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मंगलवार, 24 फ़रवरी, 2004 को 16:46 GMT तक के समाचार
 
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अहिंसा कितनी व्यावहारिक?
 

 
 
बीबसी कारवाँ
सवाल पूछ रहे हैं श्रोता
कुशीनगर भगवान बुद्ध की निर्वाण-स्थली है. इसीलिए आज यहाँ बहस का विषय था – अहिंसा परमो धर्मः – क्या सचमुच?

लम्बी बहस चली और लोगों ने तरह-तरह के विचार रखे.

“सुबह खोला रेडियो बीबीसी, तो ख़ाली हिंसा ही पहले आती है – और कोई समाचार बाद में आता है. इराक़ में यह हुआ, वहाँ यह हुआ वग़ैरह-वग़ैरह”.

“मैं अहिंसा पर बोलना चाहूँगा कि अहिंसा हमारे देश की प्रमुख धरोहर है. ऐसा और कहीं भी विश्व में नहीं पाया जाता है. इसलिए हमें भारतीय होने का गर्व है कि हम अहिसा के पुजारी हैं – अहिंसा से हम वो चीज़ प्राप्त कर सकते हैं जो हमें चाहिए – हिंसा से हम सब चीज़ें प्राप्त नहीं कर सकते.”

“जहाँ तक अहिंसा की बात है – मेरी नज़र में अहिंसा की बात करना कोरी कल्पना है क्योंकि सभी धर्मों ने अहिंसा के मार्ग पर चलने की बात कही है, लेकिन वर्तमान हालात को देखा जाए तो एक ही परिवार में, एक ही घर में, एक ही छत के नीचे, देवरानी और जेठानी के बीच, अपने बच्चों की दाल में एक चम्मच घी अधिक डालने के लिए, पूरी राजनीति होती है. तो अहिंसा की बात करना कोरी कल्पना है. वर्तमान हालात में हिंसा वही कर रहे हैं जो बाहुबली हैं, वे ग़रीबों का शोषण कर रहे हैं, अत्याचार कर रहे हैं. ”

“छब्बीस जनवरी, पंद्रह अगस्त और दो अक्तूबर को ही अहिंसा के बारे में बोलने की बात रह गई है. यह कोरी कल्पना ही रह गई है. हम छब्बीस जनवरी, पंद्रह अगस्त और दो अक्तूबर को ही ऐसे बोलते हैं अहिंसा परमो धर्म है – उसके बाद मेरी ज़िंदगी में कहीं यह बात चरितार्थ नहीं होती.”

“ऐ अहिंसा के पुजारी एक दिन तेरा भी वक़्त आएगा,

नहीं आज के युग में, कल के युग में तू नाम पाएगा,

नहीं होगी कोई हिंसा कहीं, राम-राज आ जाएगा,

एक दिन तेरा भी वक़्त आएगा, एक दिन तेरा भी वक़्त आएगा.”

बीबीसी कारवाँ
लोगों की भीड़ जुटना आम बात हो गई है

लेकिन ये बहस तो सिर्फ़ एक बहाना ही था – बीबीसी हिंदी के लिए सुनने वालों से मिलने का, उनके मन टटोलने का, और उस रिश्ते को एक नई मज़बूती देने का, जो हज़ारों मील की दूरी पार कर, बीबीसी हिंदी को अपने श्रोताओं से जोड़े रखता है.

आज उत्तर प्रदेश में उस सफ़र का आख़िरी दिन था, जो 4 फ़रवरी से लखनऊ से शुरू हुआ. इस सफ़र में हम जहाँ-जहाँ जाते हैं, लोगों से बीबीसी हिंदी के लिए एक नारा भी माँगते हैं. लीजिये, आप भी

सुनिये –

“सुनते-सुनते बीबीसी, हम सभी ने जाना है,

इल्मो-आगाही का ये एक हसीं ख़ज़ाना है”

“बीबीसी है सब की यारी,

समाचार में सबसे भारी,

नेताओं के छक्के छुड़ाए

ममता, अचला की बारी”

“जब तक सूरज-चाँद रहेगा

बीबीसी तेरा नाम रहेगा”

क्या बात है, तालियाँ इनके लिए, बहुत ख़ूब.

और हर शहर में हमारे कारवाँ के साथ होती है एक बहुत बड़ी टीम, जिसमें शामिल लोगों के नाम तक आपको पता नहीं चलते. लेकिन उनकी ही मेहनत के ज़ोर पर चल रहा है ये कारवाँ. और इन्हीं में से एक हैं दीपक कामरा, जो पहले दिन से ही इस कारवाँ में शामिल हैं. मैंने आज उनसे पूछा कि एक चरण ख़त्म होने के बाद, आज उन्हें कैसा लग रहा है? इस के जवाब में दीपक का कहना था –

“मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ कि मैं बीबीसी हिंदी सेवा के साथ जुड़ सका. लोगों के साथ बात करके, उनका प्यार देख कर – मन भाव-विभोर हो जाता है. उनका प्यार मन को छू जाता है कि जिस तरह से वे बात करते हैं कि आलोक जी कब आएँगे, रूपा जी कब आएँगी, ममता जी कब आएँगी और अचला जी कब आएँगी – बीबीसी के प्रति उनका प्यार देख कर, मन में उमंगों की तरंगे – कुछ लहरें उठती हैं, और मैं बयान नहीं कर सकता कि वो क्या है”.

और दीपक जैसी ही हालत हमारी भी है – बताते नहीं बनता कि कितनी ख़ुशी हो रही है – लेकिन सब हमारे पास तारीफ़ करने ही नहीं आते – कुछ तो शिकायतें ले कर आते हैं और कुछ उम्मीदें – उम्मीदें भी छोटी-मोटी नहीं.

“सर, वो सी.ओ. साहब ने कहा है कि चले जाओ साहब के पास, दो सौ रुपए माँग लो, दे देंगे – तुम दुकान खोल लेना – बस इतना ही कहा है सी.ओ. साहब ने.”

“हाँ तो ठीक है जाओ उनके पास, सी.ओ. साहब के पास”

“वो हमें आपके पास भेजे हैं, सर”

आसमान चूमने की तमन्ना है लोगों की. और उम्मीद ये है कि बीबीसी चाहेगी तो वो पूरी हो जाएगी. और यही सब देख-सुन कर समझ में आता है कि लंदन में बैठ कर कार्यक्रम बनाते वक़्त हमारे कंधों पर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है.

 
 
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