गिलानी पर चलेगा अवमानना का मुकदमा

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Image caption गिलानी को अदालत ने 13 फ़रवरी को पेश होने के लिए कहा है.

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना करने के आरोप में प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी पर अभियोग शुरू करने का फ़ैसला लिया है. अदालत ने प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को 13 फ़रवरी को पेश होने का आदेश भी दिया है.

सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय खंडपीठ ने गुरुवार को प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के ख़िलाफ़ चल रहे अदालत की अवमानना के मामले में संक्षिप्त फ़ैसला सुनाया.

प्रधानमंत्री के वकील ऐतिज़ाज़ एहसन ने अदालत के बाहर पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि अदालत ने प्रधानमंत्री को 13 फ़रवरी को पेश होने का आदेश दिया है और उसी पर उनके अभियोग लागू कर दिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि वे अपने मुव्विकल को सलाह देंगे कि वह अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करें.

गिलानी के वकील ने कहा कि वे चाहते हैं कि सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति ख़त्म हो और दोनों संस्थान लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए मिलकर काम करें.

राष्ट्रपति पर मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता

ग़ौरतलब है कि सप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी को कई नेताओं को मिली आम माफ़ी के मामले में प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को अदालत की अवमानना का नोटिस जारी किया था.

प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे और अदालत को बताया था कि पाकिस्तान के संविधान के तहत राष्ट्रपति ज़रदारी पर कोई मामला नहीं चलाया जा सकता है.

गिलानी पर आरोप है कि उन्होंने ज़रदारी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए स्विस अधिकारियों से आग्रह न करके अदालत की अवमानना की है.

प्रधानमंत्री गिलानी ने स्विटरज़रलैंड से राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के एक मामले की दोबारा जांच शुरू करने का आवेदन नहीं किया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गिलानी के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी.

पाकिस्तान में गिलानी सरकार एक तरफ़ न्यायापालिका और दूसरी तरफ़ ताक़तवर सेना से उलझी हुई है.

वे हमेशा से ही स्विटज़रलैंड को ज़रदारी के विरुद्ध जांच का आवेदन करने से मना करते रहे हैं. उनका तर्क है कि जब तक राष्ट्रपति अपने पद हैं उन पर अभियोग नहीं चलाया जा सकता.

हेराफेरी का मामला

राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और उनकी दिवंगत पत्नी व पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को साल 2003 में स्विटज़रलैंड की एक अदालत ने करोड़ो डॉलर की हेराफेरी का दोषी पाया था.

ये मामला उस समय का था जब बेनज़ीर भुट्टो सत्ता में थीं.

बाद में इन दोनों ने स्विटज़रलैंड में इस निर्णय के विरुद्ध अपील की थी. उसके बाद साल 2008 में पाकिस्तानी सरकार के निवेदन पर स्विटज़रलैंड ने ये जांच बंद कर दी थी.

साल 2008 में बेनज़ीर भुट्टो के ख़िलाफ़ हज़ारों ऐसे मामले बंद कर दिए गए थे, जिसकी वजह से वे चुनावों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान आ पाई थीं. इसके कुछ समय बाद ही उनकी हत्या हो गई थी.

लेकिन साल 2009 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को बंद करने के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था.

दरअसल पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशरर्फ़ ने अपने कार्यकाल में कई नेताओं और अधिकारियों को आम माफ़ी दी थी यानी इन लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था. 90 के दशक के दौरान इन लोगों पर कई तरह के आरोप लगे थे.

नैशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के नाम से प्रचलित इस क़ानून का लाभ उठाने वालों में राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी, गृह मंत्री रहमान मलिक, कई अन्य मंत्री, वरिष्ठ नेता और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं.

राष्ट्रपति बनने से पहले ज़रदारी कई सालों तक जेल में थे और उन पर भ्रष्ट्राचार के कई आरोप लगे थे.

लेकिन पाकिस्तान की अदालत ने इस विवादास्पद अध्यादेश को दिसंबर 2009 में अवैध क़रार दिया था. पर साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बचाव का रास्ता भी सुझाया था और कहा था कि सरकार को संसद में विश्वास मत हासिल करना होगा.

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