सड़कों पर भटकती जिंदगी

  • 28 अप्रैल 2012
पाकिस्तानी सड़क पर बच्चे
Image caption आशिक को क्रिकेट और फुटबॉल का शौक है और वो दूसरे बच्चों के साथ खेलना चाहते हैं

पाकिस्तान की सड़कों पर रहने वाले ज़्यादातर बच्चे दक्षिणी शहर कराची में रहते हैं.

ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान की सड़कों पर 12 से 15 लाख बच्चे रहते हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं के मुताबिक उनकी संख्या में वृद्दि हो रही है.

गंदगी के ढेर में कुछ ढूँढ रहे 10 वर्षीय आशिक से मेरी मुलाकात हुई. कूड़े की ये जगह पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के मकबरे से थोड़ी ही दूर पर है.

आशिक के साथ बच्चों का एक पूरा गुट गंदगी के ढेर में काम की चीज़ें ढूंढ रहा था.

शरीर को जला देने वाली तेज धूप में आशिक जैसे बच्चे हर दिन सात घंटे से ज्यादा तक काम करते हैं.

आशिक कहते हैं, “मैं प्लास्टिक की बॉटलों और दूसरे सामान को इकट्ठा करके बेच देता हूँ ताकि उन्हें रिसाइकल करके दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सके.”

इस काम से आशिक को हर दिन लगभग 100 पाकिस्तानी रुपए की आमदनी हो जाती है.

कमाए हुए इस धन का इस्तेमाल आशिक अपने कुछ शौक पूरे करने जैसे बिस्किट खरीदने पर भी खर्च करते हैं.

और वो ये भी कहते हैं कि वो नशे का सेवन नहीं करते.

आशिक को क्रिकेट और फुटबॉल का शौक है और वो दूसरे बच्चों के साथ खेलना चाहते हैं लेकिन उन्हें ये कहकर भगा दिया जाता है कि वो बहुत गंदे हैं.

वो कहते हैं, “इससे मुझे बहुत बुरा लगता है.”

खाने का इंतज़ार

Image caption ज्यादातर ऐसे बच्चे अपनी जिंदगी के 18 साल भी पूरे नहीं कर पाते

ज्यादातर परिवार अपने बच्चों को गरीबी के कारण छोड़ देते हैं.

और सड़कों पर खाने को बहुत कुछ मिल जाता है जैसा कि मुझे कराची के अब्दुल्ला शाह गाज़ी सूफी दरगाह में दिखा.

यहाँ अमीर पाकिस्तानियों के दिए गए धन से चल रहे कई रेस्तराँ चलते हैं जहाँ मुफ्त चिकन और मटन पुलाव दिया जाता है.

यहाँ इकट्ठा हुए ज्यादातर बच्चे हैं. कुछ की उम्र पाँच या छह साल से ज्यादा की नहीं होती.

उनके पास प्लास्टिक के बैग होते हैं और वो अपने से बड़े लोगों से खाने के लिए झगड़ा करते हैं.

बाहर से देखने से लगता है कि यहाँ ये बच्चे सुरक्षित हैं, लेकिन कराची की सड़कें खतरनाक हैं. कुछ ही हफ्तों में शहर की गैंग बच्चों को अपने साथ जोड़ लेती हैं. कुछ बच्चे देह व्यापार से जुड़ जाते हैं.

संस्था सेंटर फॉर स्ट्रीट चिल्ड्रन चलाने वाले राणा आसिफ़ बच्चों की हालत की जिम्मेदारी सरकार पर डालते हैं. वो कहते हैं कि सरकार इन बच्चों के लिए खुद कुछ नहीं करती.

दूसरे कार्यकर्ता कहते हैं कि जुर्म से जुड़े गुटों के अलावा जेहादी गुट भी इन बच्चों को अपने साथ जोड़ लेते हैं.

पुलिस का कहना है कि उनके पास इतने साधन मौजूद नहीं हैं कि वो इन गुटों से निपट सकें.

यास्मीन की कहानी

दस वर्षीय यास्मीन के पिता नशा करते हैं. इस कारण यास्मीन को लोगों की गाड़ियों को साफ करना और भीख मांगना पड़ता है ताकि नशे के लिए पैसे जुटाए जा सकें.

यास्मीन जैसी कई लड़कियाँ देह व्यापार में ढकेल दी जाती हैं.

एक दूसरे पार्क में मेरी मुलाकात 19 वर्षीय इरफ़ान से हुई. इरफ़ान ने बताया कि वो सड़कों पर ही बड़े हुए हैं.

“मैं चोरी और नशा करता हूँ. जब मैं नशा करता हूँ तो मेरा दिमाग सुन्न हो जाता है और मैं हमेशा खुश रहता हूँ.”

ये बच्चे कभी भी शायद ही कभी इन सड़कों को छोड़ पाएँ.

ज्यादातर ऐसे बच्चे अपनी जिंदगी के 18 साल भी पूरे नहीं कर पाते.

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