सरकार और न्यायपालिका में संघर्ष के मायने

  • 13 फरवरी 2012
इफ़्तिख़ार चौधरी और गिलानी इमेज कॉपीरइट agency
Image caption गिलानी को अगली सुनवाई के दौरान हाजिर होने से छूट दी गई है

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के विरुद्ध अदालत की अवमानना के मामले में आरोप तय कर दिए हैं क्योंकि उन्होंने राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में स्विटज़रलैंड के अधिकारियों को नहीं लिखा.

प्रधानमंत्री ने इस मामले में ख़ुद को निर्दोष करार दिया है. अदालत को इस मामले में किसी नतीजे तक पहुँचने में कुछ हफ़्तों का समय लग सकता है मगर देश के दो वरिष्ठ पद पर बैठे लोगों के बीच ये खींचतान अब अंतिम दौर में है.

पहले दिन से ही गिलानी सरकार और वरिष्ठ न्यायाधीशों के बीच बहुत सहज संबंध नहीं रह पाए हैं.

इस पूरे अविश्वास की जड़ में है मौजूदा मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी को चार साल पहले पद पर बहाल करने में राष्ट्रपति ज़रदारी की आनाकानी.

जस्टिस चौधरी को पूर्व सैनिक शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने बर्ख़ास्त कर दिया था और उसके बाद देश भर में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के चलते ही मुशर्रफ़ का नौ साल का शासन समाप्त हुआ था.

राष्ट्रपति ज़रदारी ने जस्टिस चौधरी को बहाल तो कर दिया था मगर ये भी जता दिया था कि वह उनके पहले विकल्प नहीं थे. उस समय से ही देश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को शर्मिंदा करने में कोई कोर क़सर नहीं छोड़ी है.

'ज़ोर-शोर से सुनवाई'

जैसे ही गिलानी सरकार ने कुछ वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियाँ कीं सु्प्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया और उसके बाद सरकार की ग़लतियों वाले फ़ैसलों से जुड़े मामलों में ज़ोर-शोर से सुनवाई भी की.

विवादास्पद मेमोगेट का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है.

मगर ये मौजूदा खींचतान पूरे संघर्ष का रूप नहीं ले सकी क्योंकि अंतिम क्षण में दोनों में से एक न एक पक्ष पैर पीछे खींच लेता था.

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Image caption इसे नागरिक सरकार और सेना के बीच संघर्ष के एक और उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है

मगर इस बार लग रहा है कि मामला किसी अंजाम तक जाएगा. पर इस साल के अंत में आम चुनाव होने हैं और ऐसे में ये तय करना मुश्किल है कि अंजाम कैसा होगा.

पाकिस्तान में मुश्किलों का सामना करते रहे लोकतंत्र ने ऐतिहासिक रूप से देश की संस्थाओं के बीच संघर्ष देखा है और आम तौर पर देश की शक्तिशाली सेना उसे बढ़ावा देती रही है क्योंकि मज़बूत नागरिक सरकार उसे अपने हित में नहीं लगती.

पाकिस्तान की विदेश और घरेलू नीतियों पर पाकिस्तान की सेना का काफ़ी प्रभाव रहा है और नागरिक सरकारों को वह सत्ता देने में उसे हिचक रही है. देश का सुप्रीम कोर्ट अक़सर इस तरह के तख़्ता पलट को सही ठहराता रहा है इसलिए कोर्ट अधिकतर सेना के सहयोगी की तरह देखी जाती है.

'अंत क्या?'

पाकिस्तान के कई विश्लेषक मानते हैं कि न्यायपालिका और सरकार के बीच संघर्ष का मौजूदा प्रकरण एक तरह से नागरिक और सैनिक शासन के बीच सत्ता संघर्ष का ही नतीजा है जो कि न्यायपालिका के ज़रिए सामने आ रहा है. मगर इसका अंत क्या होगा ये कहना मुश्किल है.

पाकिस्तान की सरकार की प्राथमिकता इस समय ये लग रही है कि वह मार्च में प्रस्तावित सीनेट के चुनाव तक सत्ता में बनी रहे. अगर वह तब तक सत्ता में रह गई तो पिछले 30 वर्षों में उसे पहली बार ऊपरी सदन में भी बहुमत मिल जाएगा. इस बात की आशंका काफ़ी कम ही है कि वह ऐसा नहीं कर पाएगी.

इसे देखते हुए लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ राष्ट्रपति ज़रदारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले फिर से शुरू करना चाहती है. कुछ वकीलों का कहना है कि अगर ये मामले अप्रैल तक नहीं शुरू हुए तो समय बीत जाने की वजह से 'लॉ ऑफ़ लिमिटेशन' लागू हो जाएगा यानी उन्हें फिर से शुरू करना मुश्किल होगा.

अगर ये सच है तो सरकार इस मामले को तब तक लटकाना चाहेगी जब तक 'लॉ ऑफ़ लिमिटेशन' लागू न हो जाए और समय उसके पक्ष में लग रहा है.

अब अगर गिलानी दोषी भी पाए जाते हैं तो उन्हें हटाने के दौरान सरकार को उतना समय मिल जाएगा जितने की उन्हें ज़रूरत है.

इसी वजह से ये कहना अभी मुश्किल है कि कोर्ट इस मामले को किस नतीजे तक पहुँचाना चाह रही है. देश में वैसे भी आम चुनाव होने हैं इसलिए ये संघर्ष अब बिना किसी उद्देश्य के नज़र आता है.

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