नए साल में पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान की चुनौतियां

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Image caption पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान पर इस साल भी सबकी निगाहें जमी रहेंगी.

अगर साल 2011 से साल 2012 में प्रवेश करते हुए पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के लिए कोई संदेश है तो वो है बढ़ती अनिश्चितता.

मई में ओसामा बिन लादेन की मौत अमरीका के लिए एक बड़ी सफलता थी लेकिन इस घटना ने अमरीका और पाकिस्तान के बीच संबंधों को और बड़ी जटिलताओं की ओर धकेल दिया है.

अफ़ग़ानिस्तान ने कट्टरपंथी गुटों को पाकिस्तान के कथित सहयोग पर चिंताएं व्यक्त की हैं जो काबुल के अनुसार पाकिस्तान की धरती से अपने कारनामों को अंजाम दे रहे हैं.

और जैसे अमरीका और अफ़ग़ानिस्तान की चिंताएं है, वैसे ही पाकिस्तान की भी हैं. ओसामा को मारने वाला अमरीकी ऑपरेशन और नेटो के हमले में 25 पाकिस्तानी सैनिकों की मौत के बाद राष्ट्रवादियों ने पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा करने का आह्वान किया है.

पाकिस्तान के अख़बार ‘डॉन’ में पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक मुनीर अकरम ने लिखा है, “शुरूआत में झिझक के साथ अमरीका के ‘आंतक के ख़िलाफ़’ युद्ध में हिस्सा लेना स्वीकारने के बाद पाकिस्तान ने इसके लिए गंभीर सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक क़ीमत चुकाई है. इसमें अंतरराष्ट्रीय जगत में अलग-थलग पड़ी लेकिन पाकिस्तान के लिए दोस्ताना तालिबान हुकूमत के बदले काबुल में ताजिक प्रभाव वाली नई सरकार का साथ देना शामिल है."

मुनीर अकरम आगे लिखते हैं, "साथ ही एक बड़ी क़ीमत तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे चरमपंथी गुट के पैदा होने से भी पाकिस्तान ने चुकाई है.पाकिस्तान में चरमपंथी हिंसा में अबतक 30 हज़ार लोग मारे गए हैं, इनमें तीन हज़ार पाकिस्तान के सुरक्षाबलों के सैनिक थे जो पश्चिमी सीमा पर चरमपंथियों के साथ लड़ाई में मारे गए हैं. इसके अलावा पाकिस्तान की सैनिक शक्ति भारत के मुक़ाबले कमज़ोर हुई है क्योंकि डेढ़ लाख भारतीय सेना पश्चिमी सीमा पर तैनात है. अमरीका के साथ लड़ाई को स्वीकारने की आर्थिक क़ीमत तीन हज़ार करोड़ डॉलर से अधिक है. इसमें निवेश, निर्यात और आर्थिक विकास की कमी शामिल है.”

संयुक्त राष्ट्र में कई सालों तक पाकिस्तान के राजदूत रहे अकरम मानते हैं कि अमरीका और नेटो की ओर भविष्य में किसी भी कार्रवाई के परिणाम इस क्षेत्र के लिए विनाशकारी हो सकते हैं.

मुनीर अकरम ने लिखा है, “भविष्य में सीमा पर अमरीका-नेटो की कोई भी कार्रवाई एक युद्ध की स्थिति का रूप ले सकती है. और आख़िर में अगर अमरीका-नेटो ऐबटाबाद जैसा कोई ऑपरेशन करते हैं तो इसके परिणाम भी विनाशकारी हो सकते हैं क्योंकि पाकिस्तान को लग सकता है कि उसके परमाणु हथियारों के जख़ीरे को ख़तरा है.”

नया साल, पुराने ज़ख़्म

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Image caption मोहमंद एजेंसी में नेटो हमले में ऐसी ही चौकियों पर तैनात पाकिस्तान के 25 सैनिक मारे गए थे.

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान इन ख़तरनाक हालात में नए साल में प्रवेश कर रहे हैं. अमरीका और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में खटास आ गई है. नवंबर में अपने सैनिकों पर हुए नेटो हमले पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए पाकिस्तान ने दिसंबर के शुरू में अफ़गानिस्तान पर हुए ‘बॉन सम्मेलन’ का बहिष्कार किया था.

