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गुरुवार, 26 फ़रवरी, 2004 को 20:41 GMT तक के समाचार
 
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खेलों में भारत की दुर्दशा क्यों
 

 
 
रेणू अगाल एक छात्रा से बात करती हुईं
विषय पर लोगों ने खुल कर विचार व्यक्त किए
बीबीसी हिंदी का कारवाँ लेकर गुरुवार सुबह जब पटना से छपरा के लिए रवाना हुए थे तब इस बात का एहसास ही नहीं था कि वहाँ हमारा मुक़ाबला प्रमोद महाजन की भाजपा रैली से हो जाएगा.

छपरा की भीड़ भरी सड़कें, भगवा तोरड़ द्वारों और झंडों से रंगी पड़ी थी और भाजपा की रैली भी छपरा गर्ल्स हाई स्कूल के उस मैदान के पास ही हो रही थी जहाँ बीबीसी हिंदी के कारवाँ की चौपाल जमाई गई थी.

इसके बावजूद दो हज़ार से ज़्यादा लोग दोपहर की तपती धूप में हमारी बाट जोह रहे थे.

मंच पर थे जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति दुर्गविजय सिंह, खेल प्रशिक्षक अरविंद सिंह, क्रिकेट खिलाड़ी मोनीषा सिंह और शतरंज के खिलाड़ी राज वर्मा.

विषय था अंतरराष्ट्रीय खेल में भारत. विषय की शुरुआत जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति दुर्गविजय सिंह ने भोजपुरी इलाक़े के लोगों के स्वभाव पर टिप्पणी करके की.

दुर्गविजय सिंह ने कहा, "माना भी जाता है भोजपुरिया कभी बूढ़ा नहीं होता. अगर उम्र से वह बूढ़ा भी हो जाता है तो कभी-कभी उसको असल जवानी उसी समय मिलती है."

लेकिन सवाल उठा कि छपरा ने जहाँ शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में बाबू राजेंद्र प्रसाद और लोकनायक जयप्रकाश नारायण, लोककला के क्षेत्र में भिखारी ठाकुर और संगीत के क्षेत्र में चित्रगुप्त जैसी विभूतियाँ दीं, वहाँ खेल के क्षेत्र में उस स्तर का नाम क्यों नहीं उभर पाया.

कारण

इसका जवाब मोहम्मद आज़ाद ने इन शब्दों में दिया, " हमलोगों को कहा भी जाता है और जैसा कि भोजपुरी में एक कहावत भी है खेलोगे-कूदोगे होगे ख़राब पढ़ोगे-लिखोगे होगे नवाब-यही मुख्य कारण है पीछे रहने का."

 खेल में हमलोग उतना समय नहीं दे पा रहे हैं. कहा जाता है कि खेल में कोई भविष्य नहीं है. यहाँ भविष्य अंधकार में है. सरकार भी कोई सुविधा नहीं देती है और न ही नौकरियाँ ही देती है
 
क्रिकेटर मोनीषा सिंह

राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट खेलने वाली मोनीषा सिंह इसकी वजह हमारी मानसिकता में ढूँढ़ने की कोशिश की.

उन्होंने कहा, "खेल में हमलोग उतना समय नहीं दे पा रहे हैं. कहा जाता है कि खेल में कोई भविष्य नहीं है. यहाँ भविष्य अंधकार में है. सरकार भी कोई सुविधा नहीं देती है और न ही नौकरियाँ ही देती है."

जबकि युवा छात्रा गीता कुमारी ने इसका दोष बीमार संस्कृति को दिया.

गीता सिंह के अनुसार, "सामंतवादी प्रवृति के लोग यहाँ रहते हैं. यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है. लोग आईपीएस, इंजीनियर, डॉक्टर बनना चाहते हैं. लेकिन वे अपने बच्चों को खेल के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ने देना चाहते."

अभाव

खेल प्रशिक्षक अरविंद सिंह का मानना था कि बिहार में फ़ुटबॉल जैसे खेलों के लिए बुनियादी सुविधाएँ ही नहीं हैं.

चौपाल में युवा वर्ग ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया

अरविंद सिंह कहते हैं, "फ़ुटबॉल में बहुत बड़े स्तर पर बुनियादी सुविधा की ज़रूरत नहीं है लेकिन फिर भी खेल का मैदान होना बहुत आवश्यक है. लेकिन छपरा में खेल का सिर्फ़ एक मैदान है."

छात्र वेदप्रकाश मिश्र ने कहा कि आपाधापी और राजनीति के चलते उभरती खेल प्रतिभाओं को दबाया जाता है.

वेदप्रकाश मिश्र के अनुसार, "हमारे यहाँ खेल की स्थिति बहुत बढ़िया है लेकिन हमारे यहाँ प्रतिभा को दबाया जाता है. यहाँ की स्थिति ऐसी है अंधेर नगरी चौपट राजा टका सेर भाजी टका सेर खाजा."

शिकायत

जबकि स्कूल की छात्राओं रूपा कुमारी और संगीता सहाय को अपने साथ भेदभाव को लेकर शिकायत थी.

उन्होंने कहा कि माँ-बाप लड़कों को तो खेलने के लिए बाहर जाने की अनुमति दे देते हैं लेकिन लड़कियों को रोकते हैं.

 हमारे यहाँ खेल की स्थिति बहुत बढ़िया है लेकिन हमारे यहाँ प्रतिभा को दबाया जाता है. यहाँ की स्थिति ऐसी है अंधेर नगरी चौपट राजा टका सेर भाजी टका सेर खाजा
 
छात्र वेदप्रकाश मिश्र

उनका कहना था कि उनके माँ-बाप उन पर पढ़ाई के लिए ज़्यादा ज़ोर देते हैं.

बहस का समापन खेलों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए सुझावों के साथ हुआ.

प्राध्यापक लालबहादुर यादव का सुझाव था,"सरकार का कुश्ती की ओर ध्यान नहीं है जबकि यहाँ के लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जा चुके हैं. जो संभावनाएँ हमारी क्षेत्रीय स्तर पर हैं उन्हें विकसित किया जाए तो हम खेलों में चीन और अमरीका की श्रेणी में जा सकते हैं."

दो हज़ार से ज़्यादा लोगों ने तपती धूप में जिस धैर्य के साथ डेढ़ घंटे तक इस बहस में हिस्सा लिया, उससे साबित होता है कि बीबीसी हिंदी सेवा और खेलों में छपरावासियों की कितनी दिलचस्पी है.

 
 
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