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शुक्रवार, 05 मार्च, 2004 को 13:24 GMT तक के समाचार
 
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'होली के रंग - रब के रंग'
 

 
 
होली के रंग
दो दिलों को जोड़ती है होली
"जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की,

परियों के रंग दमकते हों, जब शीश-ए-जाम झलकते हों

महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की

जब फागुन रंग..... "

और फिर साल का वही दिन, रंगों और खुशियों के दुपट्टे को लहराते हमारे सामने खड़ा है.

हमने बस थाम लिया ये रंगीन दामन जिसमें देखा तो यादों के कई सितारे टंके हुए थे.

यादें, बीते हुए दिनों की, गुज़रे ज़माने की. यादों की होली, यादो में सजी, बसी

होली उनकी यादों की जिनके लिए अब ये रंग गुज़रे ज़माने की बात रह गई है लेकिन भूली बिसरी यादों में अब भी होली के रंग ताज़ा हैं.

पाकिस्तान की महशहूर सूफ़ी गायिका और भारत में भी लोकप्रिय आबिदा परवीन, होली का ज़िक्र छेड़ने पर जैसे किसी और ही दुनिया में खो जाती हैं.

 होली से जुड़ी पाकीज़ा यादें हैं, यह ख़ुशी जो है वो महबूब के आमद की ख़ुशी है जो दोनों मुल्कों में एक जैसी ही है. बचपन से मुझे याद है कि हर मज़हब के लोग इसमें शामिल होते थे."
 
आबिदा परवीन

कहती हैं, "होली से जुड़ी पाकीज़ा यादें हैं, यह ख़ुशी जो है वो महबूब के आमद की ख़ुशी है जो दोनों मुल्कों में एक जैसी ही है. बचपन से मुझे याद है कि हर मज़हब के लोग इसमें शामिल होते थे."

होली के बारे में कुछ ऐसे ही प्यार से बातें करती हैं ग़ज़ल मल्लिका फ़रीदा ख़ानम जो रहती तो हैं

पाकिस्तान में पर भारत से कोई कम प्यार नहीं है उन्हें.

बच्चों सी चुहल के साथ कहती हैं कि होली के दिन रंगो में रंग जाना और हंगामा मचा देना, ये ख़ूबसूरत यादें हैं.

"जी चाहता है एक बार फिर सब इक्ठ्ठा हों. अब भी वही मोहब्बत है, वही प्यार है. वही समां फिर से बना लें तो क्या रंग जमेगा सचमुच."

और ऐसी दुआएं मांगने का होली से बढिया दिन कौन सा हो सकता है.

आख़िर रंगो के ज़रिए ख़ुशियाँ मनाने का तरीक़ा तो साझा विरासत का ही हिस्सा है पर मुल्क को जिन सीमाओं ने बाधा बरसों पहले, बांधा उन्होंने खुशियों के इस रंगीन सैलाब को भी.

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के डॉक्टर श्याम लाल कहते हैं, हाँ पहले से अब धार्मिक भाईचारा तो कम हुआ है. पहले सब हिंदू मुसलमान मिलकर दिन भर रंग खेलते थे लेकिन अब उतनी शांति नहीं है.

कुछ ऐसी ही कसक भरी यादें है कराची की जयंती की भी जो कहती हैं कि अब माहौल पहले की तरह नहीं है.

हम कैसे भूलें की फाग पर सबसे ज़्यादा गीत और चौपाईयाँ लिखीं अमीर ख़ुसरो ने.

और हज़रत शाह नियाज़ का वो गीत जिसमें होली कुछ ऐसी होती है -

"होरी हो रही है अहमद जियो के द्वार हज़रत अली का रंग बनो है, हसन हुसैन खिलाड़"

रब के रंग

तो जैसे आबिदा परवीन ने कहा कि होली के रंग जो हैं वो रब के रंग हैं

इसका असल मुक़ाम तो दुनिया को मोहब्बत और अपनेपन के एक ही धागे में बांधना है.....

हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार की होली चारो तरफ फैले बेनूर घटाटोप अंधेरे को हटाकर मोहब्बत के रंगो को आसमान पर बिखेरेगी.

 
 
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