ओसामा का अंत और पाकिस्तान

  • 2 मई 2012
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Image caption ऐबटाबाद के इसी घर में रह रहे ओसामा बिन लादेन को अमरीकी सैनिकों ने रात में कार्रवाई कर मारा

पिछले साल दो मई को, सारी दुनिया, जिनमें अधिकतर पाकिस्तानी भी शामिल हैं, ये बात पता लगते ही स्तब्ध रह गई कि 2002 के अक्तूबर में तोरा बोरा की पहाड़ियों से भागने के बाद दुनिया का सबसे वांछित चरमपंथी ओसामा बिन लादेन सारे समय पाकिस्तान में ही बैठा था.

अमरीकी नौसेना की विशेष टुकड़ी – सील्स – ने दो मई की रात को लादेन को फौजियों के गढ़ वाले शहर ऐबटाबाद में धावा बोलकर मार डाला जहाँ वो एक घर में अपने परिवार के साथ रह रहा था.

पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को इस अभियान की कोई खबर नहीं थी क्योंकि आतंक के विरूद्ध लड़ाई में उसके निकट सहयोगी अमरीका ने उन्हें साथ नहीं लिया था – ताकि कहीं आईएसआई में लादेन के रहनुमा उसे इस अभियान की भनक ना दे दें.

जिस गुपचुप तरीके से अल कायदा सुप्रीमो को मारा गया वो इस बात का संकेत था कि कैसे वाशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच दरार आ चुकी है.

अगले एक साल में उनके भरोसे में आई ये दरार और चौड़ी हो गई है.

इसकी शुरूआत 2011 की जनवरी में सीआईए के एक कॉन्ट्रैक्टर रेमंड डेविस की गिरफ़्तारी से हुई, ये बढ़ी दो मई को ओसामा बिन लादेन को मारे जाने की घटना से, और ये चरम पर पहुँची जब इसी साल नंवबर में अमरीकी सेना ने अफगान सीमा के पास सलाला में 24 पाकिस्तानी सैनिकों को एक झड़प में मार डाला.

इस कारण ना केवल पाकिस्तान में नेटो की सप्लाई पर रोक लग गई बल्कि इसके बाद से सीआईए और आईएसआई के संबंधों में पूरी तरह से गतिरोध बन गया है.

इस हिसाब से ऐबटाबाद की घटना एक तरह की निर्णायक रेखा थी. इसके बाद जो हुआ, उनसे साफ हो गया कि अमरीका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार की गुंजाईश खत्म हो चुकी है.

बेईज़्ज़ती

अपने आप को दुनिया की एक श्रेष्ठ जासूसी संस्था समझनेवाली आईएसआई को बेइज्जत होना पड़ा, जब उन्हें लगा कि उस सीआईए ने उनके साथ छल किया जिसके साथ वो 11 सितंबर के हमले के बाद से सारी खुफिया सूचनाएँ बाँटने का दावा करते थे.

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Image caption सेना प्रमुख जेनरल कयानी के करीबी माने जाते रहे आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा की विदाई हो चुकी है

ऐबटाबाद घटना के बाद आईएसआई की मिट्टी पलीद हो गई. ऐसा दावा किया गया कि उसे इस बात की कोई हवा नहीं थी कि ओसामा बिन लादेन काकुल सैन्य अकादमी के बगल में ही मौजूद एक घर में अपनी तीन बीवियों, आठ बच्चों और एक पोते के साथ रह रहा है.

अब अगर उसे सचमुच लादेन के पाकिस्तान में होने की खबर नहीं थी तो ये एक बहुत ही बड़ी खुफिया चूक थी. और अगर आईएसआई को ये पता था तो फिर उसपर सांठगांठ और दोहरेपन का आरोप लगता.

आईएसआई प्रमुख जेनरल शुजा पाशा, जो कि सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी के करीबी सहयोगी हैं, उन्हें आशा थी कि उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाया जाएगा.

लेकिन पिछले महीने उनकी विदाई हो गई. मगर, पाकिस्तान की राजनीति में उनकी विवादास्पद भूमिका पर चर्चा अभी भी जारी है.

ये बात सामने आ चुकी है कि पाशा पिछले अक्तूबर में, जेनरल कयानी से सलाह के बाद, मेमोगेट स्कैंडल के विवादास्पद किरदार मंसूर एजाज़ से पूछताछ करने के लंदन गए थे.

पाकिस्तानी मूल के अमरीकी व्यवसायी मंसूर एजाज़ के साथ उनकी इस गोपनीय बैठक के बारे में पाकिस्तान सरकार को कोई जानकारी नहीं थी.

इस विवाद के कारण अमरीका में पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी को कुर्सी गँवानी पड़ी जिनपर कथित रूप से एक मेमो लिखने का आरोप लगा जिसमें कि कथित रूप से राष्ट्रपति ज़रदारी को सेना की नाराजगी से बचाने के लिए अमरीका से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया था.

असर

ये स्पष्ट है कि ऐबटाबाद पर अमरीकी हमले से ना केवल पाकिस्तान और अमरीका के संबंधों में खटास आई, बल्कि इससे पाकिस्तान के भीतर सेना और सरकार के बीच भी मतभेद गहरा गए.

इससे पूर्व पाकिस्तान की हालत ये थी कि यदि ऐसा कोई मतभेद हुआ होता, तो मामला इतना आगे बढ़ने से पहले ही बगावत हो जाती.

ऐबटाबाद में उस परिसर को मिट्टी में मिला दिया गया है जहाँ लादेन बरसों तक एक परिवार वाले आदमी के रूप में रहा.

लेकिन इससे पाकिस्तानी सेना के प्रतिष्ठान की उस छवि में जुड़ा वो नया अध्याय नहीं मिट सकता जिस छवि में वो पता नहीं कितनी ही बार और पता नहीं कितनी ही घटनाओं को कभी बनाती तो कभी मिटाती रही है.

उधर पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट की ओर से ऐबटाबाद की घटना की जाँच के लिए नियुक्त न्यायिक आयोग का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है.

पाकिस्तान में ऐसे लोगों की संख्या गिनती की होगी जिनको ये भरोसा होगा कि जाँच से कुछ ऐसा निकलेगा जिसकी ऊँगली राष्ट्रपति की ओर हो सकेगी.

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