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बुधवार, 24 मार्च, 2004 को 18:07 GMT तक के समाचार
 
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निश्चय ही बहुत कुछ बदल गया है...
 

 
 
आईके गुजराल
गुजराल भारत के हर चुनाव के साक्षी रहे हैं
हमारे लिए सबसे ख़ुशी की बात है कि हिंदुस्तान का लोकतंत्र एक बार फिर चुनाव में जा रहा है.

आज़ादी पाए इतने वर्षों हो गए और ये देश की एक बड़ी उपलब्धि है कि हम विपरीत परिस्थितियों में भी कभी चुनाव से दूर नहीं हुए.

आज का चुनाव तो कई मायनों में अनोखा है. जैसे ये पहला चुनाव है जिसमें नई पीढ़ी इतनी बड़ी तादाद में मतदान करने जा रही है.

जब मैं 1950 और 1960 के दशक के चुनाव याद करता हूँ तो लगता है कि उस समय प्रचार वगैरह का ढंग अलग होता था.

पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय या हमारे समय में भी जब चुनावी सभाएँ होती थीं तो वो एक 'स्टडी सर्कल' की शक़्ल अख़्तियार कर लेते थे.

पंडित नेहरू हर चुनाव में लोगों को विदेश नीति के बारे में बताते थे, उन्हें समझाते थे.

वह कहते थे कि चुनाव तो एक तरह से एक 'शैक्षिक दौरे' की तरह है मगर वो अब ख़त्म हो रहा है.

मीडिया का असर बढ़ा

अब मतदाता भी पहले जैसे नहीं रहे और इसकी वजह ये है कि एक तो मीडिया का असर बढ़ा है दूसरा अब चुनाव मार्केटिंग बनकर रह गए हैं.

जवाहर लाल नेहरु
नेहरु मानते थे कि चुनाव शैक्षिक दौरे की तरह होता है

मीडिया की वजह से लोगों को चुनाव, प्रत्याशी और लगभग हर चीज़ के बारे में काफ़ी कुछ पता चल जाता है जिससे वह काफ़ी जागरूक हो चुका है.

फिर चुनाव में मार्केटिंग का असर बढ़ने से ये हुआ है कि पार्टी के जितने भी प्रवक्ता हैं वे मार्केटिंग पर ध्यान दे रहे हैं.

उस समय के चुनाव में अगर मुद्दों की बात करें तो विदेश नीति, आर्थिक नीति, ग़रीबी, जातिवाद और भूमि सुधार जैसे मसले काफ़ी असरदार हुआ करते थे.

और ये मुद्दे आज भी काफ़ी असरदार हैं बस फ़र्क इतना है कि आज इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

आरक्षण से बदलाव आया है

अगर उस समय के दलों की बात की जाए या ये देखा जाए कि अब तो इतने सारे दल हो गए हैं जबकि तब तो कम ही दल हुआ करते थे तो मैं यही मानता हूँ कि उस समय राजनीति में उच्च जातियों वालों का ही बोलबाला था.

मगर आरक्षण आने के बाद से हर वर्ग के लोग जागरूक हो गए हैं.

अब आम आदमी भी ये जानना चाहता है कि उसके लिए क्या हो रहा है.

ये जो साझी सरकारों का युग है वह काफ़ी अच्छा है क्योंकि इसमें सभी को उनकी बातें कहने का मौका मिल रहा है.

उस दौरान के चुनाव अब के चुनाव से कई मायनों में अलग होते थे मगर किसी भी दौर के चुनाव को सबसे अच्छा कहना नहीं हो सकता क्योंकि कुछ चीज़ें अगर उस समय अच्छी थीं तो कुछ अभी भी अच्छी हैं.

 
 
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