सदस्यीय खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है और उसने गत सुनवाई को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेनाध्यक्ष और आईएसआई के प्रमुख अहमद शुजा पाशा से जवाब मांगा था.

पाशा का बयान

जनरल कियानी ने आगे लिखा है, ''इस मामले की तुंरत जाँच पूरी होना महत्वपूर्ण है. मैंने प्रधानमंत्री से सिफ़ारिश की थी कि अमरीका में हमारे राजदूत को बुलाया जाए ताकि वह इस मामले पर देश के नेतृत्व को जानकारी दें.”

उन्होंने अदालत को ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लैफ़्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा और पाकिस्तानी मूल के अमरीकी नागरिक मंसूर ऐजाज़ के बीच 24 अक्तूबर 2011 को हुई मुलाक़ात का भी ब्यौरा दिया.

सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए अपने बयान में उन्होंने लिखा है, “जनरल पाशा की राय है कि मंसूर ऐजाज़ ने उन्हें जो सबूत दिखाए हैं, वह यह सिद्ध करने के लिए काफ़ी हैं कि 9 मई 2011 के बाद हुसैन हक़्क़ानी मंसूर ऐजाज़ के संपर्क में थे. दोनों के बीच एसएमएस के आदान-प्रदान और फ़ोन पर बातचीत से हुसैन हक़्क़ानी पर मेमो से जुड़े होने का संदेह होता है.”

आईएसआई के प्रमुख जनरल शुजा पाशा ने भी अदालत में अपना बयान दिया है और उन्होंने भी इस मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग की है.

उन्होंने अपने बयान में मेमो विवाद के मुख्य किरदार मंसूर ऐजाज़ से हुई मुलाक़ात की भी जानकारी दी है.

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