पाकिस्तान में जेल तोड़ने पर उठे सवाल

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Image caption तालिबान चरमपंथियों ने बन्नू जेल पर हमला कर अपने 400 के करीब साथियों को छुड़ा कर ले गए.

छह साल पहले जब उत्तरी वजीरिस्तान के मीरान शाह में तालिबान और सुरक्षाबलों के बीच संघर्ष अपने चरम पर था और अस्पताल को धमाके से उड़ा दिया था तो रिपोर्टिंग के लिए जाने का अवसर मिला.

खैबर पख्तूनख्वाह के दक्षिणी शहर बन्नू में करीब एक घंटे बाद कुछ पत्रकारों और खुफिया एजेंसी वालों को मेरे पहुँचने की सूचना मिली.

उस बुनियाद पर मैं यह नहीं मान सकता कि बन्नू जेल पर सौ से अधिक हथियारबंद तालिबान हमला करें, जेल तोड़ कर अपने लोगों को भगा कर ले जाएँ और खुफिया एजेंसियों और सुरक्षाबलों को पता न चले.

यह जेल शहर के भीतर स्थित है और उसके आस पास जहाँ खुफिया एजेंसी का दफ्तर है. वहाँ आबादी भी है और यह कैसे संभव है कि बन्नू शहर में मौजूद सेना, अर्धसैनिकबल और पुलिस को तालिबान की दो घंटे की कार्रवाई का पता ही न चले?

जेल के भीतर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात होते हैं और तालिबान हमलावरों पर किसी ने न गोली चलाई और न ही कोई घायल हुआ या मारा गया. बताया जाता है कि जेल के भीतर चार पुलसिकर्मी घायल हुए लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी जेल में क्या केवल चार पुलिसकर्मी तैनात थे?

'कैसे पहुँचे हमलावर?'

बन्नू शहर से कबायली इलाके उत्तर वज़ीरिस्तान की सीमा करीब नौ किलोमीटर बाद शुरु होती है और मीरान शाह तक पहुँचने में ढाई से तीन घंटे लग सकते हैं.

रास्ते में बहुत ही सुरक्षा चौकियाँ है और कहीं भी तीन सौ से अधिक कैदी और एक सौ के करीब हमलावरों के जुलूस को नहीं रोका गया और वह आराम से चले गए?

जेल तोड़ने के बाद सुरक्षाबलों ने अभी तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की है? बन्नू और उसके आस पास में तीन जगहों पर सेना के हैलिकॉप्टर मौजूद हैं लेकिन किसी को ऐहसास नहीं हुआ कि पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ पर हमला करने वाले अभियुक्त रशीद सहित कई खतरनाक अभियुक्तों का पीछा किया जाए?

बन्नू जेल तोड़ने की घटना पाकिस्तान के ऐतिहास में दूसरी बड़ी जेल तोड़ने की घटना है. पहली घटना 1986 में सिंध के उत्तरी शहर सखर की जेल तोड़ी गई थी.

पुलिस की वर्दियाँ पहने 40 के करीब हमलावर पहुँचे और तीस के करीब अपने साथियों को छुड़ा कर ले गए थे. उसमें से ज़्यादातर अपराधी यानी डाकू थे.

'राष्ट्रीय हित'

1986 में इस घटना को सुरक्षा में चूक करार दिया गया था और कुछ पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया था लेकिन वह रिपोर्ट कभी भी सरकारी तौर पर सर्वजानिक नहीं की गई.

लेकिन उस दौर के कुछ अधिकारियों ने रिटायरमेंट के बाद खुलासा किया था कि सखर जेल तोड़ने की घटना ‘राष्ट्रीय हित’ में घटी थी ताकि सिंध में डाकुओं को खुला छोड़ा जा सके क्योंकि उस समय सैन्य शासक जनरल जिला-उल-हक की यह नीति थी.

मुझे आशंका है कि कहीं बन्नू जेल को तोड़ने की घटना भी ‘राष्ट्रीय हित’ में न घटी हो क्योंकि वैसे भी खैबर पख्तूनख्वाह में दूसरे प्रांतों की तुलना में अभियुक्तों को तुरंत सज़ा दी जाती है और ड्रोन हमलों से हक्कानी नेटवर्क के लोग भी मर रहे हैं. ऐसे में हो सकता है उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए बन्नू जेल से अपने साथियों को छुड़वाया हो.

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