पाकिस्तान में साहित्य की दिशा और दशा

  • 17 फरवरी 2012
कराची साहित्य महोत्सव
Image caption कराची साहित्य महोत्सव में अंग्रेज़ी, उर्दू, सिंधी, पंजाबी, पश्तो और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यकारों से हिस्सा लिया.

“चरमपंथ और उसे जुड़े मुद्दों पर लिखने के कारण पाकिस्तान के अंग्रेज़ी साहित्य ने पिछले दस सालों में काफ़ी विकास किया है.”

यह शब्द पाकिस्तान के युवा लेखक और साहित्यकार रज़ा रुमी के हैं, जिन्होंने पिछले हफ़्ते कराची साहित्य महोत्सव में बीबीसी हिंदी से विशेष बातचीत की थी.

कराची साहित्य महोत्सव 11 और 12 फ़रवरी को हुआ, जिसमें 140 के करीब साहित्यकारों, लेखकों और कवियों ने भाग लिया और जिनमें कुछ विदेशी साहित्यकार भी शामिल थे.

पाकिस्तान के अंग्रेज़ी साहित्य पर बात करते हुए रज़ा रुमी ने कहा कि पिछले दस सालों के दौरान अंग्रेज़ी भाषा में बहुत कुछ लिखा गया और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफ़ी प्रसिद्ध हुआ है.

'चरमपंथ है हावी'

उन्होंने कहा, “जो कुछ अंग्रेज़ी में लिखा जाता है और अगर आप विचार करेंगे तो पता चलेगा कि जो कुछ लिखा जा रहा है वह विदेशी पाठकों को ख़ुश करने के लिए लिखा जा रहा है जैसा कि चरमपंथ के बारे में.”

उनके मुताबिक़ विदेशी लोग केवल पाकिस्तान से आतंकवाद, चरमपंथ और मौलवियों के इस्लाम के बारे में जानना चाहते हैं और अंग्रेज़ी साहित्य भी इसके चक्र में घूमता है.

उन्होंने बताया कि सबसे विडंबना यह है कि अंग्रेज़ी साहित्य के मार्किट पाकिस्तान से बाहर है क्योंकि पाकिस्तान में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ने वाले न होने के बराबर हैं यानी अंग्रेज़ी साहित्य के पाठक दो प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे.

रज़ा रुमी का कहना है कि पाकिस्तान का राष्ट्रीय साहित्य जो उर्दू में लिखा जा रहा है और क्षेत्रीय भाषाओं सिंधी, पंजाबी, पश्तो और बलोची में लिखा गया साहित्य भी काफ़ी प्रसिद्ध है लेकिन स्थानीय मीडिया उस पर खास ध्यान नहीं देता है.

उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में पुस्तक पढ़ने की रुचि बिल्कुल ही ख़त्म होती जा रही है और ताज़ा सर्वेक्षण से पता चलता है कि देश में केवल पाँच से छह प्रतिशत लोग पुस्तक पढ़ते हैं और उसमें बहुत से ऐसे हैं जो कई दिनों तक केवल एक ही पुस्तक पढ़ पाते हैं.

'पुस्तकों से दूर'

उनके मुताबिक़ एक तो पाकिस्तान में शिक्षा का बुरा हाल है और दूसरे इंटरनेट की वजह से भी काफ़ी लोग पुस्तकों से दूर हो गए हैं.

लेकिन पंजाबी और उर्दू के युवा कवि अली अकबर नातिक इससे सहमत नहीं हैं और वह मानते हैं कि पुस्तक पढ़ने वालों की संख्या हमेशा एक जैसी रहती है और जिसको पुस्तक पढ़ने का शौक है उनको इंटरनेट बिल्कुल मज़ा नहीं देता है.

पंजाबी साहित्य पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पंजाबी साहित्य भी फलफूल रहा है और उसमें तेज़ी से विकास हो रहा है, साथ ही उसके पढ़ने वालों की संख्या में कोई खास कमी नहीं हो रही है.

सिंधी भाषा की जानी-मानी लेखक अमर सिंधु कहती हैं कि पाकिस्तान में दूसरी भाषाओं की तुलना में सिंधी साहित्य को पढ़ने वाले अभी भी बहुत ज्यादा हैं और आज भी सिंध में युवा साहित्यकार बहतर लिख रहे हैं.

उन्होंने कहा, “सिंधी साहित्य का संबंध प्रांत के सामाजिक आंदोलनों से रहा है और जिनते सामाजिक आंदोलन सिंध में हुए हैं, उससे काफ़ी अच्छे साहित्य ने जन्म लिया है.”

अमर सिंधु का कहना है कि सिंध में बहतर साहित्य प्रकाशित होने से हैदराबाद से ले कर लाड़काना तक पाठकों की संख्या में कोई कमी नहीं है बल्कि प्रतिदिन बढ़ती जा रही है लेकिन पाकिस्तान में दूसरी भाषाओं में ऐसा नहीं हैं.

'संस्कृति का पुनर्जीवन'

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में आज भी उर्दू के बाद सबसे अधिक समाचार पत्र सिंधी भाषा में प्रकाशित होते हैं और उसके पढ़ने वाले हैं इस लिए तो संख्या अधिक है.

कराची साहित्य महोत्सव के आयोजन पर बात करते हुए अमर सिंधु ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से संस्कृति का पुनर्जीवन हो रहा है.

उन्होंने कहा, “जब टेलीवीजन आया तो लोगों ने कहा कि अब रेडियो का दौर समाप्त हो गया है लेकिन आज हम देख रहे हैं कि एफएम रेडियो चल रहा है और रेडियो उसी शानो-शौकत से चल रहा है जो पहले था.”

रज़ा रुमी भी मानते हैं कि इस तरह के कार्यक्रमों ने क्रांति नहीं आएगी लेकिन यह एक अच्छा मंच है जहाँ विभिन्न भाषाओं के साहित्यकार, कवि और लेखक मिलते हैं और बात करते हैं.

ग़ौरतलब है कि कराची साहित्य महोत्सव 2010 में शुरु हुआ था और अब वह हर साल आयोजित किया जाता है.

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