पाकिस्तान को बहलाने की हर कोशिश असफल रही और उसने बॉन सम्मेलन का बहिष्कार किया, शम्सी हवाई अड्डे को अमरीका से वापिस लिया और अब भी अफ़ग़ानिस्तान में नेटो सेना को पाकिस्तान के रास्ते आपूर्ति बहाल करने के अहम सवाल पर नहीं झुका है.

सितंबर में अपने पद से सेवानिवृत्त होने से पहले अमरीकी सैन्य कमांडर माइक मलेन ने खुलेआम काबुल में अमरीकी दूतावास पर हुए हमले का इल्ज़ाम पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई पर लगाया.

माइक मलेन ने अमरीकी सीनेट की आर्म्ड सर्विसज़ की समिति को बताया, “आईएसआई के सहयोग से जलालुद्दीन हक़्क़ानी के गुट ने हमारे दूतावास पर विस्फोटकों से लदे ट्रक से हमले करने की योजना बनाई और उसे अंजाम दिया.”

“हमारे पास इस बात के भी पुख़्ता सबूत हैं कि 28 जून को काबुल के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल पर हुए हमले में भी ये लोग शामिल थे. इसके अलावा कई अन्य छोटे लेकिन प्रभावी हमलों के पीछे भी इनका हाथ था.”

संक्षेप में, मलेन का तर्क था, ‘हक़्क़ानी नेटवर्क पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई वास्तविक अंग की तरह काम करता है.’

ये अमरीका की आंतक के विरुद्ध लड़ाई में प्रमुख सहयोगी के लिए बहुत ही तीखे शब्द थे.

प्रेक्षकों का मानना है कि ये अमरीका की एक देश के साथ लगातार बढ़ती निराशा को दिखाता है, जो इस्लामी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ सृजनात्मक और विघटनकारी भूमिकाएं सामांतर रूप से निभा रहा है.

अफ़गानिस्तान पर चिंताएं

साल 2014 में अमरीकी सेना के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के बाद अफ़ग़ान सरकार और उसकी सेना के तालिबान से लड़ पाने की योग्यता पर चिंताएं जताई जा रही हैं.

‘बॉन सम्मेलन’ के बहिष्कार से हुए नुक़सान की भरपाई अमरीका और उसके सहयोगियों के साथ और अधिक संपर्क से हो सकती है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के मसले पर दरकिनार किए जाने के बाद इस्लामाबाद हमेशा इसे संदेह की नज़र से देखेगा.

बीबीसी पर हाल ही में एक लेख में विश्लेषक अहमद राशिद ने लिखा है, “जब तक पाकिस्तानी सेना अफ़ग़ान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सहयोग नहीं करती और अमरीका-पाकिस्तान संबंध नहीं सुधरते सामंजस्य बिठाने की दिशा में गतिरोध बना रहेगा क्योंकि इस क्षेत्र में बाक़ी देशों की तुलना पाकिस्तान का प्रभाव कहीं अधिक है.”

सेना बनाम सरकार

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Image caption लगता है कि सेना और सरकार के बीच दूरियां बढ़ रही हैं.

अमरीका-पाकिस्तान के बीच संबंधों में तल्ख़ी के बीच, पाकिस्तान के भीतर सरकार और सेना के रिश्तों में तनाव ने इस सारे मसले पर एक और आयाम जोड़ दिया है.

अचानक प्रधानमंत्री युसूफ़ रज़ा गिलानी संसद के सर्वोपरि होने का ही बचाव नहीं कर रहे हैं लेकिन वो ये भी कह रहे हैं कि ओसामा बिन लादेन इतने लंबे समय तक कैसे ऐबटाबाद में छिपा रहा.

तेईस दिसंबर को पाकिस्तानी सेना के प्रमुख अशफ़ाक़ कियानी ने बयान जारी कर कहा कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सिर्फ़ मेरिट के आधार पर ही ग़ौर किया जाएगा.’

पाकिस्तानी सेना के जन संचार विभाग ने एक बयान जारी कियानी के हवाले से कहा, “उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि चाहे इसके अलावा कोई भी मुद्दा हो, लेकिन उसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं हो सकता.”

साल 2012 के आगमन पर पाकिस्तान पहले से ही अपनी क्षेत्रीय भूमिका पर हमले झेल रहा है. साथ ही लगता है कि उसे सेना और सिविल नेतृत्व के बीच संघर्ष से भी दो-चार होना पड़ सकता है.

बीते सालों की तरह, सारी निगाहें इस क्षेत्र पर जमी हुई हैं.