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शनिवार, 07 अगस्त, 2004 को 14:19 GMT तक के समाचार
 
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अमरोही आम की नायाब क़लमी क़िस्में
 

 
 
आम
अमरोहा का आम अब यूरोप में भी मिलेगा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का शहर अमरोहा जादुई फ़िल्मी हुनर वाले कमाल अमरोही, मीना कुमारी की ससुराल और फलों के राजा आम की नायाब क़िस्मों के लिए मशहूर है.

अमरोहा को आम की बेमिसाल क़िस्मों और तहज़ीब के मामले में छोटा लखनऊ भी कहा जाता है.

क़लम लगाकर हर साल क़रीब दो दर्जन नई क़िस्में तैयार करने वाले अमरोहा में ढाई हज़ार से भी ज़्यादा आम की क़िस्में पाई जाती हैं.

आम की इतनी सारी क़िस्में किसी एक स्थान पर शायद ही देखने को मिलें.

और अब तो यूरोप में पसंद किए जाने वाले आम की क़िस्में भी तैयार कर ली गई हैं यानी कम मीठा और चटकीला रंग. इन क़िस्मों को नाम दिया गया है - मख़सूस और सुरख़ा अली हैदर.

अमरोहा के आम उत्पादक बताते हैं कि यूरोप में ऐसा आम ज़्यादा पसंद किया जाता है जिसमें मीठा कम हो लेकिन उसका रंग ज़रा चटकीला हो यानी देखने में भी ख़ूबसूरत लगे.

थोड़ा पीछे जाकर देखें तो अमरोहा के नाम में ही आम शामिल रहा है.

कुछ शौकीन लोगों ने आम की इस सरज़मीं को इस लोकप्रिय फल की ऐसी नई-नई और नायाब क़िस्मों से नवाज़ा है जो अब यूरोप में पसंद किए जाने वाले ज़ायक़े की कसौटी पर भी खरी उतरती हैं.

आम
तरह-तरह की क़िस्में हैं अमरोहा में

अमरोहा में आम के शौक़ीन तो बहुत रहे हैं लेकिन उन्होंने कभी भी इसके व्यावसायिक उत्पादन के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा और यही वजह है कि नायाब क़िस्में देने वाले इस शहर का नाम आम की पैदावार के क्षेत्र में ज़्यादा दूर तक नहीं जा सका.

वैसे दिल्ली में हर साल होने वाले आम महोत्सव में भी पिछले साल से अमरोहा के आम को जगह मिली है और यहाँ के आम के निर्यात का रास्ता भी साफ़ हुआ है और दो व्यवसाइयों को आम के निर्यात के लाइसेंस मिले हैं.

नाम से मशहूर

राजधानी दिल्ली से क़रीब 130 किलोमीटर पूरब में उत्तर प्रदेश के नवसृजित ज़िले ज्योतिबाफुले नगर का मुख्यालय है अमरोहा. उससे पहले तक यह सिर्फ़ एक तहसील हुआ करती थी और इसकी आबादी क़रीब दो लाख है.

एक किंवदंती के अनुसार क़रीब तीन हज़ार साल पहले हस्तिनापुर के राजा अमरज्येद्ध ने इस स्थान को बसाया और इसके चारों ओर आम के बाग़ होने की वजह से इसका नाम आम्र वनम रखा गया.

बाद में हिंदू और मुस्लिम ज़मींदारों ने आम के शौक को पूरा करते हुए तरह-तरह की क़िस्में तैयार करने की परंपरा शुरू की जो आज तक चली आ रही है.

इस स्थान पर आम और यहाँ की नदियों में रोहू मछली की भारी तादाद को देखते हुए क़रीब 700 साल पहले इराक़ से यहाँ आकर बसे सूफ़ी हज़रत शर्फउद्दीन शाहविलायत ने इस नगरी को 'आमरोह' नाम दिया जोकि कालांतर में 'अमरोहा' बन गया.

शहंशाह अली नक़वी
शहंशाह अली को आम की नई क़लमें तैयार करने का हुनर पुश्तैनी तौर पर मिला है

अमरोहा और आसपास के क्षेत्र में 13 हज़ार हेक्टेयर से भी ज़्यादा इलाक़े में आम के बाग़ हैं. इसके अलावा प्रति एकड़ आम के उत्पादन के हिसाब से भी अमरोहा का स्थान सबसे ऊपर है.

अमरोहा ज़मींदारों का शहर रहा है और आम की नई क़िस्में तैयार करने के शौकीन भी ज़्यादातर ज़मींदार घराने से जुड़े लोग ही रहे हैं इसलिए आम की कुछ क़िस्मों के नाम भी ज़मींदारों के नाम पर ही रखे गए हैं.

मसलन - सुर्ख़ा अली हैदर, मख़सूस, दरबार-ए-कलाँ, सरताज, आमे सुदूर, नायाब, लतीफ़ अली बावा, नौशा वग़ैरा. ये ख़ालिस अमरोहा की ही क़िस्में हैं लेकिन कोई भी लंगड़ा या दशहरा जैसी क़िस्मों जैसी जगह नहीं ले पाई है.

हालाँकि सरकार ने इसे 1998 में आम पट्टी का नाम दिया लेकिन समुचित सरकारी मदद के अभाव में यहाँ की आम पैदावार फलफूल नहीं सकी है.

मुश्किलें हैं

आम का कारोबार करने वाले आदिल अब्बासी कहते हैं कि विदेशों को यहाँ का आम भेजा जा सकता है बशर्ते कि सरकार इसकी व्यवस्था में मदद करे.

अब्बासी का सुझाव है कि अमरोहा को अगर 'एग्रो एक्सपोर्ट ज़ोन' घोषित कर दिया जाए तो इससे बहुत फ़ायदा होगा.

फलों का राजा आम
आम का नाम आते ही मुँह में पानी आ जाता है

आम उत्पादन संघ के अध्यक्ष अली नक़वी का कहना है कि यूरोपीय लोगों की पसंद पर खरी उतरने वाली क़िस्मों - मख़सूस और सुर्ख़ा अली हैदर का उत्पादन अगर व्यासायिक स्तर पर किया जाए तो वहाँ यह आम अपनी मज़बूत जगह बना सकता है.

नक़वी बताते हैं कि ज़्यादा माँग नहीं होने की वजह से इन क़िस्मों का उत्पादन अभी कम स्तर पर ही है.

यहाँ के एक बुज़ुर्ग शहंशाह अली नक़वी को आम की क़िस्में तैयार करने का हुनर पुश्तों से मिला है. आम की क़लम लगाकर नई क़िस्में तैयार करने की कला पर उनकी एक क़िताब भी जल्द ही प्रकाशित होने वाली है.

71 वर्षीय शहंशाह अली नक़वी कहते हैं, "अमरोहा में आम की पैदावार सिर्फ़ शौकिया तौर पर होती रही है. अगर इसके व्यावसायिक उत्पादन की तरफ़ ध्यान दिया जाता तो यहाँ का आम भी लखनऊ के मलिहाबादी आम की तरह ही मशहूर होता.

नक़वी कहते हैं कि अब आम की खेती के व्यावसायीकरण की तरफ़ प्रयास किए जा रहे हैं और इसके तहत उन्होंने इस साल क़रीब ढाई सौ क्विंटल आम बांग्लादेश भिजवाया है.

अमरोहा के आम उत्पादकों को अगर मलाल है तो बस इतना ही कि मीना कुमारी की ससुराल और दुनिया में मशहूर इस शहर को जब ज़िला बनाया गया तो इसका नाम बदलकर ज्योतिबाफुले नगर क्यों रख दिया गया?

 
 
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