हाफ़िज़ के लिए इनाम, पर अभी क्यों?

  • 3 अप्रैल 2012
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Image caption हाफ़िज़ सईद पाकिस्तान में आराम से घूमते हैं और भाषण आदि दिया करते हैं

लश्करे तैबा के संस्थापक हाफ़िज़ मोहम्मद सईद की जानकारी देने के लिए अमरीका की एक करोड़ डॉलर का इनाम देने की घोषणा का भारत ने स्वागत किया है.

मगर दक्षिण एशियाई कूटनीति पर नज़र रखनेवाले विश्लेषक सुशांत सरीन का कहना है कि अमरीका के इस फ़ैसले का भारत से सीधा संबंध नहीं है.

उन्होंने कहा,"मेरी समझ में इसे भारत के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए, इसका अधिक लेना-देना अमरीका और पाकिस्तान के बीच के रिश्तों में आई कड़वाहट से समझा जाना चाहिए. भारत को इसका परोक्ष लाभ मिल रहा है मगर ये क़दम भारत को ध्यान में रखकर नहीं उठाया गया."

उन्होंने कहा कि अमरीका को लश्कर या जमात की असलियत दस साल पहले से पता थी, और भारतीय संसद पर जब हमला हुआ था तो अमरीका के दबाव के कारण ही पाकिस्तान में लश्करे तैबा को प्रतिबंधित किया गया. इसके बाद 2008 में मुंबई हमला हुआ तो संयुक्त राष्ट्र की ओर से जमात उद दावा और लश्कर को चरमपंथी संगठन घोषित करने का क़दम उठाया गया.

सुशांत कहते हैं,"भारत, अमरीका के लिए पाकिस्तान से संबंध को लेकर एक कार्ड की तरह रहा है. वो पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए इस कार्ड का इस्तेमाल करता है."

उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले अमरीका में गुलाम नबी फ़ाई की गिरफ़्तारी मामले में यही हुआ जो आईएसआई का एजेंट था और कश्मीर के बारे में बात करता था.

उनका कहना है कि फ़ाई 20 साल से अमरीका में काम करता रहा था मगर तब किसी ने उसे कुछ नहीं कहा.

वो कहते हैं,"जब अमरीका के फ़ैसले में भारत की ओर का झुकाव नज़र आता है तो उससे पाकिस्तान पर दबाव और बढ़ जाता है, और अमरीका यही करने की कोशिश कर रहा है."

सुशांत सरीन कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि अमरीका की इनाम की घोषणा के बाद अमरीका तत्काल कोई ठोस क़दम उठानेवाला है, और ना ही पाकिस्तान के लिए भी शायद इतनी कोई मुश्किल होगी.

मगर वो कहते हैं कि उन्हें शक है कि शायद अमरीका भविष्य के लिए अपना कोई आधार तैयार कर रहा हो.

वो कहते हैं,"हो सकता है कि आज से चंद साल बाद या चंद महीने बाद अगर पाकिस्तान ने वो नहीं किया जो अमरीका चाहता है, या वो रास्ता बंद रखता है, तो अमरीका ये भूमिका बना रहा है कि आगे चलकर वो पाकिस्तान को एक आतंकवादी देश घोषित कर सके.

"इनाम की घोषणा तब होती है जब आपको उस व्यक्ति का कोई अता-पता ना हो, हाफ़िज़ सईद ख़ुलेआम पाकिस्तान में घूमता है, उसका पता सबको मालूम है, ऐसे आदमी के लिए इनाम का कोई औचित्य नहीं समझ आता है, सिवा इसके कि ये एक प्रोपेगेंडा हो, एक संदेश देने का प्रयास हो."

वो साथ ही कहते हैं कि अमरीका का ये क़दम एक जल्दीबाज़ी में उठाया गया क़दम लगता है.

सुशांत कहते हैं,"अमरीका सरकार की वेबसाइट पर लश्करे तैबा और जमात उद दावा को एक देवबंदी चरमपंथी गुट बताया गया है जबकि उनका देवबंद के साथ कोई लेना-देना नहीं है, वो एक वहाबी गुट है."

सुशांत के अनुसार ये एक जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम लगता है जिसका इस्तेमाल आगे चलकर पाकिस्तान को घेरे में लेने के लिए किया जा सकता है.

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