'न्यायिक आयोग के सामने पेश नहीं होंगी'

हुसैन हक़्क़ानी (फ़ाईल फ़ोटो) इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption कथित मेमो की बात सामने आने के बाद हुसैन हक़्क़ानी को इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक़्क़ानी की वकील आसमा जहांगीर ने अमरीकी अधिकारियों को कथित तौर पर भेजे गए गुप्त संदेश की जांच करने वाले न्यायिक आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कथित मेमो की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग के गठन का आदेश दिया था, जिसमें तीन वरिष्ठ न्यायधीश शामिल हैं.

आसमा जहांगीर ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने अपने फ़ैसले के बारे में अपने मुवक्किल हुसैन हक़्क़ानी को बता दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाए गए चार सदस्यीय न्यायिक आयोग के सामने पेश नहीं होंगी.

उन्होंने कहा कि कथित मेमो की जांच के सिलसिले में आयोग के सामने पेश होने का कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि आयोग में जो न्यायधीश हैं, उनपर इस्टैब्लिशमेंट यानि सेना का काफ़ी असर है.

आसमा ने कहा कि अगर क़ानून के मुताबिक़ काम हो तो एक वकील को तैयारी करने और बहस करने में मज़ा आता है लेकिन अगर फ़ैसले मर्ज़ी के मुताबिक़ होने हैं तो किसी को भी वकील किया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि उन्होंने हुसैन हक़्क़ानी को सलाह दी है कि वह अपने लिए नए वकील की सेवाएं लें और आयोग के सामने ख़ुद भी पेश हों.

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 30 दिसंबर को अमरीकी अधिकारियों को कथित तौर पर लिखे गए गुप्त संदेश की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग के गठन का आदेश दिया था.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने शुक्रवार को यह फ़ैसला सुनाया था.

अदालत ने फ़ैसले में इस न्यायिक आयोग को चार हफ़्तों के भीतर अपनी जांच पूरी करने का आदेश दिया था और प्रांतीय महासचिवों को भी आदेश दिया था कि वह न्यायिक आयोग की मदद करें.

'सरकार गंभीर नहीं'

ग़ौरतलब है कि विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग नवाज़ के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ सहित नौ लोगों ने कथित गुप्त संदेश की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक याचिकाएं दायर की थीं.

नवाज़ शरीफ़ ने अदालत में दिए गए बयान में कहा था कि सरकार इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है और न ही उसने किसी जांच के आदेश दिए हैं.

उसके बाद अदालत ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेनाध्यक्ष, आईएसआई के प्रमुख सहित अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक़्क़ानी और अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.

सेनाध्यक्ष जनरल अशफ़ाक़ परवेज़ कियानी ने जवाब में कहा था कि मेमो एक हक़ीक़त है और इससे सेना का मनोबल कम करने की कोशिश की गई है.

मेमोगेट विवाद उस 'मेमो' या चिट्ठी से शुरु हुआ था जिसमें अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक़्क़ानी ने अमरीकी सैन्य अधिकारियों को कथित रूप से गुप्त ज्ञापन भेजा था. इसमें अमरीका से पाकिस्तानी सेना की ताक़त को कम करने के लिए कहा गया था.

यह मामला सामने आने के बाद प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने अमरीका में अपने राजदूत हुसैन हक़्क़ानी को इस्लामाबाद बुलाया था, उसके बाद हक़्क़ानी ने पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया था.

पाकिस्तान के नेता कथित तौर पर इस बात से चिंतित थे कि ऐबटाबाद में अमरीकी सुरक्षा बलों के ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद सेना तख़्तापलट करने वाली है.

मेमोगेट के बाद से ही सेना और सरकार के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है.

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