असल में पागल कौन है?

 सोमवार, 3 सितंबर, 2012 को 08:29 IST तक के समाचार
गिरफ्तारी

ताज़ा खबर के मुताबिक एक इमाम को रिम्शा के बस्ते में कुरान के जले पन्ने रखने के आरोप में गिरफ्तार किया है.

जब भी कोई 14 वर्षीय बच्ची रिम्शा के मानवाधिकारों के बारे में दलीलें देते हुए उसकी मानसिक स्थिति का जिक्र करता है तो मुझे खुद अपनी दिमागी हालत पर संदेह होने लगता है.

पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों की संख्या इतनी कम है कि हममें से ज्यातार कुफ्र के खिलाफ जंग के लिए तो हर वक्त तैयार रहते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम ने काफ़िर देखे हैं. शायद इस कमी को पूरा करने के लिए हम अच्छे भले मुसलमानों को भी काफ़िर करार देने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं.

हमने काफ़िर ज्यादातर या तो फिल्मों में देखें हैं या फिर अपनी सड़कों पर झाड़ू देते हुए. हालांकि इसमें भी थोड़ी गलतफ़हमी है क्योंकि जमीन पर कूड़ा इतना बढ़ गया है और नौकरियां इतनी कम है कि अब हज़ारों सफाई कर्मचारी मुसलमान हैं. हम अलबत्ता कलमे के पाबंद इन भाइयों को भी अछूत ही समझते हैं.

तो हमने कभी किसी गैर मुसलमान से सलाम दुआ की हो या ना की हो, लेकिन हमें ये यकीन है कि पाकिस्तान में हर ईसाई, हर हिंदू हर रात को सोने से पहले सोचता है कि कल उठ कर कौन सी ऐसी गुस्ताखी करूं कि सोई हुई उम्मत ए मुसलमान गफ़लत के ख्वाब से जग जाए, क्या ऐसा करूं कि मुहल्ले में रहने वाले मुसलमान मेरे घर पर चढ़ाई कर दें, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से मेरे खिलाफ फतवे जारी होने लगें. मुझे मेरी अपनी हिफाजत के लिए जेल में डाल दिया जाए.

अगर कोई ऐसा सोचता है कि तो उसकी मानसिक स्थिति संदेह के दायरे में है. और अगर हम उनके बारे में ये सोचते हैं तो हमारी दिमागी हालत का सर्टिफिकेट कौन जारी करेगा.

आपने जिंदगी में कभी काफ़िर देखा हो या न देखा हो, 14 साल के बच्चे तो देखे होंगे. अगर आपके अपने बच्चे नहीं हैं तो बहन भाइयों के होंगे, मुहल्ले में खेलते देखा होगा.

जो खुश नसीब होते हैं, उन्हें सुबह सुबह स्कूल की वर्दी पहने गाडियों और बसों में स्कूल जाते देखा होगा. जो कम नसीब हैं उन्हें चाय के होटलों पर और मोटर वर्कशॉप पर डांट खाते सुना होगा. ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते देखा होगा या फिर अपने से बड़े आकार वाले थैले उठाए कचरे के ढेरों से कचरा उठाते देखा होगा.

क्या कभी इनको देख कर ऐसा लगा कि ये इस्लाम धर्म को नुकसान पहुंचा सकते हैं. खुदा की खुदाई में बाधा डाल सकते हैं या पैगंबर इस्लाम की शान में कोई गुस्ताखी कर सकते हैं. दुनिया के हर धर्म, हर राजनीतिक व्यवस्था और हर दर्शन में बच्चे मासूम समझे जाते हैं.

तो फिर हम इस हाल में कैसे पहुंचे कि 14 साल की रिम्शा को मासूम साबित करने के लिए पहले ये जरूरी है कि उसे मानसिक रोगी साबित किया जाए. जो जज और डॉक्टर साहेबान रिम्शा के 14 वर्षीय दिमाग की खराबी ढूंढ रहे हैं, उन्हें एक नजर हमारे दिमाग पर भी डालनी चाहिए और हमें बताएं कि असल में मानसिक रोगी कौन है.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

इसी विषय पर और पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.