पाक फिल्म उद्योग की तबाही के कारण?

  • 22 फरवरी 2012
पाकिस्तानी फिल्म उद्योग
Image caption लाहौर के शाहनूर स्टूडियो को कस्टम विभाग गाड़ियों के गोदाम के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है.

साल में 140 से अधिक फ़िल्में बनाने वाला पाकिस्तान का फिल्म उद्योग बिल्कुल तबाह हो चुका है और समाज में बढ़ता चरमपंथ इसका बड़ा कारण है.

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग ने जन्म लिया और लाहौर में स्थित शाहनूर स्टूडियो बड़ा केंद्र बना और यह उद्योग हॉलीवुड और बॉलीवुड की तरह लॉलीवुड से मशहूर हुआ.

कई सालों तक सफलता के झंडे गाड़ने का बाद 80 के दशक में पाकिस्तानी फिल्म उद्योग की तबाही शुरु हुई. सिनेमाघर को किसी न किसी प्रकार से जीवित रहे लेकिन फिल्म के असली घर यानी स्टूडियो अपनी मौत आप मरने लगे.

लाहौर के शाहनूर स्टूडियो के मालिक शौकत हुसैन रिज़वी के बेटे शाहजहाँ रिज़वी का बचपन और जवानी स्टूडियो में ही बीत गई. उन्होंने अपने स्टूडियो के शानदार अतीत को अपनी आँखों से देखा.

अब शाहनूर स्टूडियो तबाह हो चुका है और उसका बड़ा हिस्सा गोदाम में बदल चुका है. वह गोदाम में कैसा बदला शाहजहाँ रिज़वी बताते हैं, “जीवित रहने का मसला था, एक दौर था जब स्टूडियो में आठ फिल्मों की एक साथ शूटिंग हुआ करती थी और उसी दौर में 140 तक फ़िल्में बनी हैं.”

जनरल ज़िला-उल-हक़

उन्होंने कहा कि जब पूर्व सैन्य शासक जनरल जिया-उल-हक ने सत्ता पर कब्जा किया और उन्होंने इस्लामी नियम लागू कर दिए तो फिर फिल्म उद्योग तबाही तरफ जाने लगा और उस समय गोदाम बनाने के सिवा उनके पास कोई ओर विकल्प नहीं था.

जनरल जिला-उल-हक के कार्यकाल से पहले शाहनूर स्टूडियो लाहौर शहर के केंद्र में बने इलाके पर फैला हुआ था लेकिन अब सिंकुड़ कर बहुत कम रह गया है.

फ़िल्मों का काम बंद होने की वजह से अब उस ज़मीन पर एक रिहायशी कॉलोनी बन चुकी है जबकि कस्टम विभाग वालों ने भी कुछ जमीन किराए पर ले कर चोरी की गाड़ियों के लिए गोदाम बना दिया है.

हालात की तंगी ने एक शानदार स्टूडियो से उसकी सुंदरता ही छीन ली है. जहाँ रिज़वी कहते है कि पहले लाहौर में आठ स्टूडियो थे और अब केवल तीन रह गए हैं और वह भी आधे रह गए हैं.

वे कहते हैं कि पाकिस्तान में फिल्में बनाने का काम बिल्कुल ख़त्म हो गया है इस लिए अब फिल्म स्टूडियो का ज़रुरत ही नहीं है.

शाहजहाँ ने कहा, “एक तो जो फ़िल्म उद्योग का प्रतिनिधित्व करते हैं वह दिशाहीन है और दूसरी बात यह कि सरकार भी उस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है.”

कलाकारों को है दुख

केवल शाहनूर ही नहीं बल्कि देश के बड़े बड़े स्टूडियो फ़िल्में न बनने की वजह से उजड़ गए है लेकिन वह कलाकार जिन्हों ने पाकिस्तानी फिल्म उद्योग को किसी दौर में बुलंदियों तक पहुँचाया, वह इस तबाही को दिल से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं.

कुछ अभिनेता और कलाकार फिल्म स्टूडियो की तबाही के दुख को महफिल में बदलने के लिए मिल कर बैठते हैं और यह महफिल एवरन्यू स्टूडियो में सजती है. उस महफिल में बाँटे जाते हैं वह दुख जो शायद बाहर की दुनिया तो नज़र नहीं आते हैं.

पाकिस्तान के वरिष्ठ फिल्म अभिनेता गुलाम मुहिउद्दीन कहते हैं, “इतना ज़्यादा दुख होता है शायद आप इसको मानेंगे नहीं. मैं सोचता हूँ बहुत कोशिश करता हूँ कि ऐसा कौन सा रास्ता है कि इसको ठीक किया जा सकता है लेकिन कोशिश के बावजूद भी कुछ नहीं हो पाता है.”

लाहौर के ऐवरन्यू स्टूडियो में एक ऐसा किरदार है जो अपने अतीत नें गुम रहता है और भविष्य से उम्मीदें बाँधे हुए हैं जिन्हों सैंकड़ों फिल्मों के लिए काम किया.

वरिष्ठ कैमरामेन अली जान कहते हैं कि लोगों ने बहुत अच्छा वक़्त देखा हुआ था और अच्छे पैसे कमा लेते थे लेकिन आज वही लोग काफी तंगी में हैं और यह देख कर काफी दुख होता है.

Image caption फिल्मों का काम बंद होने की वजह से कुछ कलाकारों ने अपनी कला को जीवित रखने के लिए थियटर की राह ली.

'घर टूट गए'

फिल्म उद्योग की तबाही के बाद कुछ कलाकारों ने थियटर की राह ली और अपनी कला को किसी न किसी तरह जीवित रखा लेकिन फिल्म स्टूडियो की तबाही देख कर उन कलाकारों का दिल भी रोता है. पाकिस्तान की वरिष्ठ फिल्म अभिनेत्री नरगिस कहती हैं, “मुझे बहुत दुख होता है और जब आपका घर टूटता है तो ज़ाहिर सी बात है कि काफी दुख होता है, हमारा वह घर है और हमें बड़ा दुख होता है जब हम देखते हैं लेकिन हम भी क्या कर सकते हैं.”

फिल्म उद्योग के अधिकतर लोगों का कहना है कि फिल्म स्टूडियो में आधुनिक तकनीक के न होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बनाना संभव नहीं रहा जबकि फिल्म स्टूडियो के मालिकों का विचार इसे अलग है.

शाहजहाँ रिज़वी कहते हैं, “आधुनिक तकनीक नहीं है इसको हम मानते हैं लेकिन फिल्म निर्देशक क्या यह स्क्रिप्ट अच्छा नहीं लिख सकते, क्या ये गाने बोल अच्छे नहीं लिखा सकते और क्या यह फिल्म का नाम अच्छा नहीं दे सकते. जो चीज़े इन के कंट्रोल में हैं, उसको तो ठीक कर लें.”

फिल्म स्टूडियो के मालिकों के मुताबिक अगर सरकार चाहे तो आज भी वीरान स्टूडियो की रौनकें बहाल हो सकती हैं लेकिन ऐसा करने के लिए सरकार को दूसरे देशों से सहयोग लेना होगा.

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