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मंगलवार, 24 फ़रवरी, 2004 को 21:35 GMT तक के समाचार
 
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विचार-मंथन में युवाओं की सक्रिय भागीदारी
 

 
 
बीबीसी पर अटूट आस्था बनी हुई है
पाँच फ़रवरी को जब बीबीसी हिंदी का कारवाँ गोंडा की तरफ चला तो अनुमान लगाना मुश्किल था कि इसमें कितने लोग शामिल होंगे.

एक समय से सर्वेक्षण बता रहे हैं कि भारत में टेलीविज़न का बोलबाला है, और रेडियो का अस्तित्व संकट में है. आँकड़े ये भी बता रहे थे कि बीबीसी की हिंदी सेवा सुनने वालों की तादाद घट रही है.

शायद आँकड़े सही हों, लेकिन गोंडा से फ़ैज़ाबाद, अकबरपुर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, मिर्ज़ापुर, वाराणसी तक के सफ़र में मैंने अपनी आँखों से बीबीसी हिंदी सेवा के श्रोताओं का उत्साह और विश्वास देखा. इसके सामने तमाम आँकड़े मानो फीके पड़ गए.

 24 फ़रवरी की शाम पटना के सैंकड़ो युवा श्रोताओं के चेहरों में मुझे उत्तर प्रदेश के चेहरों की लकीरें उभरी दिखाई दी. लकीरों में वही सवाल, वही चिंताएँ.
 

बेशक ज़माना तर्क का है, लेकिन आस्था के सामने वो भी बौना-सा लगता है. और फिर जो आस्था मैंने देखी उसके दो कान हैं, जो सुनना चाहते हैं; एक मन है, जो जानना चाहता है; एक अस्तित्व है, जो ख़ुद को दुनिया से जोड़ना चाहता है.

मैं तो इस कारवाँ में वाराणसी तक ही शामिल रही, लेकिन आस्था का सफ़र उत्तर प्रदेश के आख़िरी पड़ाव पडरौना तक जारी रहा. यह आस्था रेडियो श्रोताओं की है. ये आस्था बीबीसी हिंदी सेवा के श्रोताओं की है. दुनिया के बारे में जानने और दुनिया से जुड़ने की ये इच्छा उन सभी लोगों में है जिनके पास जानकारी हासिल करने के कई विकल्प हैं. उन लोगों में है जो इन विकल्पों से दूर हैं और आज भी गाँव को शहर से जोड़ने वाली किसी पक्की सड़क का इंतज़ार कर रहे हैं. उन लोगों में है जो शिक्षा और रोज़गार के बीच एक पुल बनाने में जुटे हैं.

हर पड़ाव पर विचार-मंथन का दौर

ऐसे कितने ही श्रोताओं से भेंट हुई मेरी. ऐसा लगा मानो बीबीसी उनके लिए एक पुल बन गया हो. गाँव को दूसरे गाँव से जोड़ने का, गाँव को शहर से जोड़ने का, शहर को दूसरे शहर से जोड़ने का, और शहर को पूरे देश से और फिर पूरी दुनिया से जोड़ने वाला पुल.

इस अहसास के साथ अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास और गहरा हुआ. क्या हम उन्हें कुछ दे पाते हैं?

युवाओं की चिंताएँ

छोटे-छोटे शहरों में प्रेम-पर्व यानी सेंट वैलेंटाइन्स डे की शुभकामनाएँ देने वाले कार्ड पहुँच गए हैं. टेलीविज़न पर चौबीसों घंटे छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापन प्रलोभन का जाल फैला रहे हैं. आकांक्षाओं की उड़ान को ऊँचा कर रहे हैं. और इस सब के बीच युवा वर्ग अपने भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रहा है.

मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र याद आ रहे हैं जिनमें से ज़्यादातर सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रहे हैं. मुझे याद आ रहे हैं गोंडा के युवा जो शिक्षा संस्थानों की कमी को लेकर चिंतित थे. याद आते हैं फ़ैज़ाबाद के युवा श्रोता जिनके सामने सवाल था कि वे कैसे लोगों को देश का अभिभावक चुनें.

 ऐसे कितने ही श्रोताओं से भेंट हुई मेरी. ऐसा लगा मानो बीबीसी उनके लिए एक पुल बन गया हो. गाँव को दूसरे गाँव से जोड़ने का, गाँव को शहर से जोड़ने का, शहर को दूसरे शहर से जोड़ने का, और शहर को पूरे देश से और फिर पूरी दुनिया से जोड़ने वाला पुल.
 

अकबरपुर में विषय भले ही महिलाओं की मौजूदा स्थिति पर केंद्रित रहा मगर भागीदारी युवकों की रही. और जिसने सबके मन पर अमिट छाप छोड़ी वो था एक रिक्शा चालक. बीबीसी के मंच से उसने अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की.

प्रतापगढ़ में भ्रष्टाचार पर हुई बहस हो या मुग़लसराय में जनता की भागीदारी का प्रश्न. सारे विषय एक ही प्रश्न से जुड़ते नज़र आए- युवा भारत: सबसे बड़ा मुद्दा क्या?, जिस पर सुल्तानपुर में विचार-विमर्श हुआ. और मंच पर और मेहमानों के साथ बैठा एक बेरोज़गार युवा.

मुझे याद आ रहे हैं उन अनगिनत श्रोताओं के चेहरे जो भले ही सिर्फ़ एक दिन के कुछ घंटों के लिए बीबीसी हिंदी के कारवाँ में शामिल हुए, पर लग रहा है जैसे आज भी साथ-साथ चल रहे हैं, और अब बिहार तक पहुँच गए हैं.

24 फ़रवरी की शाम पटना के सैंकड़ो युवा श्रोताओं के चेहरों में मुझे उत्तर प्रदेश के चेहरों की लकीरें उभरी दिखाई दी. लकीरों में वही सवाल, वही चिंताएँ.

 
 
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