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बुधवार, 24 नवंबर, 2004 को 08:33 GMT तक के समाचार
 
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नक्सलवादी आंदोलन से दुखी हैं कानू सान्याल
 

 
 
कानू सान्याल
कानू सान्याल ने चारु मजूमदार के साथ मिलकर नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरुआत की थी
पश्चिम बंगाल सरकार और भारत के गृहमंत्रालय की सूची में कभी ख़तरनाक व देश के लिए विध्वंसकारी घोषित 76 साल के इस बूढ़े शख्स की एक-एक गतिविधि को देश के खुफ़िया विभाग की आंखें आज भी टटोलती रहती हैं.

इस शख्स के कहीं भी आने-जाने को शक़ की निगाह से देखा जाता है और इस के कहीं पहुंचने से पहले ही कुछ मोटी फाइलें वहां के खुफ़िया कार्यालय तक पहुंच जाती हैं.

हालत ये है कि देश के खुफ़िया विभाग के अधिकांश कार्यालयों में एक न एक फ़ाइल ज़रुर है, जिस पर उसका नाम दर्ज है-कानू सान्याल.

पिछले दिनों कानू सान्याल छत्तीसगढ़ दौरे पर आए तो उनसे लंबी बातचीत हुई.

ऐसे समय में जब एक ओर आंध्रप्रदेश सरकार नक्सलियों से बात कर रही हो और दूसरी ओर पीपुल्स वार और माले में एका हो रहा हो तब नक्सलवादी आंदोलन पर कानू सान्याल की राय का अपना अलग महत्व है.

25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके में चारु मजूमदार के साथ सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूंकने वाले नक्सलवाद के अगुवा नेता कानू सान्याल को अब नक्सलवाद शब्द पर ही आपत्ति है और अपने आंदोलन का हश्र उन्हें दुखी करता है.

लेकिन गांधी की अहिंसा को फरेब मानने वाले इस शख्स की आस्था आज भी हथियारबंद आंदोलन में है. शर्त ये है कि हथियार चंद समूहों में होने के बजाय आम जनता के हाथ में हो.

वामपंथी संगठनों की एकजुटता

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और नक्सली संगठनों से उम्मीद छोड़ चुके कानू अब देश में बिखरे हुए वामपंथी संगठनों को एकजुट करने में लगे हुए हैं.

 मुझे नक्सलवाद शब्द पर गहरी आपत्ति है क्योंकि नक्सलबाड़ी से हमने भले ही आंदोलन शुरु किया हो लेकिन उसका कोई वाद है तो वो है मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओत्सेतुंगवाद. रुसी क्रांति को तो कोई रुसीवाद नहीं कहता! असल में नक्सलवाद मीडिया का गढ़ा हुआ शब्द है
 

कानू 'नक्सलवाद' शब्द को मीडिया की देन बताते हुए कहते हैं –“मुझे नक्सलवाद शब्द पर गहरी आपत्ति है क्योंकि नक्सलबाड़ी से हमने भले ही आंदोलन शुरु किया हो लेकिन उसका कोई वाद है तो वो है मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओत्सेतुंगवाद. रुसी क्रांति को तो कोई रुसीवाद नहीं कहता! असल में नक्सलवाद मीडिया का गढ़ा हुआ शब्द है.”

कुछ वामपंथी संगठनों के विलय के बाद गठित सीपीआई माले के संस्थापक महासचिव कानू सान्याल भले नक्सलबाड़ी के अगुवा माने जाते हैं लेकिन आज की तारीख़ में नक्सली इन्हें संशोधनवादी मानते हैं.

