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कला-संस्कृति का द्वार था दरभंगा

बागमती के तट पर बसा हुआ शहर दरभंगा अपनी पेंटिंग के साथ-साथ कला और संस्कृति के केंद्र के रूप में मशहूर रहा है.

कहा जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले व्यापारी पहले इसी जगह रुकते थे और फिर यहाँ से बंगाल में प्रवेश करते थे.

इसी कारण इस जगह का नाम उन्होंने दर-ए-बंगाल (बंगाल का दरवाज़ा) रख दिया जो धीरे-धीरे दरभंगा बन गया.

चौदहवीं शताब्दी में दरभंगा राज्य का विलय मुग़ल सल्तनत में हो गया.

एक और तथ्य के मुताबिक़ बादशाह अकबर ने दरभंगा को तिरहुत राज्य के महामहोपाध्याय महेश ठाकुर को 16वीं शताब्दी में सौंपा था.

दरभंगा शहर यहाँ के महाराजा के महलों के इर्द-गिर्द बसना शुरू हुआ और नेपाल की सीमा तक फैल गया.

शिक्षा केंद्र

यह शहर यहाँ की ब्राह्मण जाति में पाई जाने वाली उच्च शिक्षा के लिए भी प्रसिद्ध रहा है.

जहाँ एक तरफ मिथिला के लोगों की उच्च शिक्षा का लोहा सभी ने माना है तो दूसरी तरफ मिथिला की महिलाओं की अदभुत कला मधुबनी पेंटिंग के नाम से प्रसिद्ध है.

ख़ास उत्सवों के ऊपर बनाए जाने वाली ये चित्रकारी सारे विश्व में सराही जाती है.

ये कला सदियों से चली आ रही है हालाँकि इसका व्यावसायिक इस्तेमाल 1960 के दशक में ही शुरू हुआ.

इनमें सबसे पसंद किया जाने वाला चित्र 'कोहबर घर' (शादी के बाद जिस कमरे में पूजा होती है) का होता है जो नवविवाहित दंपत्ति को आशीर्वाद देने के लिए बनाया जाता है.

मधुबनी शैली में शिव-पार्वती और राधा-कृष्ण आदि के चित्र भी बनते हैं. कहते हैं कि इस कला को चोटी पर पहुँचाने में दरभंगा महाराज का बड़ा योगदान है.

महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर (1858-1898) जिन्होंने 1860 में राजगद्दी संभाली, एक कुशल और अच्छे राजा माने जाते थे.

उन्होंने अपने राज्य के दौरान कई सामाजिक कार्य किए. उनके 1898 में देहांत के बाद उनके भाई महाराज रामेश्वर सिंह ने राजगद्दी संभाली.

अपने भाई की तरह वे भी बंगाल विधानपरिषद के सदस्य रहे.

'गया शैली'

दरभंगा महाराज की बहुत सी धरोहरों में से एक यहाँ की गया शैली भी है जिसे दरभंगा घराना के नाम से जाना जाता है. दरभंगा घराना का आरंभ दरबारी संगीत के रूप में हुआ.

इसका श्रेय राधाकृष्ण और कर्ताराम को जाता है जो दरभंगा नवाब के दरबार से जुड़े थे.

ये दोनों संगीतकार भूपत ख़ान के शिष्य बनकर 35 साल तक रहे और फिर 1790 में राग मल्हार के सुनाकर बारिश कराने का अदभुत कारनामा अंज़ाम दिया.

इससे प्रसन्न होकर दरभंगा महाराज ने उन्हें मालिक की उपाधि प्रदान की.

मालिक बंधुओं ने 1947 तक राज घराने की सेवा की. घराने के अंतिम दरबार गायक रामचतुर मालिक का देहांत 1991 में हुआ. पंडित विदुर मालिक ने उसके बाद घराने की बागडोर अपने अंतिम समय तक संभाले रखी.

इस शैली में खयाल, तराना, ग़ज़ल, भजन और दरभंगा के प्रसिद्ध कवि विद्यापति की ठुमरी गीत आज तक गाये जाते हैं.

दरभंगा के महाराजाओं ने अपने यश का प्रतीक सिर्फ़ दरभंगा ही नहीं बल्कि भारत के और कई जगहों पर छोड़ा है. इनमें कोलकाता, राँची और इलाहाबाद के दरभंगा हाउस प्रमुख हैं.

आजकल दरभंगा महाराजाओं के मुहल्लों में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय का मुख्यालय है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि दरभंगा के राजघराने की धरोहर आज भी इस शहर के लिए एक बेहतरीन तोहफ़ा है.