क्या पाक अर्थव्यवस्था बिखर रही है?

गिलानी
Image caption पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसुफ़ रज़ा गिलानी ने दुनिया भर के देशों को पाकिस्तान के साथ व्यापार करने का न्यौता दिया है

डावोस में चल रहे वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम में पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसुफ़ रज़ा गिलानी ने दुनिया भर से आए कारोबारी नेताओं को भरोसा दिलाया है कि पाकिस्तान की सरकार ना सिर्फ स्थिर है बल्कि व्यापार के लिए पूरी तरह से तैयार है.

गिलानी ने व्यावसायिक घरानों और उनके मालिकों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि पाकिस्तान से आ रही चिंताजनक ख़बरों के बावजूद पाकिस्तान विदेशी निवेश के लिए अच्छा बाज़ार है.

हालांकि पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा चिंताओं के बीच देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के कारण गिलानी के लिए ऐसा कहना आसान नहीं था.

इन हालातों के कारण कहीं ना कहीं निवेशकों ने विश्वास खोया है.

यहां तक कि बढ़ते आर्थिक जोख़िम के कारण इस बात का भी डर है कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा ना जाए.

आधारभूत असंतुलन

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार पिछले साल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सिर्फ 2.4 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है जो भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से काफ़ी पीछे है.

पाकिस्तान के बड़ा राजस्व घाटा है और इस घाटे की वजह वहां के बुनियादी ढांचे में व्याप्त असंतुलन है. वहां के 18 करोड़ लोगों की आबादी का मात्र एक प्रतिशत टैक्स जमा करता है और अरबों के सरकारी धन का कोई हिसाब-किताब नहीं होता.

पाकिस्तान के एक प्रमुख अर्थशास्त्री एस अक़बर ज़ैदी के अनुसार, ''पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था संघर्ष ज़रूर कर रही है लेकिन वो बिख़रने के कगार पर नहीं है.''

पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस और पाकिस्तान रेलवे जैसी वहां की सरकारी कंपनियां बदइंतज़ामी और अक्षमता की शिकार हैं. देश का औद्योगिक उत्पाद और निर्यात भी बुरी तरह से प्रभावित है.

देश में निजी क्षेत्र न के बराबर होने से बेरोज़गारी की समस्या भी चरम पर है. ख़ासकर यहां के ग़रीब परिवारों की हालत पिछले चार सालों में और भी ख़राब हो गई है.

विरोधाभास और गड़बड़ी

वैसे गिलानी के विरोधी उनके इस बयान को उनका अतिआत्मविश्वास में होना और सच्चाई से मुंह फेरना बता रहे हैं.

पाकिस्तान के वित्त-मंत्रालय में पूर्व सलाहकार रहे डॉ.अशफाक़ ख़ान कहते हैं, ''पिछले चार सालों में पाकिस्तान के स्टेट बैंक में चार गवर्नर, चार वित्तमंत्री, चार वित्त-सचिव और केंद्रीय राजस्व विभाग के पांच प्रमुखों को बदला गया है.''

गिलानी जब वर्ष 2008 में सत्ता में आए थे तब पूरी दुनिया में आर्थिक उठापटक मची हुई थी.

लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों का मानना है कि एक मुश्किल समय को झेलने के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अब वापस पटरी पर लौट रही है, जारी वित्तवर्ष में पहले छह महीने के आंकड़े पहले के मुक़ाबले ठीक हैं.

मुश्किल शुरुआत

अर्थशास्त्री अकबर ज़ैदी किसी भी तरह के आर्थिक पतन की आशंका को दरकिनार करते हुए कहते हैं कि उनके हिसाब से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था यहां के मौजूदा हालात में आश्चर्यजनक तौर पर काफ़ी मज़बूती से टिकी हुई है और कुछ सुधार के साथ ही इसमें और सुधार लाया जा सकता है.

अगर देख़ा जाए तो गिलानी ने बड़े ही मुश्किल समय में सत्ता संभाली थी, उस साल पाकिस्तान को पूरी दुनिया में तेल की क़ीमतों में आई उछाल और आर्थिक उत्पाद के कारण कई झटके झेलने पड़े थे.

संकट के इस समय के दौरान पाकिस्तान ने अपनी विदेशी मुद्रा भंडार को मज़बूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद भी मांगी थी.

तब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान की आर्थिक मदद की थी, जिसके बाद सरकार ने कई तरह के सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत भी की थी लेकिन लोगों के विरोध के बाद पीछे हट गए.

वर्ष 2010 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान को दी जाने वाली अंतिम दो किस्त स्थगित कर दी गई थी.

फिर भी ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान की आर्थिक तकलीफ़ें अगर कम नहीं होती हैं तो वो एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष से बेलआउट पैकेज की मांग कर सकता है लेकिन पहले से भी ज़्यादा कड़ी शर्तों पर.

चुनावी माहौल

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Image caption वर्ष 2008 से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में काफ़ी उठापठक हुई है

पाकिस्तान के आर्थिक संचालकों का मानना है कि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में वापसी एक तरफ जहां उसकी आर्थिक पतन से तय की जाएगी वहीं वहां हो रहे राजनैतिक बदलावों को भी ध्यान में रखा जाएगा.

पाकिस्तान में चुनाव अगले साल तक होने के आसार हैं लेकिन देश में अभी से ही चुनावी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं.

अगर गिलानी अपनी सरकार बचाने में कामयाब होते हैं तो इस साल जून में वो अपना आख़िरी बजट लाएंगे और माना जा रहा है कि वो एक लोकलुभावन बजट होगा ताकि उनकी पार्टी दोबारा सत्ता में लौट सके.

ऐसा माना जा रहा है कि महत्वपूर्ण फ़ैसले लेने में गिलानी सरकार के लापरवाह रवैये को लेकर जो धारणा बनी है वो उनके कार्यकाल के अंत तक चलेगी, ऐसे में देश की आर्थिक कठिनाइयों से निपटने का काम अगली सरकार ही करेगी.

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