जब ओसामा बिन लादेन आपके पड़ोसी हों

ओसामा प्रांगण इमेज कॉपीरइट Getty

पाकिस्तानी प्रशासन उस प्रांगण को ढहा रहा है जहां पिछले साल ओसामा बिन लादेन मारा गया था. बिन-लादेन की ऐबटाबाद में रिहाईश की बात सामने आने के बाद पड़ोस के इलाक़े में रहने वालों की ज़िंदगी पर इसका बड़ा असर पड़ा.

घंटो सुरक्षाबलों को चकमा देने की कोशिश में, जिस दौरान हमने अलग-अलग रास्ते लिए, आख़िरकार हम ओसामा बिन लादेन के रिहाईशी मकान तक पहुंचने में कामयाब हो गए. वहां जो कुछ हो रहा था वो अब हमारे सामने था.

हम लगभग आधे ढहा दी गई दीवार के पीछे खड़े थे, जहां से हम उन तीनों बुलडोज़रों को देख सकते थे जो लगातार अपने लोहे के पंजों से ओसामा के घर की ढह गई दीवारों को जैसे नोंच रहे थे.

हम उस कमरे को भी देख पाए जिसके बारे में कहा जाता है कि उसमें ओसामा रहता था. हालांकि कमरे और घर के दूसरे भीतरी हिस्सों से सामान पहले ही हटा दिया गया होगा.

ग़ुस्सा

लेकिन हमने जैसे ही प्रसारण के इरादे से सैटेलाइट डिश को नीचे रखा, एक बच्चा दौड़ता हुआ हमारे पास आया और कहा कि वो कह रहे हैं कि आप यहां से जाएं.

"वह पुलिस वाले कह रहे हैं कि आपको यहां से जाना होगा."

कुछ ही देर में पुलिस अघिकारी भी वहां आ धमके, ग़ुस्से से भरे हुए.

मैने दोनों हाथों को जोड़ दिया, कुछ इस अंदाज़ में जैसे प्रार्थना कर रहा हूं कि हमें कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दें.

रिपोर्ट फ़ाइल करते वक़्त मुझे उनके बुदबुदाते रहने की आवाज़े सुनाई देती रहीं लेकिन उन्होंने हमारे काम में किसी तरह की बाधा नहीं पहुंचाई.

लेकिन उसके बाद ही वो ज़ोर ज़ोर से उसकी शिकायत करने लगे जो कुछ टीवी चैनलों पर इस बारे में प्रसारित हुआ था.

इंकार

उन्होंने पास खड़े एक बच्चे से चिल्ला कर पूछा, "तुमने ओसामा को देखा है?" बच्चे ने सर नहीं में हिलाकर जवाब दिया.

उन्होंने दूसरे बच्चे से चिल्लाकर वही सवाल पूछा, वहां से भी इंकार मिला.

उन्होंने कहा, "तो फिर ये लोग क्या बकवास कर रहे हैं?"

जब मैं वहां से वापस आने लगे तो मैंने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए पूछा कि जब अल-क़ायदा ये कह रहा है कि वो मारे गए हैं तो आप इसपर किस तरह शुबहा कर सकते हैं?

उन्होंने मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा, "आप और आपके बिन लादेन" और वहां से चले गए.

इसके बाद हम उन्हीं खेतों से गुज़रते हुए वापस हुए जिनसे मई में हमारा गुज़र हुआ था.

तब बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे ये पिकनिक की कोई जगह है. लोग वहां परिवार के साथ मौजूद थे. आइसक्रीम वाले ख़ासी तादाद में मौजूद थे.

रोक

लेकिन कुछ दिनों के बाद जब ये समझ में आया कि अमरीका ने क्या किया है और किस तरह पाकिस्तान की जग हंसाई हुई है इस जगह में लोगों के जाने पर रोक लग गई.

