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गुरुवार, 15 अप्रैल, 2004 को 14:37 GMT तक के समाचार
 
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समाजवादी विचारधारा आज कहाँ है ?
 

 
 
राम मनोहर लोहिया
राम मनोहर लोहिया ने समाजवादी आंदोलन को एक नई दिशा दी
भारतीय राजनीति में समाजवादी विचारधारा का एक अहम रोल रहा है.

1948 में कांग्रेस से अलग हुए समाजवादियों ने जिनमें आचार्य नरेन्द्र देव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ राम मनोहर लोहिया शामिल थे सोशलिस्ट पार्टी के नाम से एक दल का गठन किया था, बाद में आचार्य जे बी कृपलानी की किसान मज़दूर प्रजा पार्टी का इस दल में विलल हो जाने के बाद इस दल को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नाम दिया गया लेकिन इस दल के गठन के कुछ वर्षों बाद ही सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन की प्रकिया शुरु हो गई.

जय प्रकाश नारायण क्षुब्ध होकर भूदान आंदोलन में शामिल हो गए. डॉ लोहिया ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नाम से अलग दल बना लिया और नरेंद्र देव के नेतृत्व में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का अलग अस्तित्व बना रहा.

1952, 57 और 1962 में हुए आम चुनावों में समाजवादी दल संख्या के लिहाज़ से तो ज़्यादा सीटें नहीं जीत सके लेकिन संसद में उन्होंने प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाई.

1963 में हुए संसदीय उप चुनावों में आचार्य कृपलानी और डॉ लोहिया के चुनाव जीतने से संसद में विपक्ष की भूमिका और मज़बूत हुई और पहली बार लोक सभा में नेहरु सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास का प्रस्ताव पेश किया गया.

इसी साल कलकत्ता में हुए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के वार्षिक सम्मेलन में डॉ लोहिया ने ग़ैर कॉग्रेसवाद की रणनीति पेश की और सभी विपक्षी दलों से कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक साझा गठबंधन बनाने की अपील की.

लोहिया की नाराज़गी

डॉ लोहिया कांग्रेस से इतने ख़फा थे कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वे शैतान से भी हाथ मिलाने के लिए तैयार हैं.

ग़ैर कांग्रेसवाद की रणनीति ने 1967 के आम चुनावों में रंग दिखाया और इन चुनावों में न केवल संसद में बड़ी तादाद में विपक्षी सदस्य चुनकर आए बल्कि उत्तर भारत के कई राज्यों में विपक्षी संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनी जिनमें समाजवादियों से लेकर वामपंथी कम्युनिस्ट दल और भारतीय जनसंघ से लेकर रिपब्लिकन पार्टी जैसे दलित आधार वाले दल भी शामिल हुए.

इंदिरा गाँधी
वर्ष 1971 में इंदिरा गाँधी के आने के बाद समाजवादियों का एक तरह से सफ़ाया ही हो गया

ग़ैरकांग्रेसी सरकारों के लिए जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया गया उसमें समाजवादी विचारधारा और नीति रीतियों का बोल बाला था.

इसी कार्यक्रम में पिछड़ों को 60 प्रतिशत आरक्षण देने, ग़रीब किसानों का लगान माफ़ करने, महिलाओं को आगे लाने और उन्हें ज़्यादा प्रतिनिधित्व देने, दाम बांधने और जाति तोड़ने जैसी बातें कही गई थीं.

मिली आंशिक सफलता

ग़ैरकांग्रेसवाद की रणनीति से समाजवादी दलों को आंशिक सफलता मिली और वे उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे उत्तरी राज्यों में अपना जनाधार बनाने में सफ़ल रहे.

1967 के आम चुनावों में ही डॉ लोहिया के साथ मधुलिमए और जॉर्ज फ़र्नानडीज़ जैसे तेज़ तर्रार समाजवादी लोक सभा में पहुँचे और कांग्रेस के ख़िलाफ़ विपक्षी मुहिम को और तेज़ किया.

लेकिन इसी वर्ष अक्तुबर माह में डॉ लोहिया का निधन हो जाने के कारण समाजवादी आंदोलन को काफ़ी बड़ा आघात लगा और उस की गति धीमी होती गई.

मुलायम सिंह यादव
मुलायम सिंह नए दौर के समाजवादी नेता हैं

इसी दौर में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का दबदबा बढ़ा और 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने और उसके बाद 1971 में हुए लोक सभा चुनावों में उन्हें जो भारी बहुमत मिला उसमें समाजवादी लगभग साफ़ हो गए.

