पाकिस्तान: न पतंगों की डोर, न बसंत का शोर....

  • 8 मार्च 2012
Image caption भारत, पाकिस्तन और बांग्लादेश जैसे देशों में पतंग उड़ाने की परंपरा रही है

सर्दी ख़त्म होते ही त्योहारों का मौसम शुरु हो जाता है लेकिन पाकिस्तान की सांस्कृतिक राजधानी लाहौर में ख़ामोशी छाई हुई है और न ही कोई त्योहार मनाया जा रहा है.

लाहौर में इस ख़ामोशी का बड़ा कारण यह है कि शहर में बसंत त्योहार और पतंग उड़ाने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है.

सरकार इसका कारण पतंग की डोर से हुई मौतें बताती है लेकिन पाकिस्तानी समाज में बढ़ता कट्टरपंथ इसकी बड़ी और एक मात्र वजह है.

कुछ साल पहले अगर आप इसी मौसम में लाहौर घूमने जाते तो पूरा शहर दुल्हन की तरह सजा हुआ होता था आसमान विभिन्न रंगों पतंगों के सजा रहता था मानो किसी ने आसमान पर होली के रंग फैला दिए हों.

लेकिन इन दिनों लाहौर का माहौल दुखी है और आसमान ख़ाली और फीका दिखा है.

लाहौर के निवासी और जाने-माने विश्लेषक हसन निसार कहते हैं, “बसंत पर प्रतिबंध लगाना ग़लत क़दम है, गाड़ियों की प्रतिदिन दुर्घटनाएं होती हैं तो क्या आप गाड़ियों पर पाबंदी लगा देंगे.”

रंग न हिंदू होता है न मुसलमान.....

पाकिस्तान में कुछ धार्मिक गुट बसंत त्योहार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते रहते हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की माँग से दोहराई जाती रही है.

हसन निसार कहते हैं, “मैंने एक दिन नारंगी रंग का कुर्ता पहना हुआ था तो लोगों ने कहा कि यह तो हिंदुओं का रंग है. नारंगी तो गेंदे के फूल का रंग है और मुझे बहुत पसंद है. क्या रंग कभी हिंदू और मुसलमान हुआ है क्या? इसलिए बसंत एक त्योहार है इसका हिंदू और मुसलमानों से कोई लेना देना नहीं है.”

पतंग एसोसीएशन के अध्यक्ष सलीम शेख़ ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा कि जबसे सरकार ने बसंत पर प्रतिबंध लगा दिया, तब से सैंकड़ों परिवार आर्थिक रुप से कमज़ोर हो गए हैं.

वह कहते हैं, “यह बात ग़लत है कि बसंत के अवसर पर पतंग की डोर से लोगों मरे हैं लेकिन सच बात यह है कि पतंग की डोर से मरने वाले न होने के बराबर हैं जबकि बसंत त्योहार पर प्रतिबंध से कई मज़दूर मारे गए हैं.”

उन्होंने कहा, “बसंत त्योहार लाहौर शहर की सुंदरता थी और यह एक फैमली फेस्टिवल है. इसका न राजनीति से और न ही धर्म से कोई संबंध है.”

लाहौर सहित कई शहरों में सैंकड़ों लोगों का रोज़गार बसंत त्योहार से जुड़ा रहता था और उसके पर्यटन को भी बढ़ावा मितला था.

पतंग बनाने वाले एक व्यापारी राणा बिल्लो कहते हैं,“17 नवंबर 2009 में पंजाब विधानसभा ने एक बिल पारित किया था और उसकी अधिसूचना भी जारी की गई थी कि बसंत के मौक़े पर 15 दिनों के लिए पतंग उड़ाने की अनुमति होगी तो सरकार इस पर अमल क्यों नहीं करती है.”

उन्होंने बताया कि उस क़ानून में सब कुछ दिया हुआ था और अगर आज भी उस पर अमल कर बसंत त्योहार पर लगा प्रतिबंध हटा दिया जाता है तो एक भी व्यक्ति की पतंग की डोर से मौत नहीं होगी.

कुछ दिन पहले लाहौर हाई कोर्ट ने बसंत पर लगे प्रतिबंध के ख़िलाफ़ दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए प्रतिबंध के फ़ैसले को बरक़रार रखा था.

हसन निसार कहते हैं कि जब तक इस देश से चरमपंथ और सामंतवाद ख़त्म नहीं होगा तब सांस्कृतिक त्योहार नहीं होंगे.

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