भटकाव

कानू कहते हैं- “अपने समय में चाहे यह कितना भी रोमांचकारी क्यों न हो, वामपक्ष का यह भटकाव सैद्धांतिक और राजनीतिक रुप से हमें खत्म कर देता है. हथियारबंद क्रांति करने का दावा करने वाले और मुझे संशोधनवादी बताने वाले अपने अनुभवों से कुछ सीखना नहीं चाहते. उन्हें ये भ्रम है कि वे इतिहास का निर्माण करते हैं, जबकि सच तो ये है कि जनता को छोड़ कर कोई क्रांति नहीं की जा सकती.”

 बंदूक के बल पर कुछ लोगों को डरा-धमका कर अपने साथ होने का दावा करना और बात है और सच्चाई कुछ और है. अगर जनता उनके साथ है तो फिर वो भू सुधार जैसे आंदोलन क्यों नहीं करते?
 

नक्सलवादियों का दावा है कि जनता उनके साथ है, इस सवाल का जवाब कानू अपने पुराने तेवर में देते हैं- “बंदूक के बल पर कुछ लोगों को डरा-धमका कर अपने साथ होने का दावा करना और बात है और सच्चाई कुछ और है. अगर जनता उनके साथ है तो फिर वो भू सुधार जैसे आंदोलन क्यों नहीं करते?"

वे कहते हैं, "आज ये बंदूक के बल पर जनता के साथ होने का दावा कर रहे हैं, कल कोई दूसरा बंदूकवाला भी यही दावा कर सकता है. अगर हथियारबंद गिरोहों के बल पर क्रांति का दावा किया जा रहा है, तो चंदन तस्कर और दूसरे डाकू सबसे बड़े क्रांतिकारी घोषित किए जाने चाहिए. भय और आतंक पर टिका हुआ संगठन ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकता."

कानू सान्याल अपने अतीत को गहरे दुख और अवसाद के साथ याद करते हुए कहते हैं कि इस उम्र में आने के बाद यह दुख लगातार सालता है कि हम कुछ नहीं कर पाए.

कानू कहते हैं- “बंदूक लेकर जब हम आतंक फैलाते चलते थे तो हमें भी लोग समर्थन देते थे लेकिन आतंकवाद के रास्ते में भटक जाना हमारे लिए घातक सिद्ध हुआ. इतिहास ने हमें जो मौका दिया था, हम उसका इस्तेमाल नहीं कर पाए और हमारे साथी माकपा जैसे संगठनों में वापस चले गए. भूमि आंदोलन और कृषि क्रांति की हमने कोशिशें की लेकिन बाद में हम भटक गए.”

लेकिन इसका आशय यह कतई नहीं है कि कानू सान्याल का सशस्त्र क्रांति से मोहभंग हो चुका है. कानू कहते हैं कि नक्सलबाड़ी का रास्ता ही मेरा जीवन है. कानू का दावा है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान एक भी व्यक्तिगत हत्या नहीं हुई है. उनका मानना है कि केवल ध्वंस करना क्रांति नहीं है, क्रांति निर्माण करने का भी नाम है.

कानू इस बात से सहमत हैं कि क्रांति और वार्ता, साथ-साथ चलने वाली प्रक्रिया है.

 संविधान का अपने हक़ में इस्तेमाल हमें ज़रुर करना चाहिए लेकिन इस संविधान के भरोसे देश में क्रांति नहीं लाई जा सकती
 

वे कहते हैं कि संविधान का अपने हक़ में इस्तेमाल हमें ज़रुर करना चाहिए लेकिन इस संविधान के भरोसे देश में क्रांति नहीं लाई जा सकती. कानू सवाल उठाते हैं कि संविधान में आस्था रखने वाले ही राजनीति के अपराधीकरण की बात कह रहे हैं, ऐसे में संविधान की उपयोगिता किस हद तक हो सकती है?

संविधान के इसी दायरे में आंध्र प्रदेश की सरकार और सीपीआई माओइस्ट की बातचीत को लेकर वो कहते हैं कि यह टीडीपी को कमज़ोर करने के लिए कांग्रेस को मदद पहुंचाने की प्रक्रिया है.

 
 
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