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गुरुवार, 16 जून, 2005 को 04:52 GMT तक के समाचार

सुनील रामन
बीबीसी के दक्षिण भारत संवाददाता

नौसैनिकों ने किया था एक बड़ा विद्रोह

“स्वतंत्र भारत के इतिहास में हमारा कोई स्थान नहीं है. यहाँ तक कि भारतीय नौसेना ने हमारे योगदान को 50 साल से अधिक समय के बाद याद किया और एक छोटा सा स्मृति भेंट किया.”

यह कहना है 85 वर्षीय लेफ्टिनेंट कमांडर, बीबी मुतप्पा का, जिन्होंने अपने कई नाविक साथियों के साथ 1942 और 1946 में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ विद्रोह किया था.

इतिहासकारों का मानना है कि 1946 में रॉयल नेवी के 200 ठिकानों और जहाज़ों पर हुए विद्रोह ने ब्रिटेन की सरकार को भारत जल्द छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.

आज लेफ्टिनेंट कमांडर मुतप्पा उन दिनों की यादें समेटे हुए बंगलौर में रहे हैं.

उन दिनों को याद करते हुए उनके आँख भर आती है.

कमांडर मुतप्पा कहते हैं, “हममें से कई छुपकर मुंबई के अलग-अलग इलाकों में जवाहरलाल नेहरू और अन्य नेताओं के भाषण सुनने जाया करते थे. मुझ पर महात्मा गाँधी का ख़ासा प्रभाव था. मैं रॉयल नेवी में नाविक का काम कर रहा था, लेकिन विदेशी हुकूमत की नीतियों का सख़्त विरोध करता था.”

उनका कहना है कि भारतीयों और एँग्लो इंडियनों के बीच वेतन में भेदभाव को लेकर विरोध शुरू हुआ.

लेफ्टिनेंट कमांडर मुतप्पा कहते हैं, “भारतीय नाविकों को 16 रुपए प्रति माह मिलता था, जबकि एंग्लो इंडियन नाविकों की पगार 60 रुपए थी. एक दिन हम सब 127 नाविकों ने नाश्ते से मना कर दिया. फिर हमें गिरफ्तार कर यरवादा के जेल में कुछ महीने रखा गया और वहाँ भी हमारे ख़िलाफ़ भेदभाव की नीति थी.”

"उसके बाद हमारे वेतन बढ़ाए गए. लेकिन नाविकों का विद्रोह 1946 में विदेशी सरकार के लिए बहुत गंभीर मुद्दा बन गया था. स्वतंत्रता संग्राम के बढ़ते प्रभाव ने नाविकों को अनुशासन में रहने का अपना मूलमंत्र तोड़ने को मज़बूर कर दिया."

मुंबई के ऐतिहासिक “गेटवे ऑफ इंडिया” और ताजमहल होटल के निकट स्थित रॉयल नेवी के कोस्टल ब्रांच में तैनात नाविकों ने अपने अंग्रेज़ अफसरों को उनके कमरों और शौचालय में बंद कर दिया था. यही घटना कुछ जहाज़ों पर भी हुई.

मुतप्पा कहते हैं कि अंग्रेज़ों को डर था कि लूटे हुए हथियारों और बारूद से कहीं विद्रोह कर रहे नाविक ताजमहल होटल पर हमला न कर बैठें.

गाँधी का समर्थन नहीं

“सबके हाथ हथियार लग गया. बावर्ची, सफाई कर्मचारी, खाना परोसने वाले और यहाँ तक की सैनिक बैंड के सदस्यों ने भी हथियार लूट लिए थे.”

विद्रोह ने इतना गंभीर रूप धारण कर लिया था कि नाविक चेन्नई से कराँची तक विद्रोह पर उतर आए थे.

मुंबई के केंटल ब्राँचस को मराठा लाइट इंफेंट्री के सैनिकों ने घेर लिया था और कई घंटों तक विद्रोही नाविकों और उनके बीच फायरिंग चलती रही.

मुतप्पा याद करते हैं कि नाविकों द्वारा विद्रोह किए जाने को महात्मा गाँधी का समर्थन नहीं मिला. उन्होंने नाविकों को अनुशान में रहने को कहा. नेहरू ने अपने को सैनिक विद्रोह से अलग कर लिया था.

कुछ सालों तक कई नाविक नौसेना से बाहर रहे और कुछ को गिरफ़्तार भी कर लिया गया था. स्वतंत्रता के बाद इन्हें एक बार फिर नौसेना में भरती किया गया लेकिन जिस प्रकार आईएनए के सैनिकों को देश भूल गया था नाविक भी भुला दिए गए.

आज लेफ्टिनेंट कमांडर मुतप्पा उन्हीं यादों के सहारे जी रहे हैं.

वे भारतीय नौसेना से 1972 को सेवानिवृत्त हुए, लेकिन देशवासियों द्वारा भुला दिए जाने से वे दुखी नज़र आते हैं.

लेकिन इन 55 सालों में वे मुंबई के उस नौसेना के ठिकाने में वापिस कभी नहीं गए.

“मेरे परिवार के सदस्य मुझे वहाँ ले जाना चाहते हैं लेकिन मैं हिम्मत नहीं जुटा सकता. मैं उन दिनों को याद करते भावुक हो जाता हूँ और मैं उन्हीं यादों में अपनी बाकी ज़िंदगी बिताना चाहता हूँ.”

आज याद के अलावा उनके पास कुछ है तो कुछ दिनों पहले मिला स्मृति चिन्ह और ढेर सारा गर्व.