Image caption नियाज़ उन कुछ लोगों में से हैं जो ओसामा के जीवित रहते उनके प्रांगण में जा पाए थे.

अब हमारा रूख़ उस श़ख्श के घर की तरफ़ था जिनसे हमारी मुलाक़ात पहले दौरे के बीच हुई थी.

बीस से पच्चीस साल के दरमियान के मुहम्मद नियाज़ बिन लादेन के पडो़सियों में से एक हैं.

ऐबटाबाद के इस इलाक़े को बिलाल टाऊन के नाम से जाना जाता है.

पलम्बर का काम करने वाले नियाज़ उन कुछ लोगों में से एक हैं जो बिन लादेन के जीवित रहते भी उस घर में जा पाए थे.

उन्हें तीन बार प्रांगण के भीतर पानी की पाइप बदलने का काम मिला हालांकि उन्हें उस दौरान ओसामा कभी नहीं दिखे.

नियाज़ ने कहा, "ये सब कुछ हमारे लिए तबाही की तरह आया है और इसने पूरे इलाक़े में बदलाव ला दिया है."

ज़मीन

उनका कहना था कि बहुत सारे लोग इलाक़ा छोड़कर शहर में दूसरी जगहों पर जा बसे हैं.

"जब से वो हमला हुआ था हर तरफ़ पुलिसकर्मियों की भरमार है. मेरे बच्चे अभी भी पुलिस वालों को और उनकी बंदूक़ों को देखकर डर जाते हैं."

वो कहते हैं कि इस इलाक़े में जो एक समय तेजी से विकसित हो रहा था, ज़मीन की क़ीमते गिर गई है.

मेरी बीवी चाहती थी कि इस प्रांगण को जल्द से जल्द ढहाया जाए. वो उसे याद दिलाता था कि यहां क्या हुआ था.

पाकिस्तान भी शायद ऐसा ही चाहता है.

इसिलए उन्होंने हफ़्ते के आख़िर में रात के वक़्त यहां बुलडोज़र भेजे और मीडिया को यहां से दूर रखा गया.

सिर्फ़ बिलाल टाऊन के लोग ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को इस बात का एहसास है कि बिन लादेन की यहां मौत के बाद क्या हुआ.

क्या किसी अधिकारी को पता था कि बिन लादेन यहां रहे हैं?

आरोप

पाकिस्तान के ऊपर नाकारा होने का आरोप लगा. कुछ ने इससे आगे बढ़कर उसपर अल-क़ायदा से साठ गांठ का इल्ज़ाम लगाया.

विदेशी राजनयिकों ने खुले तौर पर आरोप लगाना शुरू कर दिया कि पाकिस्तान अफग़ानिस्तान में चरमपंथियों की सहायता कर रहा है. इस बात का ख़तरा था कि पाकिस्तान को पश्चिमी देशों से मिलने वाली सहायता पर रोक लग जाएगी जिसकी देश को बहुत आवश्यक्ता है.

बिलाल टाऊन के शहरियों की तरह पाकिस्तानी भी याद करते हैं किस तरह 'अमरीका के युद्ध' की शुरूआत के पहले उनपर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था.

लेकिन थोड़ा दबाव डालने पर ऐबटाबाद वासी स्वीकार करते हैं कि सैनिक छावनी वाले शहर और सेना और चरमपंथियों को संबंधों पर बहुत कुछ कहा जाना बाक़ी है.

उसी तरह पाकिस्तानी भी शायद इस बात को मान लें कि सारी दिक्क़ते बाहर से अचानक से नहीं आ गईं और सारे मसले बहुत पहले से पनप रहे थे.

लेकिन जहां तक अधिकारियों का सवाल है वो वहीं रणनीति अपना रहे हैं जो प्रांगण में मौजूद पुलिस वाले ने अपनाई थी: इंकार.

लगता है उनके लिए इस मसले से निपटने का सबसे आसान रास्ता है इस तरह का बरताव करना जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था.

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