पाकिस्तान के गरीब हिन्दू बच्चों को तोहफा

हिंदू लड़के
Image caption संजेश कुमार कराची के गरीब हिंदू लड़कों और लड़कियों के मुफ्त शिक्षा देते हैं.

पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को हमेशा से ही समस्याओं का सामना रहा है और वह समस्याएँ कम नहीं हुई हैं, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इन सब दिक्कतों के बावजूद समाज में अपना स्थान बनाए रखा है. उनके योगदान को पूरे देश में कदर की निगाह से देखा जा रहा है.

बीबीसी हिंदी ने कुछ ऐसी ही खास शख्सियतों से बातचीत की है. इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में अध्यापक संजेश कुमार से बातचीत.

33 वर्षीय संजेश कुमार कराची के निवासी हैं और पिछले तीन सालों से गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे हैं, वे दिन में दो से चार घंटों तक उन्हें पढ़ाते हैं.

कराची के जिन्ना अस्पताल के पास एक गरीब बस्ती है जिसमें अधिकतर हिंदू परिवार रहते हैं और ज्यादातर लोग घरों और अस्पताल में सफाई का काम करते हैं.

इन लोगों के पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसा नहीं है और यही ध्यान में रखते हुए संजेश कुमार ने बस्ती के बच्चों को मुफ्त पढ़ाने के बारे में सोचा.

भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश

शाम के वक्त बस्ती के अंदर एक छोटी सी खाली जगह पर बच्चे इकट्ठे होते हैं और संजेश वहीं उन्हें जमीन पर बैठकर पढ़ाते हैं.

संजेश के कुछ दोस्त भी इस नेक काम में उनकी मदद करते हैं. इस वक्त वो करीब 50 बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे हैं.

जब मैंने संजेश से पूछा कि तेज दौड़ती हुई जिंदगी में वो समय कैसे निकाल पाते हैं तो उन्होंने कहा कि गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा देना उनके लिए अहम है क्योंकि अगर वह बच्चे पढ़ जाएंगे तो देश के लिए काम आएंगे.

वे कहते हैं कि उन्होंने एक निजी स्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी और सरकारी स्कूलों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, इसलिए गरीब बच्चे सही तौर पर शिक्षा हासिल नहीं कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि इस काम में उन्हें दिक्कतें को काफी आती हैं लेकिन वह समझते हैं कि गरीब बच्चों को शिक्षा देना बहुत जरुरी है और यह समाज के लिए भी सही है, अगर बच्चे शिक्षा हासिल नहीं करेंगे तो हो सकता है कि बड़े हो अपराधी बन जाएं.

वे कहते हैं, “हमारी कोशिश होती है कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दें और बाद में हम उनके परिवारों को कहते हैं कि आपका बच्चा काफी पढ़ गया है, अब उसे किसी स्कूल में दाखिल करवाओ.”

उनके मुताबिक ऐसा करने से बच्चों के परिवारों का हौसला बढ़ता है, वे बच्चों के भविष्य के बारे में सही तौर पर सोचने लगते हैं और उन्हें दाखिल करवाते हैं.

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