'मेमोगेट कांड' ज़रदारी के लिए बुरा संदेश

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Image caption अपने बयान में जनरल कियानी कोई नाम लेने से बच रहे हैं लेकिन कह रहे हैं कि यह ताकतवर सेना के खिलाफ साज़िश थी.

पाकिस्तानी सेना की सरकार से फूट और उसके 'मेमोगेट स्केंडल' में सर्वोच्च न्यालय की जाँच को समर्थन देने से ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी की तीन साल पुरानी सरकार के दिन ठीक नहीं चल रहे.

अमरीका में पूर्व राज़दूत हुसैन हक़्कानी पहले ही इस विवाद में अपनी नौकरी गवां चुके हैं, हालांकि उनका कहना है कि वह निर्दोष हैं. पर कौन कह सकता है कि कुछ और लोगों को इसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी?

यह विवाद उस 'मेमो' या चिट्ठी से शुरु हुआ था जो कथित तौर पर पाकिस्तान के राजनीतिक मुखिया की ओर हक़्कानी से होते हुए माइक मुलेन को भेजा गया था. इसमे अमरीका से पाकिस्तानी सेना को काबू करने की गुहार की गई थी.

पाकिस्तान के नेता कथित तौर पर इस बात से चिंतित थे कि ऐबटाबाद में मई के महीने में अमरीकी सुरक्षा बलों के ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद सेना तख़्तापलट करने वाली है. पिछले दिनों अपने इलाज के लिए अचानक दुबई जाने की ख़बरें आने के बाद से राष्ट्रपति की इस्लामाबाद से गैर-हाज़िरी को लेकर कई कयास लगाए जा रहे हैं.

राजनीतिक पर्यवेक्षको का मानना है कि ज़रदारी देश के बाहर से अदालत की कार्रवाई पर नज़र बनाए हुए हैं. ऐसा माना जा रहा है कि वह हक़्कानी की तरह फँसना नहीं चाहते ,जिन पर अदालत ने मुकदमे का फै़सला होने तक देश से बाहर जाने पर पाबंदी लगाई है.

षडयंत्र

चिट्ठी का अस्तित्व लगभग साबित हो चुका है. अपने बयान में पाकिस्तान सेना के प्रमुख जनरल अशफा़क़ परवेज़ कियानीने कहा है कि मुलेन और जनरल जेम्स जोन्स ने भी इस मेमो के होने की बात मानी है.

अब सभी यह जानना चाहते हैं कि इसके पीछे कौन था.

राष्ट्रपति ज़रदारी और हुसैन हक़्कानी दोनों ही इसमें अपना हाथ होने के इनकार कर रहे हैं लेकिन विवाद पर से पर्दे का हटना जारी है.

राजदूत के ख़िलाफ अभियोग अमरीका के 'लॉबिइस्ट' यानि लॉबी करने वाले प्रभावशाली व्यक्ति मंसूर एजाज़ ने लगाए थे और उनकी भूमिका को लेकर अभी भी कई सवाल हैं.

हक़्कानी के साथ उनके दस साल का नाता हैं. क्या वह अब दोहरा खेल तो नहीं खेल रहे? इस सबका का फ़ायदा आख़िर किसे है--अमरीका को या पाकिस्तानी सेना को?

अपने ताज़े बयान में जनरल कियानी कोई नाम लेने से बच रहे हैं लेकिन फिर भी वह साफ़ कह रहे हैं कि यह ताकतवर सेना के ख़िलाफ़ षडयंत्र था.

पाकिस्तान की सेना हमेशा से ही राजनीति में दख़ल देने के अपने अधिकार का बचाव करती रही है.

चाहे वो कितनी ही कमज़ोर हो, बहुत कम ही विश्लेषक समझते हैं कि सेना कभी इसे हाथ से जाने देगी.

ज़रदारी की अनुपस्थित से कई सवाल खड़े हुए हैं.

काफी लोग मानते हैं कि सेना ने ज़रूर अपने तौर पर जाँच की होगी और चिट्ठी को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँची होगी.

लेकिन क्योंकि मामला अब अदालत में पहुँच चुका है सेना इंतजार कर रही होगी कि न्यायधीश ही ज़िम्मेदार लोगों के नाम जारी करें ताकि उस पर सरकार को कमज़ोर करने का इल्ज़ाम न लगे.

एक राय ये भी है कि सारी साज़िश सेना ने ही की होगी, जो ये समझती है कि ज़रदारी सरकार अपना काम कर चुकी है.

पाकिस्तान की राजनीति में कुछ भी पूरी तरह से पुख्ता नहीं होता लेकिन यह बात साज़िशों के बारे में भी सच है.

कुछ और लोगों का कहना है कि राष्ट्रपति ज़रदारी सेना की हर आज्ञा का पालन कर रहे थे. लोगों ने उनके दोबारा चुने जाने की भी बात करनी शुरु कर दी थी लेकिन 'मेमोगेट' ने देश के सेना और नेताओं के बीच की फूट को ज़ाहिर कर दिया है.

अपनी सत्ता के दौरान ज़रदारी सरकार ने सेना के ख़िलाफ़ रूख़ को परखने का प्रयास किया है. साल 2008 में सत्ता संभालने के बाद आईएसआई को आंतरिक मंत्रालय के तहत लाने की कोशिश ऐसा ही एक कदम था.

सेना के दबाव के चलते इस अधिसूचना को कुछ ही घंटों में वापस लेना पडा़ था.

सेना को नापसंद हुसैन हक़्कानी की अमरीका में राज़दूत के पद पर नियुक्ति ने कई सुरक्षा अधिकारियों को हैरान किया था. चाहे सच हो या काल्पनिक, लेकिन 'मेमोगेट' ने उनकी नौकरी छीन ली.

जनरल कियानीके सर्वोच्च अदालत में बयान से साबित होता है कि उन्होंने ही प्रधानमंत्री और फिर बाद में राष्ट्रपति से हक़्कानी को वापस बुलाने के लिए कहा था.

वह सेना ही थी जिसने राजनीतिक नेताओं को ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया जो उन्हें नहीं उठाना चाहिए था.

लेकिन सवाल ये है कि क्या यही नाटक का अंत है?

'अटकलें शांत करें'

ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ज़रदारी कोई ख़तरा नहीं मोल चाहते भले ही वह निर्दोष क्यों न हों.

सरकारी बयानों ने इस बात पर संदेह पैदा किया है कि क्या वो इस्लामाबाद में अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं और ऐसा लगता है कि जो दवा वह ले रहे हैं वो ही उनकी बीमारी का कारण हो.

शुक्रवार को पाकिस्तान के एक मुख्य अखबार डॉन ने उनसे दुबई से घर लौट आने की अपील की ताकि 'मानसिक तनाव और अटकलों को शांत किया जा सके.'

उसने लिखा, ''आप इसे पसंद करें या न करें, पाकिस्तान की सच्चाई यही है कि यहाँ लोकतंत्र पर ख़तरा मंडराता है. इन ख़तरों से निपटना राजनीतिक नेताओं की ज़िम्मेदारी है.''

सत्ता के तीन सालों में खराब प्रशासन और भ्रष्टाचार से जूझने के बाद कोई भी इस पर यकीन नहीं कर रहा कि राष्ट्रपति ज़रदारी या उनकी सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पायेगी.

सेना के तख़्तापलट करने के दिन भले ही बीत चुके हों, कई विश्लेषकों का कहना है कि सरकार के लिए मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं.

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