इन चुनावों में मशहूर समाजवादी नेता राजनारायण इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ रायबरेली से चुनाव लड़े और भारी बहुमत से चुनाव हार गए.

लेकिन इस चुनाव में इंदिरा गाँधी के पतन की बुनियाद भी रख दी गई.राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक चुनाव याचिका दायर करके आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में अपने पद का दुरुपयोग किया और चुनाव जीतने के लिए सरकारी तंत्रमंत्र का इस्तेमाल किया.

इसी समय गुजरात और बिहार में छात्रों का आंदोलन शुरु हुआ जिसमें दो दशक पहले राजनीति छोड़ चुके समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण शामिल हुए.

विपक्षी दलों की रैली

उनकी अगुवाई में सभी विपक्षी दलों ने 6 मार्च 1975 को दिल्ली में एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया जिससे इंदिरा गाँधी की सरकार हिल गई.

इसी दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को राजनारायण की याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए इंदिरा गाँधी को चुनावी धांधलियां करने का दोषी ठहराया और उनका चुनाव रद्द कर दिया.

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यही फ़ैसला इंदिरा गांधी के पतन का कारण बना और उन्होंने 25 जून को देश में आपातकाल लागू कर दिया.

इसी के तहत देश के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं और कार्यक्रर्त्ताओं को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया जिनमें समाजवादी भी बड़ी तादाद में शामिल थे.

जॉर्ज फ़र्नांडीस
जार्ज फ़र्नांडीस बाद के दिनों में सक्रिय रहे

19 माह के आपातकाल के दौरान ही जेल में जनता पार्टी का गठन हुआ और इसमें भी समाजवादियों की भूमिका अहम रही.

आपातकाल ख़त्म होने के बाद 1977 में जब लोक सभा के आम चुनाव हुए तो जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला और इन्हीं चुनावों में राजनारायण ने इंदिरा गाँधी को रायबरेली से पराजित किया.

इसके अलावा बड़ी तादाद में समाजवादी संसद में चुनकर आए और पहली बार मंत्री बने.

इनमें राजनारायण, जॉर्ज फ़र्नांडीज़, रविराय, ब्रजलाल वर्मा, पुरुषोत्तम कौशिक, जनेश्वर मिश्र आदि शामिल थे.

इसी वर्ष हुए विधान सभा चुनावों में समाजवादी आंदोलन से जुड़े कर्पूरी ठाकुर बिहार में, रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश में और गोलप बोरबोरा असम में मुख्यमंत्री बने.

1979 में जनता पार्टी में हुए विभाजन के बाद समाजवादी एक बार फिर छिन्न भिन्न हो गए और एक दशक तक सत्ता की राजनीति से दूर हो गए.

लेकिन जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनमोर्चा बनाकर राजीव गांधी के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु किया तो समाजवादियों ने उसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और जनता दल बना कर एक बार फ़िर केंद्र में और कई राज्यों में सत्ता हासिल की.

सामाजिक न्याय की शुरुआत

वी पी सिंह सरकार में रहते हुए ही जार्ज फ़र्नांडीज़, शरद यादव, नीतिश कुमार और रामविलास पासवान ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करवाने का फ़ैसला करवाया जिससे भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत हुई.

इसी दौर में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव उत्तर प्रदेश और बिहार में मुख्यमंत्री बने.
लेकिन एक साल में ही वी पी सिंह सरकार का पतन हो जाने के बाद समाजवादियों में जो विभाजन हुआ उससे यह आंदोलन लगातार कमज़ोर ही होता गया.

हालांकि वी पी सिंह के बाद प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर को भारत का पहला समाजवादी प्रधानमंत्री कहा गया लेकिन वर्षों तक कांग्रेस में रहे और उसकी मदद से प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर को कुछ लोग समाजवादी मानने को तैयार नहीं हैं.

अब हालत ये है कि अपने को समाजवादी कहने वाले ज़्यादातर लोग या तो सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सदस्य हैं या कांग्रेस का समर्थन ले रहे हैं या उसे दे रहे हैं.

इसके अलावा किशन पटनायक, सुरेंद्र मोहन सरीखे नेता समाजवादी जन परिषद जैसे वैचारिक दल बना कर अपनी विचारधारा का प्रचार प्रसार कर रहे हैं.

मगर उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले दो तीन आम चुनावों से समाजवादी विचारधारा सामूहिक रुप से अपनी कोई छाप या पहचान नहीं बना पा रही है.

 
 
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